अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
464 अपराजितपृच्छा दाँतों से भेंटी मारने पर उद्यत हो जाता है और कभी-कभी रथों, गाड़ियों से भी भड़क जाता है और उन्हें उलटाने लगता है। अनेकाडम्बरं दृष्ट्वा त्रासमेति निनादतः। आरेकान्ते पारवश्ये शीघ्रपादगतिक्रमः ॥ ३९ ॥ वह अनेक आडम्बरों को देखकर डर जाता है जोर-जोर से चिङ्घाड़ने लगता है और एकान्त की ओर परवश होकर शीघ्रता से भागने लगता है। भङ्गेन दापयेतस्य दुर्धरकारयेत्किलम्।¹ एभिर्गुणैश्च संयुक्तो नाम्ना सङ्कीर्णको गजः ॥ ४० ॥ इति सङ्कीर्णजातिलक्षणम् ॥ इसको भागते हुए रोकना कठिन होता है, इसको उत्कीलन करना भी निश्चित रूप से दुर्धर होता है। इन गुणों से युक्त यह सङ्कीर्ण जाति का सङ्कीर्ण गज नाम से विख्यात है।² अथ गजवननिरूपणमाह — अष्टौ वनानि ज्ञेयानि यतो गजसमुद्भवः । प्राचीलोहितके चैव पौरकौशलके अपि ॥ ४१ ॥ कच्छाख्यं चैव कृष्णाख्यं दाशेरं चैव सप्तमम्। अष्टमं माणिकं दण्डवनान्यष्टौ भवन्ति हि ॥ ४२ ॥ अब हाथियों के उद्भव होने के स्थानों में मुख्य आठ वनों के बारे में कहते हैं— (१.) प्राची, (२.) लोहित, (३.) पौर, (४.) कौशल, (५.) कच्छ, (६.) कृष्ण, (७.) दाशेर और (८.) माणिक। इस तरह हाथियों के दण्डवन आठ होते हैं।³
- 'भृङ्गो न दापयेत्तस्य ? दुर्धरः कारयेत्कलिम्' इति प्रकाशित पाठः ।
- लक्षणप्रकाश में 'पाराशरसंहिता' का मत उद्धृत करते हुए कहा गया है कि सङ्कीर्ण को ही मिश्र कहा जाता है। वह भद्र, मन्द्र, मृग तीनों का मिश्रण होता है— मिश्रस्तु तेषां परस्परसंयोगजः सर्वसङ्कुललक्षण इति। मिश्र एव सङ्कीर्ण इति कथ्यते। विष्णुधर्मोत्तर में आया है— सङ्कीर्णलक्षणो नागः सङ्कीर्णश्च निगद्यते॥ पालकाप्य के एक अन्य पाठ में आया है— बह्वाशी बह्वालीकश्च दन्तपातेषु चाक्षमः । गच्छेद्वक्रद्रुतवेगश्च भारं प्राप्यावसीदति ॥ कृच्छ्राच्चाप्यायते नागः क्षिप्रं च परिहीयते। कट्वम्ललवणैश्चैव रूक्षैश्चातुरतां व्रजेत्॥ नित्यं च सान्त्वयेदेनं न चैनमभितापयेत्। सर्वेषां लक्षणैः कैश्चिद्युक्तो मिश्रो भवेद्गजः ॥ (वीरमित्रोदय, पृष्ठ 352) इसी प्रकार लक्षणप्रकाशकार ने बार्हस्पत्यसंहिता से भी अनेक श्लोक उद्धृत किए हैं।
- पालकाप्य की संज्ञाएं किञ्चित् पृथक् हैं— पूर्वं नागवनं प्राच्यं ततश्चैदिकरूषकम्। दशार्णकं ततो विद्यात् ततः स्याद्वाङ्गरेयिकम ॥ कालिङ्गकं पञ्चमं स्यात षष्ठं स्यादपराजितम । सौराष्ट्रके सप्तमं स्यात ततः पाञ्चनदं
सूत्र-७९ 465 पूर्वे वेगवती तीरे प्राचीवनसमुद्भवः । जालन्धरकाश्मीरान्तं लोहितं वनमुच्यते ॥ ४३ ॥ पूर्व दिशा में वेगवती नदी के किनारे पर 'प्राची' वन नामक प्रदेश है। जालन्धर से लेकर काश्मीर के अन्त तक के भाग को 'लोहित' वन कहते हैं। वारुणोदधिमासाद्य वनं कच्छाभिधानकम् । गोदावरीदण्डकाख्यं कृष्णं तद्वनमुच्यते ॥ ४४ ॥ समुद्र के साथ लगा हुआ जो भाग है वहाँ 'कच्छ' वन नामक भूभाग है। गोदावरी नदी के किनारे दण्डक वन नामक स्थान पर 'कृष्ण' नामक वन कहा गया है। श्रीशैलः स्वामिदेवश्च मलयो नीलपर्वतः । त्रिकूटः पर्वतोश्चैते वनं दाशेरसञ्ज्ञकम् ॥ ४५ ॥ श्रीशैल, स्वामीदेव, मलय, नीलपर्वत तथा त्रिकूट पर्वतों के वन को 'दाशेर' वन कहते है। विन्ध्याख्यास्तु पर्यन्तं कलिङ्गरत्नपुरोदः ? । मणिकदण्डाभिधानं वनानामुत्तमोत्तमम् ॥ ४६ ॥ विन्ध्याचल पर्वत से लेकर कलिङ्ग, रत्नपुर तक के भूभाग को 'मणिक' दण्ड वन नाम से वनों में सर्वोत्तम वन कहा गया है। चौडबङ्गे कौशले च पौरे सौराष्ट्रके तथा। बदरीकोपकण्ठे च विदुर्घोरवनानि च ॥ ४७ ॥ चौडप्रदेश बङ्ग प्रदेश के वनों को 'कौशल' वन नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त सौराष्ट्र प्रदेश में पौर और बदरी के उपकण्ठ प्रदेश के वन को उर्घोरवन नाम से विद्वान लोग वनों को जानते हैं। परस्पर वनस्थितिं - प्राचीलोहितयोर्मध्यं सामान्यं पौरकौशले । कच्छे कृष्णे उत्तमं च दाशेर मणिकेऽधिकम् ॥ ४८ ॥ अब इन वनों की पारस्परिक तुलना करके देख रहे हैं। प्राची वन और लोहित वन के बीच में पौर और कौशल वन सामान्य कहे गए हैं। कच्छ के वन और कृष्ण वन उत्तम और दाशेर तथा मणिक वन तो इनसे भी अधिक उत्तम कह गए हैं। परस्पर गजस्थितिं - सामान्ये चैव सङ्कीर्णो मन्द्रश्चैवं त मध्यमे।
466 अपराजितपृच्छा उत्तमे मृगरूपश्च भद्राख्यश्चोत्तमोत्तमे ॥ 49 ॥ अब हाथियों की भी परस्पर तुलना करके देखें। सङ्कीर्ण नामक गज सामान्य होता है। मन्द्र नामक गज मध्यम होता है। मृग नामक गज उत्तम और भद्र नामक गज सर्वोत्तम होता है। स्वके स्वके वने चैव एकैकं च चतुर्विधम्। प्रमाणानि ततो वक्ष्ये हस्तसङ्ख्यादितः क्रमात् ॥ 50 ॥ सामान्यस्त्वेव षड्ढस्तो मध्यमः सप्तहस्तकः। उत्तमश्चाष्टहस्तो नवहस्त उत्तमोत्तमः ॥ 51 ॥ अब अपने-अपने वन के एक-एक के चार प्रकार और प्रमाण तथा उनके क्रम से विस्तार का हस्त संख्या प्रमाण दिया जाता है। सामान्य वन का हाथी 6 गज की लम्बाई वाला, मध्यम वन का हाथी 7 गज, उत्तम वन का हाथी 8 गज तथा उत्तमोत्तम वन का हाथी 9 गज की लम्बाई वाला कहा गया है।¹ मन्द्रो मृगश्च भद्रश्च सङ्कीर्णश्च चतुर्विधाः। प्रमाणानि च ख्यातानि कथितान्यपराजित ॥ 52 ॥ इस तरह हे अपराजित! मैंने तुम्हें 1. मन्द्र, 2. मृग, 3. भद्र और 4. सङ्कीर्ण चारों प्रकार के हाथियों के प्रमाण एवं उनकी ख्याति कही है। अन्यदप्याह — हस्तिधामश्रयं कुर्यात् पञ्च पञ्च त्रयाङ्कुशाम्। द्वार समद्भवोक्त्या सङ्ख्याश्च दशमेव च ॥ 53 ॥ पञ्चाश्रयाश्रयी शाला रन्ध सप्तहस्तोद्भवा। खण्डवार हारत्रयं कार्या सन्ताप शमको विदुः ॥ 54 ॥² (उक्त दोनों श्लोक भ्रष्ट हैं, साधु पाठ कल्पित करने पर निम्न अर्थ होगा) हस्तिधाम अर्थात् गजशाला के आश्रय में पाँच-पाँच त्रयांशक (सम्भवतया त्रिशूल जैसे भाले) जो हस्तिशाला के द्वारों की ऊँचाई के बराबर लम्बे हों और उनकी इस
- उत्पलभट्ट ने इस प्रसङ्ग में पराशरसंहिता का मत उद्धृत किया है— परिणाहौ दशसमो नवायामः स उच्छ्रयः। सप्तज्येष्ठप्रमाणस्य नागस्य समुदाहृतः॥ ज्येष्ठात् सप्तमभागोनो मध्यमो मध्यमाद्गजः। अन्त्यः षड्भागहीनः स्यादतोऽन्यो न स पूजितः॥ मुखादापेचकं दैर्घ्यं पृथुपार्श्वोदरान्तरम्। अनाह उच्छ्रयः पादाद्विज्ञेयो यावदासनम्॥ (बृहत्संहिता 67, 4 पर उद्धृत)
- 'हस्तिधामत्रयं कुर्यात् पञ्च पञ्च त्रयांकुशाम्?। द्वाद (र) सम (मु) दोक्त्व्या वंस्थाश्च दशमेव च ?॥ पञ्च (श्रा) श्रम तत्र यतारा गन्ध सप्तविधोद्भवा?। षड्द्वार हारत्रयकामं संतापशमक्तो विदुः?॥' इति प्रकाशित
अपि रदभङ्गखण्डने" -> वाम-प्य-र-द-भ-ङ्ग-ख-ण्ड-ने! वा (1) म (2) प्य (3) - वामप्य्! र (4) द (5) भ (6) ङ्ग (7) ख (8) ण्ड (9) ने (10) - wait, that's only 10! Wait, is the meter 11 syllables? What about: "क्षीरवृक्षफलपुष्पपादपेष्वापगातटविघट्टनेन वा।" क्षी-र-वृ-क्ष-फ-ल-पु-ष्प-पा-द-पे-ष्वा-प-गा-त-ट-वि-घट्-ट-ने-न वा Count: क्षी (1) र (2) वृ (3) क्ष (4) फ (5) ल (6) पु (7) ष्प (8) पा (9) द (10) पे (11) ष्वा (12) प (13) गा (14) त (15) ट (16) वि (17) घट् (18) ट (19) ने (20) न (21) वा (22) Wait! That's 22 syllables! That's NOT Trishtubh! 22 syllables in half a verse? That means
468 विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! अब तक तो मैंने हाथियों के बारे में कहा था। अब तुम अश्वाख्यान भी सुनो। ये अश्व आदि तेजोमय रूप है और समुद्र से उत्पन्न हुए हैं। अथाश्वोत्पत्तिदेशाः – तुरकाद्भवा विख्याताः प्रान्ता दक्षराष्ट्रोद्भवाः। महावन्तन्तोद्भवा¹ वेण्वा वेगवती तटे ॥ २ ॥ चञ्चलाश्चाण्डदेशे च डाहाले प्रतिचारकाः। एते चाष्टविधा₈ अश्वाश्चातुर्वर्ण्यं च कथ्यते ॥ ३ ॥ सामान्यतया तुरक देश में उत्पन्न अश्व विख्यात है। दक्षराष्ट्रोद्भव, महावनों के अन्त में उत्पन्न होने वाले, वेणु, वेगवती नदी के तट पर उत्पन्न होने वाले, चञ्चला, चण्ड देश में उत्पन्न होने वाले, डाहल में प्रतिचार करने वाले— ये आठ प्रकार के अश्व होते हैं। इनमें भी पृथक-पृथक चार वर्ण होते हैं।² अथाश्वाश्चातुर्वर्ण्यमाह – विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा अश्वाश्चत्वार उत्तमाः। इनमें (१.) ब्राह्मण, (२.) क्षत्रिय, (३.) वैश्य और (४.) शूद्र– ये चार प्रकार के उत्तम अश्व होते हैं। बहूदके प्रविष्टश्च पिबेत्तोयं शिरोद ये ॥ ४ ॥ स्थिरक्रमाद् गच्छति चाऽऽसने शुद्धमना स्थिरः। स्वामिनो रोहणे चेतः पश्येद्धृदयचक्षुषा ॥ ५ ॥ शब्दैश्च गर्जनाकारैः सङ्ग्रामे स्वामितारणः। एभिर्गुणैः समायुक्तः सोऽश्वो वै विप्रजातिकः ॥ ६ ॥ जो गहरे पानी में प्रवेश करके सिर तक डुबकी लगा कर पानी पीते हैं, जो स्थिरतापूर्वक क्रम से चलते हैं, स्वामी के आसन ग्रहण करते समय भी स्थिर चित्त से खड़े रहते हैं, स्वामी की सवारी को मन-ही-मन अनुभव करते हैं यानी मन की १. 'महावनान्तरुद्वेगा ?' इति प्रकाशित पाठः। २. हमारे यहाँ पर अश्वशास्त्र की विस्तृत परम्परा देखने में आती है। नकुल का अश्वशास्त्र, पराशरसंहिता, वररुचि कृत अश्वविद्या, किल्हण का सारसमुच्चय, गणकृत अश्वायुर्वेद, जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद, भोजकृत शालीहोत्रम् आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध है। नकुलकृत अश्वचिकित्सा में चार प्रकार अश्वों का वर्णन है। देश भेद से उत्पन्न अश्वों का वर्णन इस प्रकार आया है— चतुर्धा वाजिनो भूमौ जायन्ते देशसंश्रयात्। ताजिकाः
सूत्र-८० 469 आँख से देखते हैं। इनका हिनहिनाने का शब्द बड़ी गर्जनाकार का होता है और ये इतने स्वामीभक्त होते हैं कि संग्राम में कोई कठिन परिस्थिति आ पड़े तो अपने स्वामी को बचाकर निकल जाते हैं। इन गुणों वाला जो अश्व समझदार और स्वामीभक्त होता है वह विप्र जाति का अश्व माना गया है। द्रुहोत्प्रविष्ट उदकेऽन्यशब्दे विद्रुतो भवेत्। स्वामिनं रोहयेच्छुद्धश्चान्यं तु परिपातयेत् ॥ 7 ॥ सङ्ग्रामे दुर्धरश्चाश्वो जैत्रहारी प्रबुध्यति। कामातुरश्च शूरश्च जात्या क्षत्रियसञ्ज्ञकः ॥ 8 ॥ जो अश्व पानी में उतरते समय अड़चन करे, विरोध करे, अचकचाए और किसी अन्य व्यक्ति का शब्द सुनके भड़क उठे, चमके तथा अपने स्वामी को पहचान करके उसके अश्वारोहण के समय तो शुद्ध मन से स्थिर रहे परन्तु स्वामी के सिवाय अन्य कोई आरोहण करने की चेष्टा करे तो वह उसे तुरन्त पटक देता हो, ऐसा अश्व संग्राम में बड़ा दुर्धर यानी खतरनाक हो जाता है परन्तु अपने अश्वार
470 अपराजितपृच्छा वैश्य जाति के अश्वों का स्वर मधुर होता है। इसके विपरीत शूद्र जाति के अश्व का शब्द कर्कश होता है। जो अश्व किसी क्षण में शुद्धासन या आरोहण के समय स्वस्थ, शान्त रहे, संग्राम में भी सावधान किन्तु चञ्चल रहे परन्तु किसी क्षण में घोड़ियों की ओर आकर्षित होकर आतुर हो उठे एवं किसी क्षण पुनः स्वस्थ और शान्तचित्त होकर स्थिर रहे, ऐसे सभी अश्व शूद्र संज्ञक यानी चतुर्थ जाति के माने गए हैं। इत्युत्तमा मता अश्वाः शेषाः प्रकृतिजातकाः । इति ज्ञातिप्रभेदाः स्युः प्रमाणं सप्तधोत्तमम् ॥ 13 ॥ सुन्दरश्चाऽथ श्रीवत्स आह्लादश्च मनोहरः । विजयो विभवः शान्तः सप्ताऽश्वा उत्तमात्तमाः ॥ 14 ॥ उक्त वर्णित उत्तम अश्व माने गए हैं। अन्य शेष को सामान्य प्रकृतिजात अश्व समझें। ये सभी जातिभेद बताए, जिनके प्रमाण भी सात प्रकार के उत्तमोत्तम कहे गए हैं जो इस प्रकार है— (1.) सुन्दर, (2.) श्रीवत्स, (3.) आह्लाद, (4.) मनोहर, (5.) विजय, (6.) विभव और (7.) शान्त— ये सातों प्रकार के उत्तमोत्तम अश्व होते हैं। तथा चोच्छ्रयादीनां प्रमाणमाह — षष्ट्यङ्गुलः₆₀ सुन्दरः स्याच्छ्रीवत्सश्चतुःषष्टिभिः₆₄ । अष्टषष्टिभिराह्लादो₆₈ द्वासप्तत्या₇₂ मनोहरः ॥ 15 ॥ षट्सप्तत्या₇₆ च विजयो विभवोऽशीतिभिस्तथा₈₀ । चतुरशीतिभिः₈₄ शान्तः प्रमाणं सप्तधा₇ विदुः ॥ 16 ॥ अब इन घोड़ों के उक्त नामानुसार उनकी ऊँचाई आदि के प्रमाण कहते हैं। सामान्यतया (1) सुन्दर जाति का घोड़ा 60 अङ्गुल ऊँचा होता है, (2) श्रीवत्स जाति का घोड़ा 64 अङ्गुल, (3) आह्लाद जाति का घोड़ा 68 अङ्गुल, (4) मनोहर जाति का घोड़ा 72 अङ्गुल, (5) विजय जाति का घोड़ा 76 अङ्गुल, (6) विभव नाम की जाति का घोड़ा 80 अङ्गुल तथा (7) शान्त जाति का घोड़ा 84 अङ्गुल की ऊँचाई लिए होता है। इस प्रकार विद्वानों ने घोड़ों के सात प्रकार से प्रमाण कहे हैं। अशुभाश्वलक्षणमाह — ककुद्वान् कुम्भिकावांश्च कराली कृष्णतालुकः । हीनदन्तोऽधिकदन्तः षडश्वाः स्वामिघातकाः ॥ 17 ॥ अब अशुभ अश्वों की पहचान कहते हैं। जो घोड़े कूबड़ वाले, कुम्भ वाले,
कराली अर्थात् भयानक दाँत वाले, काले तालु वाले, कम दाँत वाले या अधिक दाँत वाले हो तो ये छह प्रकार के घोड़े स्वामी घातक होते हैं।¹ अथाश्वशाला लक्षणं — अश्वशालां प्रवक्ष्यामि चतुःषष्टिकरायता₆₄। शतार्द्धस्ता₅₀ मध्या स्यात् चत्वारिंशत्करेत्तरा₄₀ ॥ 18 ॥ पञ्चदशकरा₁₅ ज्येष्ठा त्रयोदशकरेत्तरा₁₃। कनिष्ठैकादशकरा₁₁ पृथुत्वं त्रिविधं मतम् ॥ 19 ॥ अब अश्वशाला बनाने के बारे में प्रमाण कहते हैं— 1. ज्येष्ठ अश्वशाला 64 गज (हाथ) की लम्बाई या आयत तथा 15 गज की चौड़ाई वाली होती है; 2. मध्यम अश्वशाला 50 गज की लम्बाई और 13 गज की चौड़ाई वाली होती है तथा 3. कनिष्ठ अश्वशाला 40 गज की लम्बाई और 11 गज की चौड़ाई वाली होती है। तत्रैव क्रूरार्थपात्रलक्षणमाह — सप्त₇ पञ्च₅ त्रि₃ हस्तं च विस्तरे त्रिविधं स्मृतम्। द्विहस्तमुच्छ्रितं₂ कुर्यात् क्रूरार्थं लक्षणान्वितम् ॥ 20 ॥ तस्य बाह्ये भवेद् भित्तिरेक₁हस्ता च वेष्टने । अब घोड़ों की ठाण में चरने के लिए बनाई जाने वाली कुण्डी के प्रमाणों को कहा जाता है— 7 गज लम्बी 2 गज चौड़ी ज्येष्ठ; 5 गज लम्बी 2 गज चौड़ी मध्यम, और 3 गज लम्बी तथा 2 गज चौड़ी कुण्डी कनिष्ठ कही गई है। ऐसी कुण्डियाँ क्रूरार्थ अर्थात् घोड़े के लिए चरने, भोजन करने की सामग्री रखने के लिए बनाई जाए। उस कुण्डी की दीवार का घेरा एक गज ऊँचाई वाला बनाएँ।
- विष्णुधर्मोत्तर में आए श्लोक उक्त श्लोकों से पर्याप्त साम्यता लिए हैं— हीनदन्तोऽधिदन्तश्च कराली कृष्णतालुकः। कृष्णजिह्वश्च यमजो जातमुष्कश्च यस्तथा॥ द्विशफश्च तथा शृङ्गी त्रिकर्णी व्याघ्रवर्णकः। खरवर्णो भस्मवर्णो जातवर्णश्च काकुदी॥ श्वित्री च काकसादी च खरसारस्तथैव च। वानराक्षः कृष्णसटः कृष्णमुष्कस्तथैव च॥ कृष्णप्रोथश्च मूकश्च यश्च तित्तिरसन्निभः। विषमश्वेतपादस्तु ध्रुवावर्त्तविवर्जितः॥ अशुभावर्त्तसंयुक्तो वर्जनीयस्तुरङ्गमः। जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद में भी ये ही लक्षण आए हैं। यथा— आवर्तो यस्य ककुदे काकुदी स उदाहृतः। करालाश्चाधरा दन्ता जायन्ते यस्य चोत्तरे॥ स कराली इति प्रोक्तो भर्तुः पुत्रादिभक्षकः॥ चतुर्भिः पञ्चभिर्वाथैव हीनदन्तः प्रकीर्तितः। सप्तभिर्भाभिर्नैर्जातस्तथाधिकदन्तकः। अङ्गुष्ठपर्वसङ्काशो छागशृङ्गोपमं तथा। जम्बूबदररूपं च तथा चामलकोपमम् ॥ आप्रास्थिसदृशं चापि हरितक्याः फलोपमम्। दग्धचर्मनिभं चापि वालसंस्थानमेव च॥ कीलं कर्णान्तरे यस्य देशान्ते चापि दृश्यते। धौरेयः सर्वपापानां वाह शृङ्गी स कीर्तितः ॥ एवं विधेन शृङ्गे शृङ्गी राष्ट्रे न वासयेत् ॥ इत्यादि... । (लक्षणप्रकाश पृष्ठ 483-484 पर उद्धृत)
472 ...पृच्छा अश्वशालाप्रमाण — ¹पञ्च₇हस्तोच्छ्रितां भित्तिरर्द्धपञ्च₅ ॥ करोऽथवा ॥ २१ ॥ सप्त₇हस्तोच्छ्रितं कार्यं द्वाभ्यां₂ पक्षस्तम्भकम्। तोरणं सप्त₇हस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत् ॥ २२ ॥ अण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्तोराणय स्तम्भकम्। तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता अङ्गुल्यो द्वादशायतः ॥ २३ ॥ तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्यादण्डच्छाद्यत्रयं तथा। कलशास्तत्र दातव्याः प्रतिछाद्यमथोपरि ॥ २४ ॥ पूर्वापरमुखा अशस्ता तेजो अर्थप्रतापक्षयः। तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः ॥ २५ ॥ दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः। नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः ॥ २६ ॥ अश्वशाला में भित्ति की ऊँचाई पाँच गज या साढ़े पाँच गज की हो तथा उसके दोनों पक्षों पर सात-सात गज ऊँचे दो स्तम्भ बनाए जाएँ। उन स्तम्भों की ऊँचाई के सात गज के अन्तिम भाग पर तोरण बनाने के लिए उत्तर स्तम्भक बनाए। जहाँ तक तोरण के स्तम्भ बने हुए हों वहाँ तक 3 गज ऊँची अण्डछाद्य अर्थात् अण्डाकार गुम्बज की छत बनाएँ। उसके ऊपर अन्तरपत्र 12 अङ्गुल की ऊँचाई के बनाएँ। फिर, उसके ऊपर अण्डाकार तीन गज ऊँची गुम्बजयुक्त छत बनाएँ और फिर उन छतों पर प्रत्येक पर कलश लगाएँ। इन अश्वशालाओं में पूर्व और पश्चिम दिशोन्मुखी शालाएँ अप्रशस्त मानी गई है। इन पूर्वमुखी-पश्चिममुखी शालाओं को तेज, अर्थ, प्रताप और तेज वृद्धि को क्षय करने वाली माना गया है और कहा गया है कि ऐसी शालाओं से तेज वैसे ही क्षय हो जाता है जैसे कृष्णपक्ष का चन्द्रमा दिन-दिन क्षय को प्राप्त होता हुआ अन्त में अमावस्या को प्राप्त करके पूरा क्षय हो जाता है। (घोड़ों को इस प्रकार से बान्धने से भी यही परिणाम होता है¹)। इसके विपरीत दक्षिणमुखी व उत्तरमुखी अश्वशाला प्रशस्त कही गई है। ये स्वामी के प्रताप और कीर्ति को
- 'पञ्चहस्तोच्छ्रिता भित्तिरर्थपञ्चस्वरोऽथवा ? ॥ सप्तहस्तोच्छ्रितं कार्यमुदाढ्या ? पक्षस्तम्भकम्। तोरणं सप्तहस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत्॥ दण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्ताराढ्यस्तम्भकम्। तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता अङ्गुल्यो द्वादशाऽन्यतः॥ तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्याद्दण्डच्छाद्यत्रयं तथा। कलशास्तत्र दातव्याः प्रतिक्षणमथोपरि॥ पूर्वापरमुखास्त्रस्तास्तेजोऽर्थप्रतापक्षयः ?। तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः॥ दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः। नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः॥' इति प्रकाशित पाठः।
च। उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते॥ दक्षिणाभिमुखा वाथ परिशिष्टास्तु`
Line 27:
गर्हिताः। तुरगास्ते तथा धार्याः प्रदीपैः सार्वरात्रिकैः॥ कुक्कुटान् वानरांश्चैव मर्कटांश्च विशेषतः।
Line 28:
धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा। गोगजाश्वादिशालासु
Line 29:
तत्पुरीषस्य निर्गमः॥ अस्तं गते न कर्तव्यो देवदेवे दिवाकरे। तत्र तत्र यथास्थानं राजा विज्ञाय सारथीन्॥
Line 30:
(मत्स्य. 217, 19-23)
Line 31:
2. यह सूत्र प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर में विद्यमान 'अपराजितपृच्छा' की खण्डित मातृका (संख्या
Line 32:
18078-12) से उद्धृत और तद्नुसार पुनर्सम्पादित किया गया है।
Wait, let's verify line 28: `धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा। गोगजा
पृथिव्याश्च यदा राजाभुङ्क्तेऽर्द्धं पर मेव च। तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं शतं हीनकरद्वयम् <sub>98</sub>॥ ३॥ जो राजा इससे आधे भूभाग का भोग करने वाला हो उसके लिए राजभवन सौ से दो गज हीन अर्थात् अठानवे गज के विस्तार वाला बनाए। तथा महीत्रिभागं च भुङ्क्ते यो वै नराधिपः। अष्टाशीतिकरं <sub>80</sub> वेश्म महीशानां त्रिधा <sub>3</sub> मतम्॥ ४॥ जो राजा एक तिहाई भूमि का भोक्ता हो, ऐसे राजा के लिए अस्सी गज के विस्तार वाला राजभवन बनाना चाहिए। इस तरह उक्त राजभवनों के तीन प्रकार माने गए हैं। लक्षग्रामाधिपो यस्तु स महामण्डलेश्वरः। तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं द्विहीनाशीतिहस्तकम् <sub>78</sub>॥ ५॥ जो राजा एक लाख ग्रामों को अधिपति हो, उसकी संज्ञा मण्डलेश्वर होती है। उसका राजभवन अस्सी में दो कम अर्थात् अठत्तर गज विस्तार का होना चाहिए। लक्षार्द्धं यदा भुङ्क्ते मण्डलीकोऽभिधानतः। अष्टषष्टिकरं <sub>68</sub> तस्य कर्त्तव्यं भवनोत्तमम्॥ ६॥ जो राजा आधे लाख ग्रामों का भोग करने वाला हो उसका 'मण्डलीक' नाम दिया गया है। उसका राजभवन अड़सठ गज का होना चाहिए॥ ६॥ अयुतद्वयग्रामाणां महा सामन्तसञ्ज्ञकः। तस्य वेश्माऽष्टपञ्चाशत् <sub>58</sub> करं कामफलप्रदम्॥ ७॥ राजा दो अयुत (20 हजार) ग्रामों का स्वामी हो, उसे 'महासामन्त' नाम दिया गया है। उसका राजभवन अट्ठावन गज विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी कामना को फलवती बनाता है। सामन्तसञ्ज्ञकः सोऽत्राऽयुतग्रामाधिपश्च यः। अष्टचत्वारिंशद्धस्तं <sub>48</sub> भवनं शोभनम्॥ ८॥ जो एक अयुत ( 10 हजार) ग्राम का अधिकारी हो उसे 'सामन्त' संज्ञा दी गई है। उसका राजभवन अड़तालीस गज के विस्तार वाला होना चाहिए, जो सब तरह से शोभा वाला होता है। ईशोऽयुतार्द्धग्रामाणां लघुसामन्तक सञ्ज्ञकः। अष्टत्रिंशत्करैर्युक्तं <sub>38</sub> भवनं तस्य कामदम्॥ ९॥
सूत्र-८१ 475 जो डेढ़ हजार ग्रामों का स्वामी हो उसको 'लघुसामन्त' नाम दिया गया है। उसका राजभवन अड़तीस गज के विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी सब कामना को पूरी करता है। सहस्रमेकं ग्रामाणां भुङ्क्ते स चतुरंशिकः। अष्टाविंशकरं₂₈ कुर्यात् वेश्मशान्तिप्रदं सदा ॥ 10 ॥ जो राजा एक हजार ग्रामों का भोग लेता है वह 'चतुरंशिक' कहलाता है। उसका राजभवन केवल अट्ठाईस गज का शान्ति प्रदान करने वाला होता है। ग्रामाणां विंशतिं भुङ्क्ते यः पञ्चदशकं तथा। ग्रामांस्त्रीन्द्वौ तथा चैकं भुङ्क्ते पर्यायसंस्थितम् ॥ 11 ॥ इसी प्रकार जो बीस ग्रामों का या पन्द्रह ग्रामों का भोग करता है अथवा तीन, दो या एक ग्राम का भोग करता है, उनके जैसे भी पर्याय¹ बन जाए, वैसा राजवेश्म उनके लिए बनाना चाहिए। शतमेकं तु ग्रामाणां स्वल्पराष्ट्रं तु सञ्जितम्। अष्टादशकरं₁₈ वेश्म कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ॥ 12 ॥ एक सौ ग्रामों के समूह के भोगकर्ता को 'स्वल्पराष्ट्र' संज्ञा दी गई है। ऐसे राजा के लिए अठारह गज विस्तार वाला भवन बनाना चाहिए, यह उसके लिए सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। विशेष : राजवल्लभवास्तुशास्त्रम् (5, 2 व अन्य) में भवनों का प्रमाण इस प्रकार आया है—
| क्रम | नृपसंज्ञा | विशेषता/कोटि | गृहप्रमाण (व्यास) |
|---|---|---|---|
| 1. | चक्रवर्ती | (सर्वाधिपति) | 108 हाथ |
| 2. | नृनाथ | चक्रवर्ती के समान भूमि या तृतीयांश हो | 88 हाथ |
| 3. | महामण्डलिक | 1 से 2 लाख ग्रामों का अधिपति | 78 हाथ |
| 4. | नृपमण्डलिक | 50 हजार ग्रामाधिपति | 68 हाथ |
| 5. | सामन्तमुख्य | 20 हजार ग्रामाधिपति | 58 हाथ |
| 6. | सामन्त | 10 हजार ग्रामाधिपति | 48 हाथ |
- मयमतं में इस प्रकार की विप्रवर्गीय कोटियों का निर्धारण हुआ है और तद्नुसार ही ग्राम विन्यास का निर्देश दिया गया है। मेवाड़ में भौमिया, गोल, चौथिया ठाकुर आदि कोटियाँ भी निर्धारित की गई हैं।
| 7. | तृतीय (सामन्त) | 5 हजार ग्रामाधिपति | 38 हाथ | | 8. | चतुरंशिक | 1 हजार ग्रामाधिपति | 28 हाथ | | 9. | स्वल्पराष्ट्र/सैनिक | 100 ग्रामाधिपति | 18 हाथ | आरोहणमाह — करमष्टादशमध्यस्थं कर्त्तव्यं तु क्रमेण तु। सोपानपङ्क्तिमर्यादा कथिता त्वपराजितम् ॥ 13 ॥ हे अराजित ! अब सोपानपङ्क्तिमर्यादा अर्थात् सीढ़ियाँ बनाने का प्रमाण कहता हूँ। सामान्यतः अठारह गज के भीतर ही सीढ़ियाँ क्रम से बनानी चाहिए। दण्डनायकादीनां भवनप्रमाणमाह — राजालये च यन्मानं तदर्द्धं दण्डनायके। दण्डार्द्धं मन्त्रिसंस्थानं मन्त्र्यर्द्धं द्वारपालके ॥ 14 ॥ राजालय का जो मान बताया गया है, उसका आधा दण्डनायक के भवन का मान होना चाहिए अर्थात् राजालय 108 गज का हो तो दण्डनायक का 54 गज विस्तार वाला भवन अपेक्षित है। दण्डनायक के भवन से आधा मन्त्री का भवन अर्थात् 27 गज का हो। मन्त्री के भवन से आधा द्वारपाल, ड्योढ़ी के दरोगा का भवन अर्थात् 13 गज विस्तार का होगा। तत्समे पुरोहितं ज्ञेयं तदर्द्धे जनसङ्कुले। अनुक्रमादिदं सर्वं ज्येष्ठ-मध्य-कनिष्ठकम् ॥ 15 ॥ राज पुरोहित का भवन भी उसी के बराबर अर्थात् 13 गज विस्तार का द्वारपाल के भवन के समान हो। इनसे भी आधे क्षेत्र विस्तार का अर्थात् 6-7 गज प्रमाण का सामान्य नागरिक का भवन हो। इसी अनुक्रम से ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ भवन समझना चाहिए। अधुना तलविधानमाह — अष्टहस्ते₈ त्वेकभूमिं₁ द्विभूमं₂ अष्टदशके₁₈। त्रिभूमं₃ मष्टाविंशत्या₂₈ ष्टत्रिंशद्भि₃₈ र्वेद₄ भूमम् ॥ 16 ॥ आठ गज के क्षेत्र में जो भवन बने वह एक भूमि अर्थात् एकतलीय या एक मंजिला कहलाता है। अठारह गज का दो भूमि, मंजिला का बनाए। अठाईस गज वाला तीन भूमि का या तिमंजिला तथा अड़तीस गज का क्षेत्र वाला भवन चार भूमि वाला या चार मंजिला होता है।
सूत्र-८१ 477 अष्टचत्वारिंशद्भिः₄₈ पञ्चभू₅ षड्भू₆ ष्टपञ्चाशद्भिः₅₈ । अष्टषष्ट्या₆₈ सप्तभूम₇ मष्ट₈ भ्वष्टसप्ततिभिः₇₈ ॥ 17 ॥ इसी प्रकार अड़तालीस गज क्षेत्र वाला भवन पाँच भूमि का अर्थात् पाँच मंजिला होता है। अठावन गज क्षेत्र का छह भूमि वाला अर्थात् छह मंजिला होता है। अड़सठ गज क्षेत्र का भवन सात भूमि का और अठत्तर गज क्षेत्र का भवन आठ तलीय या आठ मंजिला होता है। अष्टाशीत्या₈₈ नवभूमं₉ दशभू₁₀ ष्टनवतिभिः₉₈ । भद्रमेकादश₁₁ भूममष्टोत्तरशतात्मके₁₀₈ ॥ 18 ॥ अठासी गज की क्षेत्र भूमि का भवन नौ भौमिक अर्थात् नौ मंजिला होता और अठानवे गज क्षेत्र का भवन दस भूमि का यानी दश मंजिला होता है। इसी तरह एक सौ आठ गज क्षेत्र का भवन भद्र जाति का ग्यारह भूमि का अर्थात् ग्यारह मंजिला होता है। इत्यमनन्तर सिंहद्वारानुक्रमह — सिंहद्वारानुक्रमं च कथये त्वपराजित । उत्तमे च त्रयद्वारं¹ कर्तव्यं चक्रवर्त्तिभिः ॥ 19 ॥ अब हे अपराजित! सिंहद्वारों का अनुक्रम कहता हूँ। इस तरह द्वार-त्रय-उत्तम अर्थात् उत्तम त्रिपोलिया द्वार² चक्रवर्ती राजाओं के भवनों के लिए बनाना कर्तव्य है। उत्तमं पञ्चदश₁₅ च मध्यमं च त्रयोदश₁₃ । कनिष्ठ रुद्र₁₁ हस्तान्तमुच्छ्रयेण तु योजितम् ॥ 20 ॥ इन सिंहद्वारों में उत्तम त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई पन्द्रह गज, मध्यम त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई ऊँचाई तेरह गज और कनिष्ठ त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई ग्यारह गज योजित होगी। सिंहद्वारमिदं मानं त्रिधा₃ स्याच्चक्रवर्तिनि । महाराष्ट्रेovere? महाराष्ट्रेश्वरे राज्ञि महामण्डलकेश्वरे ॥ 21 ॥ चक्रवर्तिनि मध्याद्ये कनिष्ठं मण्डलेश्वरे । ये द्वार मान तीन प्रकार के चक्रवर्ती राजाओं के लिए कहे गए है। महाराष्ट्रेश्वर चक्रवर्ती के पन्द्रह गज की ऊँचाई वाला उत्तम त्रिपोलिया द्वार, महामण्डलेश्वर चक्रवर्ती के लिए तेरह गज की ऊँचाई वाला मध्यम त्रिपोलिया द्वार तथा मण्डलेश्वर
- 'द्वारत्रयन्तुत्तमे' इति प्रकाशित पाठः।
- प्राचीन राजधानी पुरों, नगरों में त्रिपोलिया द्वार बनते रहे हैं। जयपुर, उदयपुर में भी तीन द्वारों वाले सिंहद्वार की परम्परा देखने में आती है।
478 चक्रवर्ती राजा के लिए ग्यारह गज की ऊँचाई वाला त्रिपोलिया द्वार विहित है यह कनिष्ठ त्रिपोलिया है। अनन्तरं कथयिष्यामि सिंहद्वारं यथाक्रमम् ॥ 22 ॥ द्वारयुग्मं तु कर्त्तव्यं महासामन्तके सदा। द्वारमेकं तु कर्त्तव्यं तथा सामन्तकादिके ॥ 23 ॥ अब इसके बाद, अन्य सिंहद्वारों के बारे में क्रम से कहता हूँ। महासामन्त के भवन में सदैव दो पोल वाला द्वार तथा सामन्त आदि के केवल एक पोल का द्वार बनाना चाहिए। तोरण प्रयोजनलक्षणञ्च — अन्येषां स्वल्पराज्यानां ये स्मृताश्चान्यसञ्ज्ञका। तेषां च तोरणं दद्यात् सिंहद्वारविवर्जितम् ॥ 24 ॥ अन्य छोटे राजा, ठाकुरों आदि के लिए जो केवल अन्य संज्ञक माने जाते हैं, उनके भवन के आगे केवल तोरण ही बनाए, उनके लिए सिंहद्वार का निर्माण करना वर्जित है, उचित नहीं माना गया है। स्तम्भयुग्मोत्तराङ्गाद्यं सिंहकर्णैर्विभूषितम्। नपुंसकं विना कर्णैः स्वल्पराजेषु भाषितम् ॥ 25 ॥ इसलिए ऐसे, लघु राजाओं, ठाकुरों जागीरदारों आदि के भवनों के आगे सिंहकर्ण से युक्त विभूषित दो स्तम्भों पर उत्तरंग अर्थात् छाबना बनाकर नपुंसक जाति का, बिना कर्णों का तोरण बनाया जाए। स्तम्भयुग्मोर्ध्वतः कुर्यात्पत्रमालात्रयं तथा। विप्रेषु क्षत्रियोक्ताश्चं मालायुग्मं च वैश्यके ॥ 26 ॥ उक्त तोरण के दोनों स्तम्भों के ऊपर तीन पत्रमालाएँ बनाकर उनका सुन्दर अलङ्करण करें। इसके अतिरिक्त विप्रों, क्षत्रियों के लिए भी ऐसे ही अर्थात् तीन पत्रमाला युक्त तोरण बनाए। वैश्यों के भवन के तोरण में दो माला का तोरण अलङ्करण करें। एकमाला तु शूद्राणां स्तम्भोर्ध्वं वंशकोच्छ्रिताः। वंशोच्छ्रिता विना स्तम्भैः प्रकृतीनां च सर्वशः ॥ 27 ॥ इसी प्रकार शूद्रों के भवन में एकमाला के तोरण अलङ्करणार्थ बनाए जाए जिनमें स्तम्भ एक बाँस की ऊँचाई के प्रमाण वाले हों। इनके अतिरिक्त सभी
सूत्र-८१ 479 प्राकृतजनों अर्थात् सर्वसामान्य ग्रामीणों और नगरवासियों के घरों के द्वार बिना स्तम्भों वाले ही एक बाँस की ऊँचाई के बनाने चाहिए। इत्यमनन्तर आसनविधानमाह — तोरणं कथितं वत्स आसनं शृणु साम्प्रतम्। आसनं कथयिष्यामि दिव्यमानेन सुव्रत ॥ २८ ॥ अब तक तोरणों के बारे में कहा गया। अब हे वत्स ! तुम आसनों के विषय में सुनो। मैं आसनों का दिव्यमान कहता हूँ। युक्तं च षष्टि₆₀ पञ्चाश₅₀ च्चत्वारिंश₄₀ द्विरङ्गुलैः। महाराजेषूचितं वै इत्थं सिंहासनं त्रिधा₃ ॥ २९ ॥ इनमें पूर्वोक्त सुव्रत नाम के उत्तम आसन साठ, पचास और चालीस अङ्गुल मान के होते हैं जो महाराज चक्रवर्तियों के लिए ही उचित है। इस तरह आसन ज्येष्ठ (60 अङ्गुल), मध्यम (50) और कनिष्ठ (40 अङ्गुल) मान से तीन प्रकार के कहे गए हैं। भद्रासनं महाराष्ट्रे विलासैः पद्मासञ्ज्ञकम्। विस्तारिका तु सामन्तैः चातुरी मन्त्रिमण्डले ॥ ३० ॥ ऐसे राजगद्दी वाले सिंहासन महाराष्ट्र अर्थात् बड़े महाराजाओं के लिए भद्रासन; विलास के लिए पद्मासन (कमलपीठ) का प्रयोग करें। मन्त्रिमण्डल के लिए चातुरी (चौकी, कुर्सी) और सामन्तों के लिए विस्तारिका (तिपाई) नामके आसन बनाएँ। अन्येषां स्वल्पराज्यानां दातव्यं तु मसूरकम्। गदिका पट्टगद्दी च सर्वस्मिञ्जनसङ्कुले ॥ ३१ ॥ आसनं सिंहसञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्। अन्य छोटे राजाओं के लिए तो केवल मसूरक ही देना चाहिए अर्थात् उनके लिए केवल तकिया या मोढ़ा-मसन्द ही उचित है। अन्य सभी जन सङ्कुल के लिए तो आसन के रूप में गदरे अथवा पट्टगद्दी, जाजम-बिछात का प्रयोग करना चाहिए। सिंहसंज्ञक जो आसन होते हैं, वे शयन के प्रयोजन से बड़े सुखदायी हैं।¹ यानं सुखासनं चैव यानं रथ उच्यते ॥ ३२ ॥ यानं महागजपृष्ठं यानं विद्याद्विसारयोः।
- सम्भवतः ये आधुनिक सोफासेट की तरह कोमल, गद्दीदार और आरामदायक बनते होंगे और राजा-महाराजा, बड़े लोगों में तब भी प्रयोग में आते ही होंगे। आज भी उसी परम्परा में ड्राइंगरूमों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
480 अपराजितपृच्छा ⸱ गजपृष्ठे च यद्वद्धं विद्धि तत्सिंह सञ्ज्ञकम् ॥ ३३ ॥ व्याघ्ररूपं विद्धि शिखि-कलापकभवं पुनः। एवं विविधरूपाणि पताका छत्रमण्डलम् ॥ ३४ ॥ यान-वाहन, रथों आदि में भी बैठने के सुखासन बनाने चाहिए। जब महागजपृष्ठ अर्थात् हाथी की पीठ को यान बनाना हो तो उस महागज की पीठ पर विसार अर्थात् बड़ा बिछौना, गादी युक्त लगा देना चाहिए (इसे आजकल झूल कहा जाता है)। इसी तरह हाथी की पीठ के ऊपर बान्धकर जो आसन लगाए जाते हैं, उन्हें सिंहासन कहा जाता है (यथा— आधुनिक हौदा, ऐसे हौदे कई रूपों से सजाए जाते हैं, उनके पाये तथा दस्ते व्याघ्र के मुख बनाकर अलंकृत किए जाते हैं। कहीं-कहीं तो उन पर मोरपङ्खों के अलङ्करणों की भी साज-सज्जा होती है। उन पर विविध प्रकार की पताका, झण्डियाँ फहराती हैं तथा उन पर छत्र-मण्डल भी बनाए जाते हैं। अधुना छत्रप्रमाणमाह — चतुरशी
सूत्र-८१ 481 कलश की शोभा की जाए। महामण्डलेश्वरों के छत्रों पर मोरपट्टों की शर्करी अर्थात् सजावट की जानी चाहिए। चामरालङ्कारयुक्तं महाराजेश्वरं विदुः । इत्येवमुक्तामाला च राज्ञोऽलङ्कारशोभना ॥ ३८ ॥ महाराजाओं के छत्रों के साथ चामरों के भी अलङ्करण हों और ऐसे महाराजेश्वरों को मोतियों की मालाओं के अलङ्कार या गहने धारण करके शोभायमान होना चाहिए। लक्ष्मीश्च रमते नित्यं तथा सा चक्रपाणिना । तपसार्थयता येन प्रतापकीर्त्तिवर्द्धनम् ॥ ३९ ॥ ऐसे चक्रपाणि राजाओं के राज्य में नित्य ही लक्ष्मी का वास होता है और लक्ष्मी के रमते रहने से उनके सभी तपों की सार्थकता प्रकट होती है। उनके प्रताप, कीर्ति का भी नित्य वर्द्धन होता रहता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्त्तिप्रकाशप्रोक्तृ श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां राजालयसिंहासनछत्रप्रमाणाधिकारोनामैकाशीतितमं सूत्रम् ॥ 81 ॥¹
- जोधपुर भेदपाठः- सामन्तसञ्ज्ञकं नाम ग्रामस्यायुता द्वयम्। अष्ट चत्वारिंशत्करं तद्भवनं कुर्यात् शोभनम् ॥ 8 ॥ अयुतार्द्धग्रामाणां च यश्च लघुसामन्तकः। कराष्ट त्रिंशद्ध्यक्तं च तद्भवनं अर्थ कामदम् ॥ 9 ॥ सहस्त्रैकं तु ग्रामाणां सभवेच्चतुराशिकः। अष्टाविंश करं कुर्यात् वेश्मशान्ति प्रदं सदा ॥ 10 ॥ विंश ग्रामे यदा भुक्ती ग्रामं तु दशपञ्चकम्। ग्रामे यत्रमेकं तु भुक्ती पर्याय संस्थितम् ॥ 11 ॥ शतमेकं तु ग्रामाणां शल्यराष्ट्रसु सञ्ज्ञकम्। अष्टादश करं वेश्म कर्तव्यं सर्व कामदम् ॥ 12 ॥ करमष्टादशमध्यस्थ कर्त्तव्यं कर्त्तव्यंतु क्रमेण तु। सोपान पंक्ति पर्यायः कथितं त्वपराजितम् ॥ 13 ॥ राजालयं तु यन्मानं तदर्द्धं दण्डनायकम्। दण्डार्द्ध मन्त्र संस्थानं मन्त्र्यद्धं द्वारपालकम् ॥ 14 ॥ तत्समं त्रौ हितं ज्ञेयं तदर्द्ध जन सङ्कुलम्। अनुक्रमेमिदं सर्वं ज्येष्ठ-मध्यम-कनिष्ठकम् ॥ 15 ॥ अष्टहस्तेत्वेकभूमिं द्विभूमं अष्टदशतु। त्रिभूमं अष्टविंशत्यं अष्टत्रिंशैर्वेदभूमकम् ॥ 16 ॥ अष्ट चत्वारिशे भूपञ्चषड्भूम्याष्ट पञ्चाशकम्। अष्टषष्ट्यासप्तभौमं अष्ट भूम्याष्टसप्ततिः ॥ 17 ॥ अष्टाशीतिनवभूमं च दशभूऽष्टनव्योत्तलम्। भूमैकादशभद्रां ते अष्टोत्तरशत हस्तकम् ॥ 18 ॥ सिंहद्वारानुक्रमं च कथये त्वपराजित। उत्तरे च त्रयद्वारं कर्त्तव्यं चक्रवर्त्तिभिः ॥ 19 ॥ उत्तमंदश पञ्चाशत्करैर्मध्यम च त्रयोदशं। कनिष्ठं भद्रहस्तं तु उच्छ्रायेणतु योजितम् ॥ 20 ॥ सिंहद्वारमिदं मानं चक्रवर्त्तित्वयोदिताः। महाराष्ट्रेश्वरे राज्ञैः महामण्डलेश्वरः ॥ 21 ॥ अनन्तरं कथयिष्यामि सिंहद्वारं यथाक्र मम् ॥ 22 ॥ मध्यमोत्तम चक्रवर्त्तिश्च कनिष्ठं मण्डलेश्वरः। अष्टरं कथयिष्यामिसिंहद्वार यथाक्रमम् ॥ 23 ॥ द्वारयुग्मं तु कर्तव्यं महासामन्तदायकम्। अन्येषां स्वल्पं राजानां ये स्थितामात्य सञ्जका। तेषां च तोरणं दद्यात् सिंहद्वार विवर्जित ॥ 24 ॥ सिंहायुग्मार्द्धेन कुर्यात् पत्रमाला त्रयोत्तमा। विप्राद्याक्षत्रियायुक्ता वैश्ययुग्ममालास्थिता ॥ 25 ॥ एकमाला तु शूद्राणां स्तम्भो द्विवशोच्छ्रिताः। स्तम्भैर्विंनोच्छ्रितो वंशा प्रकृतीनां तु सर्वतः ॥ 26 ॥ तोरणं कथितं वत्स आसनं शृणु साम्प्रतम्। आसनं कथयिष्यामि दिव्यमानेन सुव्रत ॥ 27 ॥ महाराजादि सूचितं त्रिविधं च सिद्धासनम् ॥ 28 ॥ भद्रासनं महाराज्ञे विलासैः पद्यसञ्ज्ञक। विकासतरिका तु सामन्तैः चातुरी मन्त्रिमण्डलम् ॥ 29 ॥ अन्येषां स्वल्प राजानां दातव्यं तु मस्तूरकम्।
482 अपराजितपृच्छा इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजालय, सिंहासन, छत्र प्रमाण अधिकार नामक इक्यासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 81 ॥ राजभुवनं द्व्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 82 ॥ विश्वकर्मोवाच – चतुरश्रीकृते क्षेत्र भजेत्षोडश₁₆ भागिकम् । पदसङ्ख्यामितिः ख्याता षट्पञ्चाशच्छतद्वयम्₂₅₆ ॥ 1 ॥ (चूड़ामणि महाकूट वास्तु के प्रयोजनार्थ) श्री विश्वकर्मा कहने लगे कि चौरस समतल किए गए क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। इस तरह इनसे बनने वाले पदों की संख्या 16 × 16 = 256 होगी। ब्रह्माऽऽस्ते गर्भमावृत्य षट्त्रिंशत्पदकोष्ठकैः₃₆ । रुद्र₁₁ सङ्ख्यापदैर्युक्ता एकैके अर्यमादयः ॥ 2 ॥ इसमें ब्रह्मा का स्थान गर्भ को घेरकर छत्तीस पद कोष्ठकों वाला होगा। अर्यमादि एक-एक देव रुद्रसंख्या में अर्थात् ग्यारह पदों में न्यसित करें। चतुष्पदाष्टकर्णेषु द्वात्रिंशत्पदकल्पिताः₃₂ । बाह्यकर्णे तथा चाष्ट द्विपदा भक्तितो मताः ॥ 3 ॥ इसके आठों कोनों पर चार-चार पद कोष्ठकों से बत्तीस कोष्ठक कल्पित किए जाते हैं (अर्थात् 8 × 4 = 32)। बाहरी कोनों पर बने आठ पदों को दो भागों में विभक्त करने चाहिए। अष्टावष्टपदा ज्ञेयाः शेषास्तु चतुरंशकाः । जयः सत्योऽथ वितथो गन्धर्वसुग्रीवासुराः ॥ 4 ॥ मुख्यश्चैव गिरिःख्यातः प्रत्येकं चाऽष्टपादकाः ।
गदिकापदगर्दी च सर्वेषां जनमण्डलम् ॥ 30 ॥ आसनं सन्थ सञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्। यानं सुखासनं प्रोक्तं यानं रथ समुच्यते ॥ 31 ॥ यानं महागर्ज पृष्टे यानं बिम्बादिसारयोः । गजष्टेतु भयविधं सन्धान सञ्ज्ञकम् ॥ 32 ॥ व्यापान्रूपैर्विधिं शिखि कलापोद्भवम् । पुनएव तेध रूपाणि पताका छत्र मण्डलम् ॥ 33 ॥ चतुरशीत्यंगुल व्यासं छत्रवृतं उत्तमोत्तमम्। मध्यमं द्विसप्तसत्या षष्ठ्ययङ्गुल् कनिष्टकम् ॥ 34 ॥ शतादुर्द्धे प्रसाद दाने शेषां प्रावृद्सु छत्रिकाः। छत्राभिकल्लीयुक़्तां षोडशाङ्गुल प्रतिष्ठां तालविनाः ॥ 35 ॥ कनकजदण्डोर्ध्व कलशं युग्म छत्रं तु भूपति। महामण्डलेश्वर कुर्यात् शिखिकलापोशर्करी ॥ 36 ॥ चामरालङ्कारयुक्तापि महाराजेश्वरं विदुः । इत्येवं क्रमाद्यो च राजालङ्कारशोभनम् ॥ 37 ॥ लक्ष्मीश्चरते नित्यं यथा सा चक्रपाणिना। तपः समर्थ यते येन प्रतापकीर्तिवर्द्धनम् ॥ 38 ॥ (पाण्डुलिप्यात्) ।
सूत्र-८२ 483 चूडामणिर्महाकूटो वास्तु राजालयार्थकम् ॥ ५ ॥ इति चूडामणिमहाकूटवास्तुः। ये आठ-आठ पद कहे गए हैं और शेष जो बचे, वे चतुर्थांश कहे गए है— (1.) जय, (2.) सत्य, (3.) वितथ, (4.) गन्धर्व, (5.) सुग्रीव, (6.) असुर, (7.) मुख्य और (8.) गिरि नाम के सभी प्रत्येक आठ पद कोष्ठकों के होते हैं। इस प्रकार से राजालयों, राजमहलों के लिए चूड़ामणि महाकूट वास्तु बनता है। शयनभाण्डागारवारीगृहादीनां — वेश्ममध्यं ब्रह्मस्थानं शयनं च विवस्वतः। भाण्डागारं क्षितिधरे मैत्रे वै वारिमन्दिरम् ॥ ६ ॥ अर्यम्णि सुरसौधं च कर्णान्तर्गुह्यवेश्मकम्। आग्नेय्यामनलस्यैवं नैर्ऋत्यां वस्त्रसङ्ग्रहः ॥ ७ ॥ उक्त प्रकार से पद न्यास कर ब्रह्मस्थान के चार पद कोष्ठकों के मध्य के दक्षिण- विवस्वत भाग में शयन स्थान बनाएँ। क्षितिधर और मैत्रेय के पदस्थान पर भण्डार और जलमन्दिर बनाएँ। अर्यमा के स्थान पर देवता का गृह-सुरसौध बनाएँ तथा कोनों पर अन्तर गुह्यगृह कोठार बनाएँ। आग्नेय भाग में, वायु भाग में और नैर्ऋत्य भाग में वस्त्र संग्रह के भण्डार बनाए जाने चाहिए। वायव्येचाऽष्टधातूनामीशाने शिवभाण्डकम् । मध्यकर्णे इमे प्रोक्ता बाह्वांश्च शृणु साम्प्रतम् ॥ ८ ॥ इसी तरह वायव्य में अष्टधातु के भाण्ड और ईशान में शिवभाण्ड रखने के भण्डार बनाएँ। अब तक तो ये सब मध्य कर्ण में करने के कार्य बताए, आगे बाह्य भाग में करने के कार्यों के बारे में सुनो। अर्चनागृहमहासनकोष्ठागारशस्त्रागारमाह — ईशाने चाऽर्चनावेश्म आग्नेय्यां च महानसम्। कोष्ठागारं तु वायव्ये नैर्ऋत्ये शस्त्रमण्डपम् ॥ ९॥ ईशान कोण में अर्चनावेश्म अर्थात् देवपूजा-अर्चन का स्थान बनाएँ। आग्नेय कोण में महानस अर्थात् बड़ा रसोईघर बनाएँ। वायव्य कोण में कोष्ठागार अर्थात् बड़ा कोठार या समस्त सामग्रियों को रखने का स्थान बनाएँ। नैर्ऋत्य कोण के भाग में शस्त्रागार रखने का शस्त्रमण्डप बनाया जाना चाहिए। राजपदमकराक्षमाह — याम्यस्थं वारुणस्थं च सौम्यस्थं चैव लक्षयेत्।