भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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ऐसी ही एक अन्य गजशाला के पीछे की ओर प्राग्रीव शाला बनी हो तो उसे 'भद्रिका' नामक गजशाला कहते हैं जो हाथियों को पुष्टि देने वाली मानी जाती है। यह चौथे प्रकार की गजशाला है। पञ्चमी चतुरश्रा स्याद् वर्षिणी नाम पूजिता। प्राग्ग्रीवालिन्दनिर्यूह-हीना षष्ठी तथा परा ॥ 10 ॥ शाला प्रमारिका धान्यधनजीवितहारिणी। तदेतां वर्जयेदन्याः कुर्यात्सर्वार्थसिद्धये ॥ 11 ॥ पाँचवें प्रकार की गजशाला का नाम 'वर्षिणी' है जो भी चौकोर आकार वाली होती है। इसी तरह प्राग्रीव, अलिन्द व निर्यूह से रहित छठवें प्रकार की गजशाला भी होती है जिसका नाम 'प्रमारिका' कहा गया है। ऐसी गजशाला धान्य, धन और जीवन का नाश करने वाली होती है। अस्तु, यह वर्जनीय है। इसे न बनाए और अन्य सभी पाँचों प्रकार की गजशालाएँ सर्वार्थ सिद्धिदायक होती है, अतः उन्हें अवश्य बनाएँ। प्रमाणमिति शालानां हस्तिशालाः क्रमोदिताः। षड्विधच्छन्दजा उक्ता वित्तजीवितवृद्धये ॥ 12 ॥ इति षड्विधा¹ गजशालाः। इस प्रकार मैंने गजशाला का क्रमिक प्रमाण और स्वरूप बताया, जो छह प्रकार के छन्दों में निर्मित होती है और जिनसे धन और जनजीवन की वृद्धि होती है। अधुना भद्रादीनां चतुर्विधा गजलक्षणमाह — अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हस्तिनां लक्षणं परम्। गजा भद्रो मृगो मन्द्रः सङ्कीर्णश्च चतुर्विधाः ॥ 13 ॥ अब मैं हाथियों के प्रधान लक्षणों को कहता हूँ। हाथियों के चार प्रकार होते हैं यथा— (1.) भद्र. (2.) मृग. (3.) मन्द्र और (4.) सङ्कीर्ण। मुखन्ये ( स्य ) द्विगुणा दैर्घ्यं दीर्घाजे² जठरं भवेत् ? । जठरार्द्धं भवेद् गात्रं गात्रार्द्धं करमूलतः ॥ 14 ॥ मूलार्द्धं च भवेदग्रं तत्तुल्या दंष्ट्रिकोत्तमा। दंष्ट्रास्थौल्यार्द्धनखाश्च क्रमेण परिकीर्तिताः ॥ 15 ॥

  1. गजशाला का उक्त वर्णन समराङ्गणसूत्रधार से उद्धृत है। (द्रष्टव्य समराङ्गण. अध्याय 32)
  2. दीर्घाद्धे- स्यात्।