अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७९ 465 पूर्वे वेगवती तीरे प्राचीवनसमुद्भवः । जालन्धरकाश्मीरान्तं लोहितं वनमुच्यते ॥ ४३ ॥ पूर्व दिशा में वेगवती नदी के किनारे पर 'प्राची' वन नामक प्रदेश है। जालन्धर से लेकर काश्मीर के अन्त तक के भाग को 'लोहित' वन कहते हैं। वारुणोदधिमासाद्य वनं कच्छाभिधानकम् । गोदावरीदण्डकाख्यं कृष्णं तद्वनमुच्यते ॥ ४४ ॥ समुद्र के साथ लगा हुआ जो भाग है वहाँ 'कच्छ' वन नामक भूभाग है। गोदावरी नदी के किनारे दण्डक वन नामक स्थान पर 'कृष्ण' नामक वन कहा गया है। श्रीशैलः स्वामिदेवश्च मलयो नीलपर्वतः । त्रिकूटः पर्वतोश्चैते वनं दाशेरसञ्ज्ञकम् ॥ ४५ ॥ श्रीशैल, स्वामीदेव, मलय, नीलपर्वत तथा त्रिकूट पर्वतों के वन को 'दाशेर' वन कहते है। विन्ध्याख्यास्तु पर्यन्तं कलिङ्गरत्नपुरोदः ? । मणिकदण्डाभिधानं वनानामुत्तमोत्तमम् ॥ ४६ ॥ विन्ध्याचल पर्वत से लेकर कलिङ्ग, रत्नपुर तक के भूभाग को 'मणिक' दण्ड वन नाम से वनों में सर्वोत्तम वन कहा गया है। चौडबङ्गे कौशले च पौरे सौराष्ट्रके तथा। बदरीकोपकण्ठे च विदुर्घोरवनानि च ॥ ४७ ॥ चौडप्रदेश बङ्ग प्रदेश के वनों को 'कौशल' वन नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त सौराष्ट्र प्रदेश में पौर और बदरी के उपकण्ठ प्रदेश के वन को उर्घोरवन नाम से विद्वान लोग वनों को जानते हैं। परस्पर वनस्थितिं - प्राचीलोहितयोर्मध्यं सामान्यं पौरकौशले । कच्छे कृष्णे उत्तमं च दाशेर मणिकेऽधिकम् ॥ ४८ ॥ अब इन वनों की पारस्परिक तुलना करके देख रहे हैं। प्राची वन और लोहित वन के बीच में पौर और कौशल वन सामान्य कहे गए हैं। कच्छ के वन और कृष्ण वन उत्तम और दाशेर तथा मणिक वन तो इनसे भी अधिक उत्तम कह गए हैं। परस्पर गजस्थितिं - सामान्ये चैव सङ्कीर्णो मन्द्रश्चैवं त मध्यमे।