भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-८२ 483 चूडामणिर्महाकूटो वास्तु राजालयार्थकम् ॥ ५ ॥ इति चूडामणिमहाकूटवास्तुः। ये आठ-आठ पद कहे गए हैं और शेष जो बचे, वे चतुर्थांश कहे गए है— (1.) जय, (2.) सत्य, (3.) वितथ, (4.) गन्धर्व, (5.) सुग्रीव, (6.) असुर, (7.) मुख्य और (8.) गिरि नाम के सभी प्रत्येक आठ पद कोष्ठकों के होते हैं। इस प्रकार से राजालयों, राजमहलों के लिए चूड़ामणि महाकूट वास्तु बनता है। शयनभाण्डागारवारीगृहादीनां — वेश्ममध्यं ब्रह्मस्थानं शयनं च विवस्वतः। भाण्डागारं क्षितिधरे मैत्रे वै वारिमन्दिरम् ॥ ६ ॥ अर्यम्णि सुरसौधं च कर्णान्तर्गुह्यवेश्मकम्। आग्नेय्यामनलस्यैवं नैर्ऋत्यां वस्त्रसङ्ग्रहः ॥ ७ ॥ उक्त प्रकार से पद न्यास कर ब्रह्मस्थान के चार पद कोष्ठकों के मध्य के दक्षिण- विवस्वत भाग में शयन स्थान बनाएँ। क्षितिधर और मैत्रेय के पदस्थान पर भण्डार और जलमन्दिर बनाएँ। अर्यमा के स्थान पर देवता का गृह-सुरसौध बनाएँ तथा कोनों पर अन्तर गुह्यगृह कोठार बनाएँ। आग्नेय भाग में, वायु भाग में और नैर्ऋत्य भाग में वस्त्र संग्रह के भण्डार बनाए जाने चाहिए। वायव्येचाऽष्टधातूनामीशाने शिवभाण्डकम् । मध्यकर्णे इमे प्रोक्ता बाह्वांश्च शृणु साम्प्रतम् ॥ ८ ॥ इसी तरह वायव्य में अष्टधातु के भाण्ड और ईशान में शिवभाण्ड रखने के भण्डार बनाएँ। अब तक तो ये सब मध्य कर्ण में करने के कार्य बताए, आगे बाह्य भाग में करने के कार्यों के बारे में सुनो। अर्चनागृहमहासनकोष्ठागारशस्त्रागारमाह — ईशाने चाऽर्चनावेश्म आग्नेय्यां च महानसम्। कोष्ठागारं तु वायव्ये नैर्ऋत्ये शस्त्रमण्डपम् ॥ ९॥ ईशान कोण में अर्चनावेश्म अर्थात् देवपूजा-अर्चन का स्थान बनाएँ। आग्नेय कोण में महानस अर्थात् बड़ा रसोईघर बनाएँ। वायव्य कोण में कोष्ठागार अर्थात् बड़ा कोठार या समस्त सामग्रियों को रखने का स्थान बनाएँ। नैर्ऋत्य कोण के भाग में शस्त्रागार रखने का शस्त्रमण्डप बनाया जाना चाहिए। राजपदमकराक्षमाह — याम्यस्थं वारुणस्थं च सौम्यस्थं चैव लक्षयेत्।