अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें462 अपराजितपृच्छा यानी पतला होता है। उदर पतला और लम्बा होता है। वह लघुमार और फुर्तीला होता है। वह बड़ा वेगवान और कठिनाई अर्थात् धीरे-धीरे अङ्कुश में आता है। उसके लिए उबड़-खाबड़ भूमि कोई मायने नहीं रखती। वह किसी भी प्रकार की भूमि पर बड़ी शीघ्रता से आक्रमण कर सकता है। वादित्रे रमणीयत्वं समुत्साहेन नन्दति। सङ्ग्रामे दुर्धरो घोर आरोहे चाऽऽक्रमेन्महीम् ॥ ३० ॥ बाजो-गाजों के बीच रमणीय समारोह में वह बड़े उत्साह से आनन्दित होता है और संग्राम के अवसर पर बड़ा ही दुर्धर हो जाता है तथा घोर आक्रामक होकर भूमि पर आक्रमण के लिए उद्यत होता हुआ आरोही हो जाता है। शृङ्गारानन्दरूपैश्च करे शृङ्गारकं विना। मृगस्य लक्षणं चैतत् कथितं त्वपराजित ॥ ३१ ॥ इति मृगजातिलक्षणम्। इस प्रकार के हाथी किसी भी शृङ्गार के बिना भी शृङ्गारानन्द प्रदान करते हैं। ये सब सुन्दर लक्षण हे अपराजित ! मैंने तुम्हें मृग संज्ञक हाथी के बताए हैं।¹ अथ मन्द्रजातिलक्षणमाह — मन्द्रं च कथयिष्यामि शृणु चैकाग्रमानसः। सुभरौ कपोलावङ्गं आत्मा गम्भीर एव च ॥ ३२ ॥ अब मैं मन्द्र गज के लक्षण कहता हूँ जिसे एकाग्र मानस से सुनो। ऐसा मन्द्र नामक हाथी भरे हुए कपोलयुक्त होता है। उसकी आत्मा भी बड़ी गम्भीर होती है। बृहच्च जठरं कुक्षी विपुले विस्तृतेऽन्यतः। रक्ताक्षोऽधोवक्त्रकश्च क्षुद्रदृष्टिनिरीक्षकः ॥ ३३ ॥ दुःखितौ च यदा कुम्भौ आद्येकादिषु पते ध्रुवम् ?। मदं विना समोदश्च रतो वै तारकर्मणि ॥ ३४ ॥ उसका जठर भी बड़ा होता है। उसकी कमर भी काफी विस्तृत और फैली हुई होती है। उसकी आँखें लाल-लाल होती है और वह सदा नीचे की और मुख लटकाए और क्षुद्र दृष्टि अर्थात् आस-पास ही देखता है। यदि इस प्रकार के हाथी
- पालकाप्य का मत है— कृशकरचरणग्रीवाः स्थूलाक्षाः ह्रस्ववालमेढ्रोष्ठाः। संक्षिप्तपृष्ठवंशाः तनुमृगदन्ता मृगा ज्ञेयाः। नाहायामप्रहीणः कृशनिखिलतनुः धूसरच्छायदेहः। जिह्यो द्युत्तानवेदी चपलगतिमतिः क्रोधनः सिन्धुचारी। स्थूलाक्षो द्वापरस्थः शुभगतिरलसः राजसो ह्रस्ववालः चण्डः पित्तप्रधानो मृग इति कथितो दीर्घदन्तः सुगात्रः ॥ (गज. 8, मृग. 3)