अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७९ 463 के कुम्भ स्थल में कोई दर्द उठता है अर्थात् शिरःशूल होता है अथवा वह बिना किसी मदपान के भी आनन्द में होता है तो वह ऊँची कर्कश आवाज में चिङ्घाड़ने में मस्त हो जाता है। कृष्णशिराः श्वेतदन्तो न क्षमे ? प्रतिबन्धकः। वादित्रैर्भक्तिशब्दैश्च किञ्चित्कोपः प्रशाम्यति ॥ ३५ ॥ इसकी रक्तवाहिनी शिराएँ काली होती हैं। इसके दाँत श्वेत रङ्ग के होते हैं और यह किसी भी प्रतिबन्धक को सहन नहीं करता है। इसे उत्पात से काबू में लाने के लिए बाजों-गाजों से, मीठे शब्दों से फुसलाकर और बीच-बीच में कुछ-कुछ कोप दिखलाते हुए प्रशमित किया जाता है। स्वसैन्ये परसैन्ये वा दुर्धरः रक्तगन्धतः। एवमादिगुणैर्युक्तो मन्दजातिर्गजोत्तमः ॥ ३६ ॥ इति मन्दजातिलक्षणम्। यह हाथी अपनी सेना या शत्रु की सेना में रक्त की गन्ध पाते ही बड़ा दुर्धर और असाध्य हो जाता है। उक्त गुणों से युक्त यह मन्द जाति का गज बड़ा उत्तम होता है।¹ अथ सङ्कीर्णजातिगजलक्षणमाह — वृत्ताकारसंयुक्त आपादतलमस्तकम्। रूपवाँल्ललिताङ्गश्च दृढकायो लघुस्वहृत् ॥ ३७ ॥ चतुर्थ प्रकार का गज आपाद मस्तक गोल-मटोल आकार का, भरा-पूरा शरीराङ्ग वाला होता है। यह बड़ा रूपवान्, सुन्दर अङ्गों और दृढ़ शरीर वाला होता है। जनाकुले भीचकितो वादित्रैर्गच्छति ध्रुवम्। प्रतिबिम्बेन प्रविष्टो दन्तं दत्ते न वै रथे ॥ ३८ ॥ यह हाथी भारी भीड़ में भय से चकित हो जाता है और बाजों-गाजों से चमककर भागने लगता है, ऐसा निश्चय समझें। अपना प्रतिबिम्ब देखकर भी यह
- पालकाप्य ने इसके लिए मन्द संज्ञा दी है। उसका मत है— विपुलकरकर्णवदनाः महोदराः स्थूलपेचकविषाणाः। बहुलबललम्बमांसाः हर्यक्षाः कुञ्जराः मन्दाः॥ (गज. 8, 2) वराहमिहिर ने कहा है कि जिसके छाती और कक्षावलय या देह के मध्य का वलय ढीले हों, उदर लम्बा, चमड़ा स्थूल, कण्ठ, पेट और पूँछ के जड़ा हो और सिंह के समान निगाह हो, वह मन्द संज्ञक होता है— वक्षोऽथ कक्षावलयः श्लथाश्च लम्बोदरस्त्वग्बृहति गलश्च। स्थूला च कुक्षिः सह पेचकेन सैंही च दृङ्मन्दमतङ्गजस्य ॥ (बृहत्संहिता 67, 2)