भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

सूत्र-८३ 485 चौगान के उपरान्त, आगे की ओर दोनों कोनों पर और सामने के भाग में विजयद्वार अर्थात् विजय पोल बनानी चाहिए जिनके बाहर प्रतोल्या स्तम्भ युक्त पोलें प्राकार अर्थात् परकोटे से वेष्टित बनाई जाए। राजवेश्मोभयपक्षे राज्ञीनां भवनादिकम्। द्विभूमोच्छ्रयहीनानि शेषाणां क्रमयोगतः॥ 17 ॥ इसी प्रकार राजवेश्म अर्थात् राजा के रहने के राजमहल के दोनों पक्षों में, दोनों ओर रानियों के भवनादि बनाने चाहिए। शेष अन्य सभी के भवन रानियों के भवनों से दो मंजिल या द्वितल कम रखने चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां राजभुवनाधिकारो नाम द्व्यशीतितमं सूत्रम्॥ 82 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजभुवन अधिकार नामक बयासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 82 ॥ एकत्रिपञ्चप्रतोली नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम्॥ 83 ॥ विश्वकर्मोवाच — प्रतोलीश्च प्रवक्ष्यामि कनिष्ठ-मध्यमो-त्तमाः। उच्छ्रयस्त्रिविधो वत्स द्वारां प्राकारतोऽपि च॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! अब मैं प्रतोली अर्थात् पोलों के बारे में कहता हूँ। ये इनकी ऊँचाई के अनुसार और द्वारों के प्राकार अर्थात् परकोटे के अनुसार भी तीन प्रकार की होती हैं— कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। प्रतोल्योच्छ्रयप्रमाणमाह — प्रतोल्या द्वारउत्सेधः पञ्चदशकरैः₁₅ शुभः। मध्यस्त्रयोदशकरैः₁₃ रुद्रहस्तैः₁₁ कनिष्ठकः॥ 2 ॥ इन प्रतोलियों में उत्तम प्रतोली के द्वार की ऊँचाई पन्द्रह गज की शुभ कही गई है, मध्यम की तेरह गज और कनिष्ठ की ग्यारह गज की ऊँचाई शुभ है। कनिष्ठमेकभूमं₁ च द्विभूमं₂ चैव मध्यमम्। उत्तमं च त्रिभूमं₃ स्यात् त्रिधोदितक्रमागतम्॥ 3 ॥ इनमें कनिष्ठ पोल या प्रतोली एक मंजिला ही होती है परन्तु मध्यम जाति की प्रतोली दो मंजिला होती है और उत्तम जाति की प्रतोली तो तीन मंजिला होती है। इस तरह क्रम से ये तीन प्रकार की ऊँचाई युक्त बनाई जाती हैं।