भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 527

482 अपराजितपृच्छा इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजालय, सिंहासन, छत्र प्रमाण अधिकार नामक इक्यासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 81 ॥ राजभुवनं द्व्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 82 ॥ विश्वकर्मोवाच – चतुरश्रीकृते क्षेत्र भजेत्षोडश₁₆ भागिकम् । पदसङ्ख्यामितिः ख्याता षट्पञ्चाशच्छतद्वयम्₂₅₆ ॥ 1 ॥ (चूड़ामणि महाकूट वास्तु के प्रयोजनार्थ) श्री विश्वकर्मा कहने लगे कि चौरस समतल किए गए क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। इस तरह इनसे बनने वाले पदों की संख्या 16 × 16 = 256 होगी। ब्रह्माऽऽस्ते गर्भमावृत्य षट्त्रिंशत्पदकोष्ठकैः₃₆ । रुद्र₁₁ सङ्ख्यापदैर्युक्ता एकैके अर्यमादयः ॥ 2 ॥ इसमें ब्रह्मा का स्थान गर्भ को घेरकर छत्तीस पद कोष्ठकों वाला होगा। अर्यमादि एक-एक देव रुद्रसंख्या में अर्थात् ग्यारह पदों में न्यसित करें। चतुष्पदाष्टकर्णेषु द्वात्रिंशत्पदकल्पिताः₃₂ । बाह्यकर्णे तथा चाष्ट द्विपदा भक्तितो मताः ॥ 3 ॥ इसके आठों कोनों पर चार-चार पद कोष्ठकों से बत्तीस कोष्ठक कल्पित किए जाते हैं (अर्थात् 8 × 4 = 32)। बाहरी कोनों पर बने आठ पदों को दो भागों में विभक्त करने चाहिए। अष्टावष्टपदा ज्ञेयाः शेषास्तु चतुरंशकाः । जयः सत्योऽथ वितथो गन्धर्वसुग्रीवासुराः ॥ 4 ॥ मुख्यश्चैव गिरिःख्यातः प्रत्येकं चाऽष्टपादकाः ।

गदिकापदगर्दी च सर्वेषां जनमण्डलम् ॥ 30 ॥ आसनं सन्थ सञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्। यानं सुखासनं प्रोक्तं यानं रथ समुच्यते ॥ 31 ॥ यानं महागर्ज पृष्टे यानं बिम्बादिसारयोः । गजष्टेतु भयविधं सन्धान सञ्ज्ञकम् ॥ 32 ॥ व्यापान्रूपैर्विधिं शिखि कलापोद्भवम् । पुनएव तेध रूपाणि पताका छत्र मण्डलम् ॥ 33 ॥ चतुरशीत्यंगुल व्यासं छत्रवृतं उत्तमोत्तमम्। मध्यमं द्विसप्तसत्या षष्ठ्ययङ्गुल् कनिष्टकम् ॥ 34 ॥ शतादुर्द्धे प्रसाद दाने शेषां प्रावृद्सु छत्रिकाः। छत्राभिकल्लीयुक़्तां षोडशाङ्गुल प्रतिष्ठां तालविनाः ॥ 35 ॥ कनकजदण्डोर्ध्व कलशं युग्म छत्रं तु भूपति। महामण्डलेश्वर कुर्यात् शिखिकलापोशर्करी ॥ 36 ॥ चामरालङ्कारयुक्तापि महाराजेश्वरं विदुः । इत्येवं क्रमाद्यो च राजालङ्कारशोभनम् ॥ 37 ॥ लक्ष्मीश्चरते नित्यं यथा सा चक्रपाणिना। तपः समर्थ यते येन प्रतापकीर्तिवर्द्धनम् ॥ 38 ॥ (पाण्डुलिप्यात्) ।

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक) · पृष्ठ 527, कुल 535 में से · BharatKosha