भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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448 अपराजितपृच्छा विश्वकर्मा आगे बोले कि सभा के मध्य में वेदी हो, उस वेदी पर सिंहासन हो और जो कि पोतिका, पुष्प और जाड्यकुम्भ, सिंहमुख और लड़ियों से अलंकृत हो। गजाश्वनरपीठाढ्यं सिंहव्याघ्रैरलंकृतम्। अनेकसिंहरूपैश्च क्रमतो विकृतानना ॥ २ ॥ इस जाड्यकुम्भ के ऊपर के भद्रभाग पर प्रासाद मण्डोवर के अलंकरण की भाँति ही विविध स्तरों पर गजथर, अश्वथर, नरथर, सिंहथर, व्यालथर (रासमुख) अनेक सिंहों के रूप में विकृत भयङ्कर मुखाकृतियों में बने अलंकरण हों। सिंहासने महाराजः शोभते मणिदीप्तिभिः । यथा शक्रः सुरैर्युक्तो बालार्ककिरणोदिती ॥ ३ ॥ ऐसे सिंहासन पर महाराज एक प्रकार से अपनी मणिदीप्ति से ऐसे प्रभविष्णुमयता के विराजित हों, मानों स्वयं इन्द्र अपने देवगणों के मध्य में उदित होते हुए सूर्य की लालिमायुक्त किरणों से प्रकाशित हो रहे हों। चक्रवर्त्यादीनां नृपकोटयः — चक्रवर्त्यर्धपतिश्च भूरिभक्त्या महीपतिः । एते वै तु महाराजा शेषाश्च मण्डलेश्वराः ॥ ४ ॥ स्तम्भविस्तारात् त्रिगुणं वा चतुर्गुणम्॥ दीर्घा पञ्चगुणं वापि नीचमध्योत्तमा स्मृता। नागवृत्ता पत्रचित्रा समुद्रोर्मिश्च पोतिकाः॥ त्रिविधा नामभिर्ज्ञेयास्तासां लक्षणमुच्यते। स्तम्भव्याससमोत्सेधविस्तारा श्रेष्ठपोतिका॥ शरांशोना मध्यमा स्याद्गनद्व्यंशा कनिष्ठिका। भूतेभमकरव्यालरत्नस्रग्विचित्रिता ॥ वल्लीचित्राग्रपट्टा च सा ख्याता चित्रपोतिका। केवलं पत्रवल्लीभिर्विचित्रा पत्रपोतिका ॥ तरङ्गमात्रचित्रा या पोतिका स्यात् तरङ्गिणी। तरङ्गाश्चात्र वेदर्तुव(स्वा? स्वङ्का) शादिसंख्यया॥ कार्यास्तृभयतस्तुल्याः , पट्टिकाछात्रमध्यगाः। त्रिभागे पोतिकोत्सेधे सार्द्धांशेनाग्रपट्टकम् ॥ तदर्धार्धेन तदधः क्षेपच्छायान्वितं भवेत्। तदुच्छ्रार्धात् त्रिभिर्वांशैरंशाभ्यां वात्र कल्पयेत् । स्वव्यासाधत् त्रिपादाद् वा कुर्यात् तास्वग्रमण्डनम् ॥ 'वास्तुविद्या' में इसका नाम 'बोधिका' है। पोतिका अपने न्यूनाधिक विस्तार के अनुसार तीन नामों वाली होती है। ये भित्ति के स्तम्भाग्र के आधार पर दण्डसंज्ञक, स्तम्भाग्र विस्तार के अनुसार उशन्तिदण्ड और चरणाग्रप्रतान से दण्ड नाम वाली हो जाती है। ग्रन्थान्तर में भी कहा गया है। प्रतिलोम क्रम से इनके नाम होते हैं— अधम प्रकार की त्रिदण्ड पोतिका पत्री कही जाती है। मध्यम प्रकार की चतुर्दण्ड पोतिका चित्री नामक और उत्तम प्रकार की पञ्चदण्ड पोतिका महार्णवी संज्ञक होती है— पोतिका तु त्रिधा ज्ञेया नामभेदेन दैर्ध्यतः। त्रिदण्डा च चतुर्दण्डा पञ्चदण्डा यथाक्रमम्॥ महार्णवी च चित्री च पत्री च प्रतिलोमतः। (वास्तुविद्या : सम्पादक - श्रीकृष्ण 'जुगनू', 8, 44-45) पोतिकेत्यादि । 'बोधिके'ति क्वचित् पाठः । नामभेदेन दैर्ध्यत इति। दैर्ध्यस्य न्यूनत्वाधिकत्वाभ्यां कृतेन नामभेदेनेत्यर्थः । तादृशं दैर्घ्यमेवाह- त्रिदण्डेनेत्यादि। इह दण्डप्रमाणं तु 'कुड्यस्तम्भाग्रतारोऽप्यथ तदवयवाकल्पने दण्डसंज्ञः', 'स्तम्भाग्र- विस्तारमृशन्ति दण्डम्', 'चरणाग्रप्रतानो दण्डः' इत्यादि ग्रन्थान्तरोक्तं ग्राह्यम् । त्रिदण्डादीनां संज्ञा आह— महार्णवीत्यादि । प्रतिलोमत इति । प्रतिलोमक्रममनुसृत्येत्यर्थः । तथाच त्रिदण्डा पोतिका पत्री नामधमा। चतुर्दण्डा पोतिका चित्री नाम मध्यमा। पञ्चदण्डा पोतिका महार्णवी नाम उत्तमेति सिद्धम्। (तत्रैव विवृत्ति)