अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें484 अपराजितपृच्छा इदं स्थानं राजपदं कर्त्तव्यं शान्तिमिच्छता ॥ 10 ॥ यथोत्तरं मकराक्षं निर्गमे मकरान्वितम् । मत्तवरणछाद्यं च क्षेत्रपादैस्तु निर्गतम् ॥ 11 ॥ शान्ति के आकांक्षी को दक्षिण दिशा में, पश्चिम तथा उत्तर दिशा में कहीं भी लक्ष्य करके या देखकर इन स्थानों में राजपद स्थान बनाना चाहिए। उत्तर दिशा की ओर मकाराकृति युक्त निकले हुए मकराक्ष बनाए, जो क्षेत्र के पदों के बाहर की ओर निकले हुए मत्तवारण युक्त छाजों से बने हों। सभाष्टकानुसारेण पुष्पकसिंहासनमाह - सभाष्टकयुक्तछन्देषु पूर्ववच्चाग्रनिर्गमः । वेद्युत्तरमुखं कार्यं पुष्पकं सिंहमासनम् ॥ 12 ॥ सुवर्णस्फटिकोपेतं नैकरत्नैर्विभूषितम् । पुष्पकं चतुःस्तम्भाढ्यं छाद्यघण्टाद्यलङ्कृतम् ॥ 13 ॥ सभाष्टक के युक्त छन्दों में पहले वर्णन किए गए तरीकों से बाहर की ओर निर्गतम या निकले हुए ढंग में उत्तर दिशा की और मुख किए हुए वेदी बनाएँ और उस पर पुष्पक नाम का सिंहासन लगाएँ, जो सोने और स्फटिक मणियों तथा अनेकानेक रत्नों से विभूषित हो। पुष्पक सिंहासन के चारों स्तम्भाढ्य, विशाल स्तम्भ भी छज्जों, चन्दोवों और घण्ट अर्थात् गुम्बजों से अलंकृत होने चाहिए। हेमरत्नादिकोपेतं मुक्ताफलविभूषितम् । राजासनं मध्यपीठं कर्तव्यं शुभलक्षणम् ॥ 14 ॥ ऐसे सिंहासन के मध्य पीठ को सोने, रत्नों और मोतियों से विभूषित, शुभ लक्षणों वाली राजासन से युक्त बनाना चाहिए। दन्तिशालामाह - सिंहद्वारं तु तस्याग्रे गजक्रीडा याम्योत्तरे। सिंहद्वाराग्रतः कार्ये दन्तिशाले तथोभयोः ॥ 15 ॥ इस सभा के आगे सिंहद्वार अर्थात् बड़ी पोल बनानी चाहिए जिसके दायें-बायें अर्थात् दक्षिण और उत्तर दोनों ओर गजक्रीड़ा के योग्य चौगान क्षेत्र बनाने चाहिए। तदग्रे विजयद्वारं कर्णावुभौ च स्वाग्रतः । प्रतोल्या च तथोपेतं प्राकारैः परिवेष्टितम् ॥ 16 ॥ इसके लिए सिंहद्वार अर्थात् बड़ी पोल के आगे ही दोनों ओर दो दन्तिशालाएँ (गजशाला. हाथियों के ठाण) बनाने चाहिए। इसके बाद, सभा मण्डप के चौक या