अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें454 अपराजितपृच्छा सभामध्ये समायातः स्थितः सिंहासने तथा। सर्वावसरकं तत्र प्रवृत्तं जनसङ्कुलम्॥ ३१॥ वह सभा के मध्य में आकर अपने सिंहासन पर विराजमान होकर अपराह्न काल में सर्वावसरक अर्थात् राजकीय सभी अवसरों के कार्यों के निस्तारण के लिए एकत्रित राजसभा के जनसङ्कुल में प्रवृत्त होता है। राजसभासदवर्णनं — द्वादशदण्डनायकाः₁₂ प्रतीहारद्वयी₂ तथा। अमात्यराजकरणाः श्रीकरणा वयस्कराः॥ ३२॥ राजा की सभा में, राजा के सामने बारह दण्डनायक, दो प्रतिहारी तथा आमात्य, राज्याधिकारी, कोषाधिकारी व अन्य वयस्क कर्मचारी होने चाहिए। चत्वारो₄ मण्डलेशाश्च मण्डलीकाश्च द्वादश₁₂। महासामन्ता द्विरष्ट₁₆ सामन्ताश्च युगाष्टकाः₃₂॥ ३३॥ इसी प्रकार चार मण्डलेश, बारह मण्डलीक, सोलह महासामन्त तथा बत्तीस सामन्त होने चाहिए।¹ लघवः षष्ट्युत्तरं चतुःशतं₄₆₀ चतुरंशिकाः। शेषास्तु राजपुत्राश्च असङ्ख्यातास्तथैव च॥ ३४॥ इसी प्रकार चार सौ साठ लघु सामन्त जो कि चतुरंशिकाः अर्थात् चौथ जमा कराने वाले या चतुर्थांश के अधिकारी होते और शेष राजपुत्र जिनकी संख्या निश्चित नहीं है, वे इस सभा में आएँगे। स्वर्णालङ्कारखचितैर्नेकरत्नैस्तु सङ्कुलैः। दिव्यशृङ्गारकैः सर्वे महाराजप्रत्यात्मिकाः॥ ३५॥ ये सभी दरबारी जन स्वर्णाभूषणों से अलंकृत, अनेकों रत्नों से जटिल गहनों को धारण करके और दिव्य वस्त्रों से भूषित ऐसे लगते हैं मानों ये सब महाराज के ही प्रतिरूप हों। अथ गजमातायात्क्रम माह — गजाः शृङ्गारयुक्ताश्च आनीतास्तु महोत्कटाः।
- मेवाड़ रियासत में सोलह-बत्तीसों की परम्परा रही है। सोलह उमराव और बत्तीस राव सभा में होते थे। इनके ठिकानों को इसी दृष्टि से सम्मान दिया जाता था। महाराणा कुम्भ के काल में यह परम्परा थी। अमरसिंह द्वितीय के शासनकाल में भी इन कोटियों के अधिकार, मर्यादा आदि तय की गई।