भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 495

450 अपराजितपृच्छा बृहच्छुश्रूषया माता द्वितीया पौरुषोद्भवा। स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता गजमाता चतुर्थिका ॥ 10 ॥ पञ्चमी चाश्वमाता च शेषा उपाङ्गवर्त्तिकाः। पञ्चमात्रोद्भवमिति इन्द्रराज्यसमं भवेत् ॥ 11 ॥ इन माताओं के भी विविध नाम हैं— (1.) बृहत् शुश्रूषया माता, (2.) पौरुषोद्भवा माता, (3.) स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता, (4.) गज माता और (5.) अश्वमाता। शेष सभी उपाङ्गवर्त्तिका हैं। इस प्रकार यह सब पञ्चमातृकाओं से बना स्वर्ग के इन्द्रलोक के राज्य के समान होता है। बृहत् शुश्रूषया मातायात् राज्ञो दिनचर्यायाः — बृहच्छुश्रूषया वक्ष्ये प्रहरादिन्त्यार्धकम्। प्राप्ते प्रत्यक्षप्रहरे शय्यायां रात्रितो गतौ ॥ 12 ॥¹ अब मैं बृहत् शुश्रूषया माता (आराम देने वाली मातृका, बड़ी तिमारदारी जैसी) के बारे में कहता हूँ जो रात्रि के पहले प्रहर से आरम्भ होकर आधे रात के बीतने तक आराम की नींद निकालने में राजा को सुखदायी होती है। रात्रि के प्रथम प्रहर बीतते ही राजा को शयन के लिए अपनी शय्या पर आराम से नींद लेने हेतु चले जाना चाहिए। शय्यास्थ उद्धवेद्राजा धर्ममूर्तिर्भवेत्सदा। गोदानयुक्त स्वर्णपादं निक्षिपेत् प्रतिभूतलम् ॥ 13 ॥ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में राजा को चाहिए कि वह शय्या से उठ जाए। उस ब्रह्ममुहूर्त काल में जागा हुआ राजा अपनी शय्या से उठकर बैठा हुआ एक प्रकार से धर्ममूर्ति स्वरूप ही होता है। अस्तु, उसे उठते ही सबसे पहला कर्त्तव्य गोदान करना होता

  1. 'बृहच्छुश्रूषया वक्ष्ये प्रहरादिज्यार्धकम् ?। प्राप्ते प्रत्यक्षप्रहरे शय्यायां संस्थितो गतौ ?' इति प्रकाशित पाठः। चाणक्य ने राजा की दिनचर्या बड़ी ही जटिल वर्णित की है। प्रशासन के भार को ध्यान में रखकर ही राजा की दिनचर्या निर्धारित करते हुए दिन-रात दोनों को आठ-आठ भागों में बाँट लिया गया था। समय का ध्यान सूर्य द्वारा या समय सूचक जलघड़ी से जाना जाता था। इस प्रकार समय का प्रत्येक विभाजन (नालिका) डेढ़ घण्टे के बराबर होता था। सामान्यतया रात्रि में डेढ़ से तीन बजे तक शयन, तूर्यवादन सुनकर उठना, शास्त्र व अगले दिन के कार्यों पर विचार करना। सुबह तीन से चार बजे तक नीति व योजनाओं का निर्धारण करना और उनके अनुसार अपने गुप्त दूत भेजना। सुबह साढ़े चार से छह बजे तक यज्ञ कराने वाले पुरोहित, राजगुरु व कुलपुरोहित के साथ बैठना, आशीर्वाद लेना इत्यादि...। विष्णुधर्मोत्तरपुराण, मनुस्मृति, शङ्खलिखितस्मृति, वृद्धवशिष्ठस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति आदि में भी इस प्रकार की दिनचर्या का वर्णन हुआ है।