भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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प्रतिष्ठाप्य पुरे प्रीत्या राजगृहे उमापतिम्। कण्ठस्नानादिकं कृत्वा मण्डपे च शनैः स्थितैः ॥ २५ ॥ इसी अवधि में राजा अपने राजमहल में भगवान् उमापति शिव को प्रीतिपूर्वक प्रतिष्ठापित करके कण्ठ तक जल में डुबकी लगाकर स्नान करके धीरे से मण्डप में आकर बैठ जाएँ। प्रेक्षणीयं देवताग्रे वाद्यगीतनृत्यादिकम्। आरात्रिकं ततो दृष्ट्वा प्रदक्षिणविसर्जनम् ॥ २६ ॥ इसी बीच, देवता के आगे जो-जो प्रेक्षणीय वाद्य, गीत, नृत्यादि हों उनको करके भगवान् की आरती उतारकर दर्शन करें और प्रदक्षिणा कर सभा का विसर्जन करें। भुक्ताशनः स्थितो राजाऽग्रवृत्त्या जनसङ्कुलैः। भुक्त्वोत्तरं ततः स्थाने सैन्यावसरवर्त्तनम् ॥ २७ ॥ राजा अपने अग्रवर्ती जनसङ्कुल (सभासद, सामन्तादिगण) आदि के समूह के साथ भुक्तासन में स्थित हों अर्थात् भोजनशाला में जाएँ और पङ्क्ति में बैठकर भोजन करें। इस प्रकार सभी के साथ भोजन ग्रहण कर अपनी सेना के निरीक्षण के लिए सैन्यस्थान या शिविर-छावनी में जाने को (सैन्यावसर वर्त्तन) कार्यक्रम तय करें। स्त्रीणामङ्गोद्भवा मातायात्क्रमाह — स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता प्रवृत्तं जनसङ्कुलम्। अबला बाला स्त्रियश्च मुग्धाः प्रौढादिकास्तथा ॥ २८ ॥ एवं शय्यां महाराजः स्त्रीजनैः परिवेष्टितः। निद्रानन्तरतो वत्स वर्तते जागृती दशा ॥ २९ ॥ (अब मैं स्त्रीणामङ्गोद्भवा माता नामक आराम के विषय में बताता हूँ) इसमें प्रवृत्त होने पर राजा अबला, बाला, स्त्रियां, मुग्धा, प्रौढ़ादि विविध वयी महिलाओं की भीड़, जनसङ्कुलादि से घिरा रहता है और इस प्रकार घिरे-घिरे ही आराम के लिए अपनी शय्या पर लेट जाता है। इस प्रकार निद्रा लेकर हे वत्स! राजा पुनः जागता है। तत्र रीत्युपयोग्यं च शृङ्गारं क्रियते पुनः। द्वादशादित्यसङ्काशद्युतितोऽपि महान्नरः ॥ ३० ॥ जागने पर वह पुनः राजरीति के अनुसार उपयुक्त शृङ्गार धारण करता है और द्वादशादित्य की ज्योति के समान अपने तेज से प्रकाशित होकर शोभायमान होता है।