अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७८ 447 शुक्लपट्टैश्च शोभाढ्यं पुष्परागविभूषितम् । इन्द्रनीलसमं कान्त्या हेमरत्नैश्च शोभितम् ॥ 21 ॥ ऐसी वेदी के ऊपर राजा का आसन लगाया जाए जो स्वच्छ, श्वेत, रेशमी चद्दरों से ढका हुआ हो और उस पर पुष्पों की सुगन्ध वाला इत्रादि छिड़का हो। उसकी कान्ति इन्द्रनील के समान और स्वर्ण व रत्नों के जड़ाव का अलंकरण होना चाहिए। मुक्ताफलैरनेकश्च सूर्यकान्तिमनोरमैः । एवं पुष्पकमाडं च वेद्यूर्ध्वं च नृपासनम् ॥ 22 ॥ इसी प्रकार उन पर अनेकों मोतियों की मनोरम मालाएँ सूर्य की प्रभा विस्फारित करती प्रतीत होनी चाहिए, ऐसा पुष्पक माड नामक वेदी के ऊपर नृप के बैठने का स्थान होता है। उत्तराभिमुखं कृत्वा याम्यायां स्थापयेद्दिशि । तथाग्रे च समस्ताश्च भक्ता ये स्वामिनः स्थले ॥ 23 ॥ यह आसन उत्तर दिशा की ओर मुख वाला और दक्षिण दिशा की ओर स्थापित होता है और इस वेदिका के आसन के आगे राजा के समस्त भक्त-सेवक अपने स्वामी के स्थल पर सामने ही विराजित होंगे। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सभाष्टकवेदीनिर्णयाधिकारो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 77 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सभा अष्टक वेदी निर्णय अधिकार नामक सतत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 77 ॥ महाराजाधिकाराजो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 78 ॥ विश्वकर्मोवाच – सभामध्ये तथा वेदी तत ऊर्ध्वे सिंहासनम्। पौती¹ पुष्पजाड्यकुम्भं सिंहवक्त्रं कनालिकम् ॥ 1 ॥
- 'पौती ?' इति प्रकाशित पाठः। पोतिका स्तम्भाङ्ग के रूप में स्वीकृत है। मयमतं, मनुष्यालयचन्द्रिका इत्यादि में बोधिका या पौती जैसे पर्याय इसी सन्दर्भ में आए हैं। पोतिका के विषय में ईशानशिवगुरुदेवपद्धति और वास्तुविद्या प्रभृति ग्रन्थों में विस्तृत उल्लेख पाया जाता है। ईशानशिवगुरुदेवपद्धति में स्तम्भ पर स्थापित की जाने वाली पोतिका के लक्षण बताते हुए कहा गया है कि स्तम्भ के विस्तार से तीन, चार या पाँच गुणा मान प्रमाण वाली पोतिका क्रमशः नीच, मध्यम और उत्तम नाम से जानी जाती है। ये क्रमशः नागवृत्ता, पत्रचित्रा और समुद्रोर्मि संज्ञक होती हैं- तदूर्ध्वं पोतिका स्थाप्या तस्या लक्षणमुच्यते। सा च स्यात्