भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

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466 अपराजितपृच्छा उत्तमे मृगरूपश्च भद्राख्यश्चोत्तमोत्तमे ॥ 49 ॥ अब हाथियों की भी परस्पर तुलना करके देखें। सङ्कीर्ण नामक गज सामान्य होता है। मन्द्र नामक गज मध्यम होता है। मृग नामक गज उत्तम और भद्र नामक गज सर्वोत्तम होता है। स्वके स्वके वने चैव एकैकं च चतुर्विधम्। प्रमाणानि ततो वक्ष्ये हस्तसङ्ख्यादितः क्रमात् ॥ 50 ॥ सामान्यस्त्वेव षड्ढस्तो मध्यमः सप्तहस्तकः। उत्तमश्चाष्टहस्तो नवहस्त उत्तमोत्तमः ॥ 51 ॥ अब अपने-अपने वन के एक-एक के चार प्रकार और प्रमाण तथा उनके क्रम से विस्तार का हस्त संख्या प्रमाण दिया जाता है। सामान्य वन का हाथी 6 गज की लम्बाई वाला, मध्यम वन का हाथी 7 गज, उत्तम वन का हाथी 8 गज तथा उत्तमोत्तम वन का हाथी 9 गज की लम्बाई वाला कहा गया है।¹ मन्द्रो मृगश्च भद्रश्च सङ्कीर्णश्च चतुर्विधाः। प्रमाणानि च ख्यातानि कथितान्यपराजित ॥ 52 ॥ इस तरह हे अपराजित! मैंने तुम्हें 1. मन्द्र, 2. मृग, 3. भद्र और 4. सङ्कीर्ण चारों प्रकार के हाथियों के प्रमाण एवं उनकी ख्याति कही है। अन्यदप्याह — हस्तिधामश्रयं कुर्यात् पञ्च पञ्च त्रयाङ्कुशाम्। द्वार समद्भवोक्त्या सङ्ख्याश्च दशमेव च ॥ 53 ॥ पञ्चाश्रयाश्रयी शाला रन्ध सप्तहस्तोद्भवा। खण्डवार हारत्रयं कार्या सन्ताप शमको विदुः ॥ 54 ॥² (उक्त दोनों श्लोक भ्रष्ट हैं, साधु पाठ कल्पित करने पर निम्न अर्थ होगा) हस्तिधाम अर्थात् गजशाला के आश्रय में पाँच-पाँच त्रयांशक (सम्भवतया त्रिशूल जैसे भाले) जो हस्तिशाला के द्वारों की ऊँचाई के बराबर लम्बे हों और उनकी इस

  1. उत्पलभट्ट ने इस प्रसङ्ग में पराशरसंहिता का मत उद्धृत किया है— परिणाहौ दशसमो नवायामः स उच्छ्रयः। सप्तज्येष्ठप्रमाणस्य नागस्य समुदाहृतः॥ ज्येष्ठात् सप्तमभागोनो मध्यमो मध्यमाद्गजः। अन्त्यः षड्भागहीनः स्यादतोऽन्यो न स पूजितः॥ मुखादापेचकं दैर्घ्यं पृथुपार्श्वोदरान्तरम्। अनाह उच्छ्रयः पादाद्विज्ञेयो यावदासनम्॥ (बृहत्संहिता 67, 4 पर उद्धृत)
  2. 'हस्तिधामत्रयं कुर्यात् पञ्च पञ्च त्रयांकुशाम्?। द्वाद (र) सम (मु) दोक्त्व्या वंस्थाश्च दशमेव च ?॥ पञ्च (श्रा) श्रम तत्र यतारा गन्ध सप्तविधोद्भवा?। षड्द्वार हारत्रयकामं संतापशमक्तो विदुः?॥' इति प्रकाशित