भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७९ 459 हाथी के प्रमाण के लिए उसके मुख को आधार माना गया है। हाथी के मुख से उसकी लम्बाई दुगुणी होती है और लम्बाई का आधा उसका जठर या पेट होता है। जठर का आधा उसका गात्र होता है और गात्र का आधा उसकी सूण्ड का मूल भाग होता है। उसकी सूण्ड के मूल भाग का आधा उसकी सूण्ड का अग्रभाग होता है और उसके बराबर ही उसके दाँत की मोटाई होती है। उसके दाँत की मोटाई से आधा उसका नख भाग होता है, यह सब मैंने क्रमवार बता दिया है। स्थिरास्थिरैर्न्यतस्यास्ता युग्मं कुम्भानुवृत्तोद्भवा ?। तस्याधो चाग्रगर्भे तु वायु(क्तं) कुम्भास्तदोर्ध्वतः ?॥ 16 ॥ (पाठ अस्पष्ट है फिर भी) हाथी के स्वभावानुसार अपने सिर को स्थिर व कभी अस्थिर रखता, इधर-उधर झूमता हुआ, सिर पर दो कुम्भों के समान गोल- गोल कुम्भ स्थल उभरे होते हैं। उन दोनों के नीचे की ओर आगे के गर्भ भाग के एक ओर कुम्भाकार उभार होता है, जो हाथी के ललाट का उभरा हुआ भाग होगा। कुम्भकार¹ललिताङ्गुष्ठावुभौ दंष्ट्रानुमध्यतः ?। निम्न निम्ना दीर्घकरैर्भूत्प्राप्ते कदस्तकुण्डलीकृता ?॥ 17 ॥ इसी तरह हाथी के दाँतों के मध्य भाग में भी दोनों ओर कुम्भ के आकार का उभरा हुआ सुन्दर अङ्ग होता है जो दाँतो के ऊपर होठ का काम करता है और उसके नीचे-नीचे होती हुई एक लम्बी सूण्ड भूमि तक जाती हुई आगे जाकर कुण्डली रूप में मुड़ जाती है। पद्मपत्रस्तदा तुष्टं विपुलं कपोलं गम्भीरतः ?। सौम्यत्तमद गण्डस्थलः श्रवणा शोषपर्णवाकृति ? ॥ 18 ॥ उसके बड़े बड़े कमल पत्तों के समान गम्भीर कपोलों से निकले हुए दो कान होते हैं जिनके पास के गण्डस्थल, ललाट भाग से शीतल मद झरता रहता है, उसके कान बड़े पड्ढे की तरह बने होते हैं। वायुकुम्भोभयपाश्र्वे सूक्ष्म पिङ्गलोद्भवाः ?। हयखुराकारमेतद् दंष्ट्रावर्णश्च चम्पकः ॥ 19 ॥ हाथी के मस्तक के दोनों ओर वायुकुम्भ अर्थात् गलफड़े कुछ-कुछ पीलेपन से युक्त होते हैं जो घोड़े की खुरों के आकार के होते हैं। उनसे ही चम्पक के सफेद रङ्ग के समान रङ्ग वाले दाँत निकले होते हैं।

  1. 'कुम्भाकार'-इति स्यात्।