अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७१ 457 दन्तिन्यादि षड्विधा गजशालाह — दन्तिनी नाम विज्ञेया शाला विघ्नहरी सदा। अलिन्दयुक्तं भूस्थानं भित्तिर्बाह्यो तु भागिका ॥ ५ ॥ तस्या द्वारप्रदेशे तु कर्तव्यौ कूर्परावुभौ । कर्णप्रासादिका कार्या द्वितीयालिन्दसंयुता ॥ ६ ॥ इनमें 'दन्तिनी' नाम की गजशाला सभी विघ्नों को हरने वाली समझी गई है। यह अलिन्द अर्थात् बरामदा युक्त होती है। इसका भूमि स्थान बाहर की ओर भित्तियुक्त होता है। उसके द्वार के प्रदेश में दो कूर्पर अर्थात् खुमाले बनाए जाए, जो दोनों ओर हों। 'कर्णप्रासादिका' नामक गजशाला दूसरे प्रकार की है जिसके भी आलिन्द बने होते हैं। द्वे द्वे वातायने कुर्याद् द्विद्विदिक्षु त्रिभित्तिकाः । प्राग्ग्रीवोऽग्रे भवेच्छाला सुभद्रेयमुदाहृता ॥ ७ ॥ इस गजशाला के दो-दो झरोखे, वातायन प्रत्येक भींत में तीनों ओर की दिशाओं में बनाए जाएँ और उसके पूर्व की ओर एक शाला भी बनाएँ जो सुन्दर भद्र या दीवारों युक्त बनी हों। अस्या एव यदा स्यातां प्राग्ग्रीवौ पार्श्वयोर्द्वयोः । तदा सुभोगदा नाम तृतीया परिकीर्तिता ॥ ८ ॥ ऐसी ही एक अन्य गजशाला के पूर्व की ओर आगे दोनों पाश्र्वों में शाला बनी हो, तो ऐसी गजशाला को 'सुभोगदा' नामक तीसरी गजशाला कहा जाता है। अस्या एव यदा पश्चात् प्राग्ग्रीवः क्रियतेऽपरः । भद्रिका नाम शाला सा तदा द्विरदपुष्टिदा ॥ ९ ॥ के बाद पाँच छोटे-छोटे स्तम्भ स्थापित करने चाहिए। उन स्तम्भों को चार-चार हाथ नीचे गाड़ना चाहिए। उन स्तम्भों में क्रम से छह, सात, आठ, नौ और दस छिद्र बनाने चाहिए और मातृका यानी कील छह अङ्गुल की बनानी चाहिए। इनको क्रमशः वेध योग्य छिद्रों में वेधित करना या ठोंकना चाहिए। इस प्रकार हस्तिशाला का सुदृढ़ द्वार बनाना चाहिए — सार्धं हस्तशतं दैर्घ्या सविंश विपुलाशतम्। चतुरस्राऽथवा वृत्ता वारी वारणवृद्धिदा ॥ दशावगाहेन करा विस्तीर्णा दश चोपरि। अधः खातस्य पदवी हस्तमात्रा प्रकीर्तिता ॥ कर्तव्यं पूर्वतो द्वारमुत्तरं वा शुभावहम्। दक्षिणं पश्चिमं वाऽपि न कर्तव्यं कथञ्चन ॥ मेढकस्तम्भ मातृणां वृक्षाग्रं नावनौ क्षिपेत्। पूर्वाग्रञ्चोत्तराग्राच्च संयोज्या नित्यमर्गला ॥ दश विस्तारतो द्वारं पार्श्वयोस्तस्य मातृकाः। चतुर्दशकरोत्सेधा निःखात्य चतुरः करान् ॥ षट्सप्तमेढान्तरस्थाश्च मेढकाः पञ्च पञ्च च। चतुर्हस्तनिखातास्ते समुच्छ्रायान्वदाम्यतः ॥ षट्सप्ताष्टनवोत्सेधा दश चेति यथाक्रमम्। नव वा दश वा वेधा मातृका याः षडङ्गुलाः ॥ वेधहान्यावशेषाः स्युर्मातृकाः क्रमशोऽपराः। इति द्वारसमासोऽयं वार्य्यासम्मपरिकीर्तितः ॥ (योगयात्रा 10, 2-9)