अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७८ 455 युध्यमानास्तथा ¹कुर्यान्तरांश्च मारणे रतान् ॥ ३६ ॥ गजोद्भवा तत्र माता अश्वमाता सन्धोद्गमैः ? । सभा के अवसर पर राजा व सभासद के सामने निरीक्षण के लिए सजे-धजे, आभरणों से भूषित, महोत्कट गजदलों को लाया जाता है जो युद्ध में लड़ने के निमित्त ही तैयार किए हों तथा नरों को मारने में रत रहने के लिए पूरी तरह से सिखाए गए हों। यह चतुर्थ गजोद्भवा माता के बारे में कहा गया, इसी तरह पाँचवीं अश्वमाता के बारे में भी सन्धिकाल को समझें। परराष्ट्रोद्भवा ये च समये तत्र दर्शयेत् ॥ ३७ ॥ तस्यां ? मनोभवः कम्पः स्वराज्यं च स्वर्गा( ?-र्गा )त्पतिः । लघुराष्ट्रोद्भवा ये च प्रसङ्गे दर्शयेदपि ॥ ३८ ॥ इस बीच, सभा में कोई परराष्ट्र में जन्मे व्यक्ति तथा राजदूत आदि दिखाई देते हों तो राजा उनके मनोभाव, कम्प-दशा, उनके राज्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए भेंट करें, उनके पूर्वजों के बारे में भी जानकारी लें। इसी तरह लघु राष्ट्रों में उत्पन्न कोई लोग इस प्रसङ्ग में दिखाई दें तो उनसे भी प्रेमपूर्वक भेंट का अवसर प्राप्त किया जाए। महाराजाधिराजश्च परमेश्वरसञ्ज्ञितः । भुवनैकनाथो महाराजचक्रचूडामणिः ॥ ३९ ॥ क्योंकि, यह ज्ञातव्य है कि महाराजाधिराज एक प्रकार से परमेश्वर स्वरूप हैं जो इस पृथ्वी का एकमेव स्वामी है और महाराज चक्रचूड़ामणि हैं अर्थात् एक चक्रवर्ती, एकछत्र महाराजाधिराज है। भूपालः सर्वकलाकुशलः उमापतिवरलब्धप्रतापतेजाः । तथाऽन्यनृपाद्यमुखदर्पणो धर्मादिप्रशस्यावतारः ॥ ४० ॥ ऐसा भूपाल सब कलाओं में कुशल और उसे उमापति भगवान् शिव का वरदान प्राप्त है और उसी के प्रताप, तेज से तथा अन्य राजाओं के लिए मुखदर्पण की तरह आदर्श रूप है जो धर्मादि के प्रशस्त-मान्य अवतार स्वरूप ही है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजाधिराजाधिकारो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 78 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराजाधिराज अधिकार नामक अठहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 78 ॥
- 'कुर्यान्नृवांश्च' इति प्रकाशित पाठः।