अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७८ 451 है। इसलिए भूमि पर पाँव रखने से पूर्व उसे गोदान की स्वर्ण मुद्रा भूमि पर भेंट करके उन पर शय्या से उतरते समय अपना पाँव रखना चाहिए। दन्तकाष्ठादिकं स्नानमौषधादिकसम्भृतम्। ततो देवार्चनं कृत्वा स्नापनालेप्य पुष्षतः ॥ 14 ॥ इसके अनन्तर राजा को दन्तधावन हेतु (नीम या बबूल) का... चाहिए। स्नान के लिए प्रयोजन वाले जल में सुगन्धित द्रव्यों, औषधियों ...ना चाहिए। इसके बाद राजा को चाहिए कि वह देवार्चन करके अपने शरीर पर देवपुष्पों से केसर, कुङ्कुमादि का लेप करे, तिलक छापा लगाएँ। गन्ध-धूप-नैवेद्यैश्च पूजां कृत्वा अरार्त्तिकम्। पुरोहिते ततो दानमपूर्वं ¹स्तुति आदिकम्॥ 15 ॥ गन्ध-पुष्प, धूप, नैवेद्य से भगवान् की मूर्ति की पूजा करके आरती उतारें और पुरोहित से दान के पूर्व की स्तुति आदि करवाएँ। राजा गुरूद्गतं दानं शैवशास्त्रेणपूजनम्। भटेन स्तुतितो बोध्यं येनान्ते दर्शनं भवेत् ॥ 16 ॥ इसके उपरान्त राजा अपने गुरु के सामने दान का सङ्कल्प लेकर गुरु द्वारा प्रदत्त जल को छोड़े, फिर भट अर्थात् पूजा पाठ कराने वाले पण्डित के द्वारा की जाने वाली देवस्तुति को सुनते-समझते हुए साथ-साथ स्तुति करें; उसके बाद ही लोक, प्रजा को दर्शन देवें। गोपूजां च ततः कृत्वा योगिनीं च कुमारिकाम्। अनास्तिके कृपादानं शस्त्रार्थे तु निरो(रु!)पणम् ॥ 17 ॥ इसी बीच, गोपूजा करके योगिनी और कुमारिकाओं व आस्तिक लोगों पर कृपा करता हुआ शस्त्र धारण करने हेतु अर्थात् तलवार, कमरबन्ध आदि से सुसज्जित होने हेतु अग्रसर हो। वस्त्रशृङ्गारकं कृत्वा सिंहासनसुसंस्थितः। चतुष्कतिलकं कृत्वा प्रवृत्तस्तिलकेश्वरः ॥ 18 ॥ साथ ही वस्त्रादि से अपना शृङ्गार करके सिंहासन पर जाकर विराजित हो जाए और चौकोर तिलक लगाने के बाद तिलकेश्वर रूप में प्रवृत्त हो जाएँ।
- 'समवादिकम्?' इति प्रकाशित पाठः। विष्णुधर्मोत्तरपुराण में आया है— स्नानं कुर्यात्ततः पश्चाद्दन्तधावनपूर्वकम्। औषधैर्मन्त्रपूतैस्तु पानीयैर्विविधैः शुभैः ॥ सन्ध्यामुपास्य प्रयतः कृतजप्यः समाहितः। (वीरमित्रोदय, राजनीतिप्रकाश पृष्ठ 156)