अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 505, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्रे तु तादिसि पुच्छान्त पृष्ठ अर्धोन्नता।¹ ग्रीवास्तु ललिताङ्गाश्च वृत्ता ²पादपोत्तमाः ॥ 20 ॥ सुविस्तीर्णा यस्य कुक्षिरर्धचन्द्राकृतिर्नखः। सामान्यं मेढ्रमूलं च भद्राख्यः सर्वकामदः ॥ 21 ॥ आगे की ओर से पुच्छ के अन्त तक हाथी की पीठ आधे में कुछ उठी हुई होती है और हाथी की ग्रीवा बड़ी सुन्दर अङ्ग की गोल पेड़ के आकार की यानी पादप के गोल स्तम्भ जैसी। हाथी की काँख काफी विस्तीर्ण होती है। पाँवों के नख अर्धचन्द्राकृति के होते हैं। हाथी का मेढ्रमूल (जननेन्द्रिय का मूल) सामान्य होता है— ऐसे स्वरूप या लक्षण वाला 'भद्र' नामक हाथी होता है जो सकल मनोकामना पूर्ण करता है। वादित्रैश्च समुत्साही सङ्ग्रामे चैव दुर्धरः। सदानन्दोद्यतकरः प्रकरे सैन्यके पतिः ॥ 22 ॥ भद्र नामक हाथी गाजे-बाजे, नगारे, रणभेरी आदि वाद्यों के बजने पर बड़ा उत्साही हो जाता है और ऐसी स्थिति में संग्राम स्थल में बड़ा दुर्धर या पराक्रमी हो जाता है। सदा वह आनन्द में अपनी सूण्ड को ऊपर उठाए हुए सेना के समूह का नेतृत्व करता है मानो सेनापति स्वयं हो। अविघ्नाक्षः साधुजने कालः क्रूरजने सदा। महोत्कटो हस्तिबिम्बे नृपदृष्टेऽतिनन्दकृत् ॥ 23 ॥ यह भद्र हाथी बड़ा ही समझदार होता है। यह सज्जनों को कोई विघ्न नहीं पहुँचाता परन्तु क्रूर और दुष्ट जनों के लिए यह कालरूप बन जाता है— यह उसका सदा का ही स्वभाव है। ऐसे महोत्कट, बलवान और समझदार हाथी का बिम्ब अर्थात् शरीर-स्वरूप राजा की दृष्टि को बड़ा आनन्द पहुँचाने वाला होता है अर्थात् राजा ऐसे गुणवान हाथी को देख-देख कर सदा प्रसन्न रहते हैं। पूजनीयः सदा राज्ञः तद्दन्तश्रीमहोत्तमा। तदेवा नृप सङ्कल्पं³ सर्वानन्दकरो भवेत् ॥ 24 ॥ इसलिए ऐसा भद्रक हाथी राजा के लिए सदा पूजनीय है और उसके दाँतों की शोभा बड़ी महान है और उसी के अनुरूप राजा के सभी सङ्कल्प भी सर्वानन्द करने
- 'अग्रे त चा द्रिसी पुच्छाद्यं पृष्ठ अर्धोन्नता ?' इति प्रकाशित पाठः।
- 'पादकोत्तमाः ?' इति प्रकाशित पाठः।
- 'तदेवानप सकलापं ?' इति प्रकाशित पाठः।