अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७९ 461 वाले होते हैं। समुद्रा सवक्त्रा सारी आपसे बालदंष्ट्रिणाम्। तस्य दन्ता भुजा सञ्ज्ञा धनुर्हस्ताबाणोत्तमैः ॥ २५ ॥¹ अपने मुख मुद्रा के ढंग से अर्थात् कठोर दाँतों से युक्त होने से उसके दाँत ही उसकी भुजा का नाम रखने वाले और महत्व के होते हैं मानो वे हाथों में धनुष और बाण लिए हुए हो। रिपुराजनृपाः सर्वे चिन्तात्मानो भयातुराः । आयुधत्यक्ताग्रतश्च स भवेद् भुवनेश्वरः ॥ २६ ॥ इति भद्रजातिलक्षणम्। ऐसे बलवान और उत्तम गजराज से सभी शत्रु राजागण सदा चिन्ता में रहकर भयातुर रहते हैं और वे अपने आयुधों को उसके आगे त्याग कर ही (हथियार डालकर) कृपाकांक्षी बने रहकर अपनी भूमि के स्वामी बने रह सकते हैं।² अथ मृगजातिलक्षणमाह — दीर्घवक्त्रः श्रीमुखश्चाऽपि निर्मांसकपोलकः । सुलोचनश्चलनेत्रः श्रवणद्वयातिक्रमः ॥ २ ॥ भूम्यन्तं करदीर्घत्वं दन्तोर्ध्वं क्षामविस्तरम्। तनुर्दीर्घोदरं क्षामं लघुमारः पवनात्मजः ? ॥ २८ ॥ वातात्मजमहावेगोऽङ्कुशमानयते क्रमम्। उच्चनीचसमान् भागान् क्रमते शीघ्रचेतसा ॥ २९ ॥ द्वितीय मृग जाति का गज लम्बे मुख और सुन्दर मुख वाला होने पर भी निर्मांस कपोल, सुन्दर और चञ्चल नेत्रों वाला, बड़े-बड़े दो कानों वाला, भूमि तक पहुँचती लम्बी सूण्ड वाला होता है। उसके दाँतों का ऊपरिभाग कम विस्तार वाला
- 'समुद्र सवक्ता सारी आपसेवालदंष्ट्रिणाम् ? । तस्य दन्ता भुजा राज्ञा ? धनुर्हस्ताबाणोत्तमैः ? ॥' इति प्रकाशित पाठः ।
- पालकाप्य के गजशास्त्रम् में हाथियों का वर्णन विस्तार से हुआ है। भद्रादि संज्ञक गजों के लिए कहा गया है— धैर्यं शौर्यं पटुत्वं च विनीतत्वं सुकर्मता। अन्वर्थवेदिता चैव भयरूपेष्वमूढता॥ सुभगत्वं च वीरत्वं भद्रस्यैते गुणाः स्मृता। तेजांशकत्वाद्भद्रस्य नवपूगफलप्रभः॥ कृते कामप्रचारास्तु कामरूपधरा गजाः। त्रेतायां द्वापरेऽन्यत्र वाहनत्वेन योजिताः ॥ त्रेतायां तद्गुणे किञ्चिन्मन्दत्वान्मन्द उच्यते। द्वापरे तु युगे सर्वे मृगतां प्राप्य संस्थिताः ॥ कलौ तद्गुणसाङ्कर्यात्सङ्कीर्ण इति कथ्यते। कृते भद्रगुणाः सर्वे भवन्ति करिणां यतः ॥ ततस्तत्र समुद्भूतो भद्र इत्यभिधीयते। जायते समद्वारः भद्रनामा मतङ्गजः। नवा, ष्टौ, सप्त, चायामो सप्त, षट्, चोच्च्छ्रयः । (गज. 8, 1; तुलनीय बार्हस्पत्य संहिता वीर मित्रोदय में उद्धृत)