भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 535 में से

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सूत्र-७८ 449 महाराज का विरुद धारण करने वाले राजाओं में चक्रवर्ती अधिपति, भूमि के तीनों भागों को धारण करने वाले (षष्ठांश प्राप्तकर्ता) महीपति कहलाने के अधिकारी हैं। इनसे अतिरिक्त जो शेष भूपाल हैं, मण्डलेश्वर पद के अधिकारी हैं। मण्डलीकोऽधिसामन्तः सामन्तो लघुसञ्ज्ञकः। चतुरंशिकाऽल्पराजाः शेषास्तु राजपुत्रकाः ॥ ५ ॥ इनके नीचे मण्डलीक, उनसे नीचे के सामन्त तथा उनसे नीचे के भी लघु सामन्त कहलाते हैं और चतुर्थ अंश भाग के अधिकारी को अल्पराजा और इनके बाद शेष बचे सभी को केवल राजपुत्रक कहा गया है। स्वके स्वभुक्तानुसारे राज्यं कुर्वन्ति स्वेच्छया। अनेकभोगभोक्तारो राजक्रीडामनेकधा ॥ ६ ॥ ये सभी अपने-अपने प्राप्त भाग के प्रदेश पर अपनी इच्छा के अनुसार राज्य करते हैं और अनेक प्रकार के भोग-आनन्द को भोगते हैं तथा नाना प्रकारेण राजक्रीड़ाओं की मौज-मस्ती मनाते हैं। तपसाराधितः पूर्वं महात्मभिरुमापतिः। तपसोऽर्थानुरूपैश्च राज्यं कुर्वन्ति भूतले ॥ ७ ॥ इन सभी भाग्यवान् महीपतियों ने अपने पूर्व जन्म में तपस्या से उमापति महादेव की जो आराधना का पुण्य अर्जित किया था, उसी के अनुरूप उनको इस जन्म में यह सौभाग्य मिला और वे इस भूतल पर आज राज कर रहे हैं। देवपूजार्चनं दानं पूज्यषड्दर्शनादिकम्। पुराणागमग्रन्थादि राजनीतिरनेकधा ॥ ८ ॥ ऐसे सौभाग्य के लिए अनेक प्रकार की देवपूजा, अर्चन, अनेक प्रकार के दान-पुण्य करने के अवसर, अनेक साधनाओं, षड्दर्शनादि के विधि-विधान, अनेक पुराण और आगम शास्त्र-ग्रन्थादि और अनेक राजनीतिक व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं। राज्योत्पतिमाह - पञ्चमातृद्भवं राज्यं नैककलादिकौशलम्। मातु ( ? ) रैकैकोक्तगुणा नटेश्वरसमुद्भवाः ॥ ९ ॥ राज्य की सामान्यतया उत्पत्ति पाँच मातृकाओं से हुई है और उन्हीं से अनेक कला-कौशलों की भी रचना हुई है। ये माताएँ भी अपने एक-एक गुणों के साथ भगवान् शिव-नटेश्वर से समुद्भूत हुई हैं।