अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें452 अपराजितपृच्छा नरवीरभटाश्चैव प्रणमन्ति महीपतिम् । धर्मोपदेशं दत्वा च तथा जलसमाकुले ॥ २१ ॥ इस अवसर पर राजा को सभी नरवीर और भटगण (ठाकुर, उमराव, सामन्तादि) प्रणाम करें और अपनी भक्ति-निष्ठा राजा के प्रति व्यक्त करें। इसके बाद, राजा सभी जन समुदाय को धर्मोपदेश (यथोचित आज्ञादि) करें। शृङ्गारं च ततः कृत्वा दिव्यालङ्कारशोभितम् । सभामण्डले गवाक्षे महासिंहासने स्थितम् ॥ २०॥ चतुष्कावसरे चैव वर्तते जनसङ्कुलम् । प्रणिपत्य समस्तैश्च मण्डलेश्वरकादिभिः ॥ २१ ॥ राजा को चाहिए कि वह दिव्य अलङ्कारों से विभूषित होकर, शृङ्गार करके सभा मण्डप के झरोखे में रखे हुए सिंहासन पर विराजित होकर गवाक्ष से राजमहल के चौक में एकत्रित प्रजाजनों के सङ्कुल को दर्शन देकर उनका प्रणाम स्वीकार करें, उनमें यदि कई-एक मण्डलेश्वर भी हों तो उनका भी प्रणाम स्वीकारें। गजयुद्धं मेषयुद्धं विविधं मल्लयुद्धकम् । विधेयं छुरिकायुद्धं माहिषं कौर्कुटादिकम् ॥ २२ ॥ इसी प्रकार अपने आमोद-प्रमोद के लिए गजयुद्ध, मेंढ़ों की भिड़न्त, तरह- तरह के पहलवानों की कुश्ती, तलवार-छुरी की पैंतरे बाजी, भैंसों की भिड़न्त, मुर्गों-लावकों की लड़ाई जैसे अनुरञ्जनकारी आयोजन करके उत्सव जैसा वातावरण बनाए और जनता सहित स्वानन्द लें। पौरुषोद्भव मातायाक्रममाह — एषा पुरुषजा माता स्वीये स्वीये च राज्यके । वाटिकां च समाश्रित्य पूर्बाह्नो देवताश्रमम् ॥ २३ ॥ अब पुरुषजा माता के बारे में कहता हूँ। पूर्वाह्न काल में अपने-अपने राज्यों, ठिकानों से आए समस्त सामन्त-सरदारों, लघु राजा, माण्डलिक बगीचे में बने हुए देवमन्दिर के आङ्गन के आश्रम में एकत्रित हो जाएँ। गजाश्वरथकोष्ट्रासिकिरीटच्छत्रसङ्कुलैः । अलम्बचिह्नपताकैः टका ? स्तम्भैरनेकशः ॥ २४ ॥ उनके साथ आए हुए हाथी, घोड़े, रथ, ऊँट, तलवारों, मुकुटों, छत्रों के समूहों तथा लम्बी-लम्बी ध्वज-पताकाओं, रेशमी पटकों और नाना स्तम्भों से सज- धजकर महोत्सव आयोजित करें।