भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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430 ...क्षा गजशालाप्रमाणहस्तिलक्षणकमेकोनाशीतितमं सूत्रम् ॥ 79 ॥ अधुना गजशालार्थं क्षेत्रभक्तिविधिं। विश्वकर्मोवाच — लक्षणं गजशालानां कथयिष्याम्यनुक्रमात् । षट्त्रिंशद्भिः पदैर्भक्तं क्षेत्रं विंशतिभिः करैः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं अनुक्रम से गजशालाओं (हाथी बान्धने के ठाणों, पीलखाना) के बारे में कहता हूँ और उनके लक्षण बताता हूँ। इसके लिए सर्वप्रथम बीस गज के लम्बे चौड़े क्षेत्र को छत्तीस पदों में विभक्त करें। वेदांशमध्यगर्भाढ्यं गजस्थानं महोत्तमम्। दृढस्तम्भं भवेन्मध्यं घटैर्नवकरैर्युतम् ॥ 2 ॥ उन छत्तीस पदों में मध्य के चार पदों के गर्भस्थान को महोत्तम गजस्थान अर्थात् गज का ठाण समझें। इस गजस्थान के मध्य में नौ गज के पाषाण के घड़े हुए दृढ़ स्तम्भ अर्थात् खुमाल बनाएँ। अलिन्दवेष्टितं भागे भागे भित्त्या च संयुतम्। विस्तरोच्छ्रयतुल्यश्च पट्टानामुदयो भवेत् ॥ 3 ॥ इसके लिए अलिन्द या बरामदा बनाएँ जिसके बाहर भींत बनी हों। उस भींत की ऊँचाई उसके विस्तार के बराबर हो अर्थात् क्षेत्र के दो पद लगभग सात गज (चौदह फीट) हो और उस पर पट्टियों की छवाई की छत बनाई जाएँ। भित्तित्रयसमायुक्तं द्वारमग्रदिशान्तिके। छाद्यत्रयं क्रमयुक्तं घण्टाकलशभूषितम् ॥ 4 ॥ तीन ओर तीन भित्ति हो और आगे का भाग द्वार के रूप में खुला छोड़ें और तीन ओर की छत की छवाई पर गुम्बज और कलश बनाकर उसको सुन्दर रचना प्रदान करें।¹

  1. अमरकोश में गजशाला को वारी कहा गया है— वारी तु गजबन्धनीयत्यमरः। वराहमिहिर ने योगयात्रा में वारी या गजशाला के निर्माण की विधि इस प्रकार दी है— 150 हाथ लम्बा और 120 हाथ चौड़ी चतुष्कोण या वृत्ताकार हस्तिशाला के लिए वृद्धिकारक होती है। दस हाथ ऊँचा, दस हाथ लम्बा व चौड़ा तथा एक हाथ गहरा हस्तिस्थान बनाना चाहिए। हस्तिशाला का द्वार पूर्व दिशा में होना चाहिए, उत्तर में भी द्वार शुभदायक होता है किन्तु दक्षिण या पश्चिम में कभी द्वार नहीं रखना चाहिए। पूर्व व उत्तर दिशा में द्वार स्तम्भ गाड़ना चाहिए। उसमें सुदृढ काष्ठदण्डों को जोड़ना चाहिए तथा पश्चिम से पूर्व और दक्षिण से उत्तर की ओर अर्गला बनानी चाहिए। द्वार का विस्तार दस हाथ चौड़ा और दस हाथ ऊँचा रखना चाहिए। द्वार स्तम्भ के दोनों ओर चार-चार हाथ गड्डा खोदना चाहिए। द्वार के स्तम्भ की ऊँचाई चौदह हाथ से अधिक रखनी चाहिए। हस्तिशाला के द्वार के बाद घेरा बनाने में एक बड़े स्तम्भ