अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें464 अपराजितपृच्छा दाँतों से भेंटी मारने पर उद्यत हो जाता है और कभी-कभी रथों, गाड़ियों से भी भड़क जाता है और उन्हें उलटाने लगता है। अनेकाडम्बरं दृष्ट्वा त्रासमेति निनादतः। आरेकान्ते पारवश्ये शीघ्रपादगतिक्रमः ॥ ३९ ॥ वह अनेक आडम्बरों को देखकर डर जाता है जोर-जोर से चिङ्घाड़ने लगता है और एकान्त की ओर परवश होकर शीघ्रता से भागने लगता है। भङ्गेन दापयेतस्य दुर्धरकारयेत्किलम्।¹ एभिर्गुणैश्च संयुक्तो नाम्ना सङ्कीर्णको गजः ॥ ४० ॥ इति सङ्कीर्णजातिलक्षणम् ॥ इसको भागते हुए रोकना कठिन होता है, इसको उत्कीलन करना भी निश्चित रूप से दुर्धर होता है। इन गुणों से युक्त यह सङ्कीर्ण जाति का सङ्कीर्ण गज नाम से विख्यात है।² अथ गजवननिरूपणमाह — अष्टौ वनानि ज्ञेयानि यतो गजसमुद्भवः । प्राचीलोहितके चैव पौरकौशलके अपि ॥ ४१ ॥ कच्छाख्यं चैव कृष्णाख्यं दाशेरं चैव सप्तमम्। अष्टमं माणिकं दण्डवनान्यष्टौ भवन्ति हि ॥ ४२ ॥ अब हाथियों के उद्भव होने के स्थानों में मुख्य आठ वनों के बारे में कहते हैं— (१.) प्राची, (२.) लोहित, (३.) पौर, (४.) कौशल, (५.) कच्छ, (६.) कृष्ण, (७.) दाशेर और (८.) माणिक। इस तरह हाथियों के दण्डवन आठ होते हैं।³
- 'भृङ्गो न दापयेत्तस्य ? दुर्धरः कारयेत्कलिम्' इति प्रकाशित पाठः ।
- लक्षणप्रकाश में 'पाराशरसंहिता' का मत उद्धृत करते हुए कहा गया है कि सङ्कीर्ण को ही मिश्र कहा जाता है। वह भद्र, मन्द्र, मृग तीनों का मिश्रण होता है— मिश्रस्तु तेषां परस्परसंयोगजः सर्वसङ्कुललक्षण इति। मिश्र एव सङ्कीर्ण इति कथ्यते। विष्णुधर्मोत्तर में आया है— सङ्कीर्णलक्षणो नागः सङ्कीर्णश्च निगद्यते॥ पालकाप्य के एक अन्य पाठ में आया है— बह्वाशी बह्वालीकश्च दन्तपातेषु चाक्षमः । गच्छेद्वक्रद्रुतवेगश्च भारं प्राप्यावसीदति ॥ कृच्छ्राच्चाप्यायते नागः क्षिप्रं च परिहीयते। कट्वम्ललवणैश्चैव रूक्षैश्चातुरतां व्रजेत्॥ नित्यं च सान्त्वयेदेनं न चैनमभितापयेत्। सर्वेषां लक्षणैः कैश्चिद्युक्तो मिश्रो भवेद्गजः ॥ (वीरमित्रोदय, पृष्ठ 352) इसी प्रकार लक्षणप्रकाशकार ने बार्हस्पत्यसंहिता से भी अनेक श्लोक उद्धृत किए हैं।
- पालकाप्य की संज्ञाएं किञ्चित् पृथक् हैं— पूर्वं नागवनं प्राच्यं ततश्चैदिकरूषकम्। दशार्णकं ततो विद्यात् ततः स्याद्वाङ्गरेयिकम ॥ कालिङ्गकं पञ्चमं स्यात षष्ठं स्यादपराजितम । सौराष्ट्रके सप्तमं स्यात ततः पाञ्चनदं