भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-८१ 477 अष्टचत्वारिंशद्भिः₄₈ पञ्चभू₅ षड्भू₆ ष्टपञ्चाशद्भिः₅₈ । अष्टषष्ट्या₆₈ सप्तभूम₇ मष्ट₈ भ्वष्टसप्ततिभिः₇₈ ॥ 17 ॥ इसी प्रकार अड़तालीस गज क्षेत्र वाला भवन पाँच भूमि का अर्थात् पाँच मंजिला होता है। अठावन गज क्षेत्र का छह भूमि वाला अर्थात् छह मंजिला होता है। अड़सठ गज क्षेत्र का भवन सात भूमि का और अठत्तर गज क्षेत्र का भवन आठ तलीय या आठ मंजिला होता है। अष्टाशीत्या₈₈ नवभूमं₉ दशभू₁₀ ष्टनवतिभिः₉₈ । भद्रमेकादश₁₁ भूममष्टोत्तरशतात्मके₁₀₈ ॥ 18 ॥ अठासी गज की क्षेत्र भूमि का भवन नौ भौमिक अर्थात् नौ मंजिला होता और अठानवे गज क्षेत्र का भवन दस भूमि का यानी दश मंजिला होता है। इसी तरह एक सौ आठ गज क्षेत्र का भवन भद्र जाति का ग्यारह भूमि का अर्थात् ग्यारह मंजिला होता है। इत्यमनन्तर सिंहद्वारानुक्रमह — सिंहद्वारानुक्रमं च कथये त्वपराजित । उत्तमे च त्रयद्वारं¹ कर्तव्यं चक्रवर्त्तिभिः ॥ 19 ॥ अब हे अपराजित! सिंहद्वारों का अनुक्रम कहता हूँ। इस तरह द्वार-त्रय-उत्तम अर्थात् उत्तम त्रिपोलिया द्वार² चक्रवर्ती राजाओं के भवनों के लिए बनाना कर्तव्य है। उत्तमं पञ्चदश₁₅ च मध्यमं च त्रयोदश₁₃ । कनिष्ठ रुद्र₁₁ हस्तान्तमुच्छ्रयेण तु योजितम् ॥ 20 ॥ इन सिंहद्वारों में उत्तम त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई पन्द्रह गज, मध्यम त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई ऊँचाई तेरह गज और कनिष्ठ त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई ग्यारह गज योजित होगी। सिंहद्वारमिदं मानं त्रिधा₃ स्याच्चक्रवर्तिनि । महाराष्ट्रेovere? महाराष्ट्रेश्वरे राज्ञि महामण्डलकेश्वरे ॥ 21 ॥ चक्रवर्तिनि मध्याद्ये कनिष्ठं मण्डलेश्वरे । ये द्वार मान तीन प्रकार के चक्रवर्ती राजाओं के लिए कहे गए है। महाराष्ट्रेश्वर चक्रवर्ती के पन्द्रह गज की ऊँचाई वाला उत्तम त्रिपोलिया द्वार, महामण्डलेश्वर चक्रवर्ती के लिए तेरह गज की ऊँचाई वाला मध्यम त्रिपोलिया द्वार तथा मण्डलेश्वर

  1. 'द्वारत्रयन्तुत्तमे' इति प्रकाशित पाठः।
  2. प्राचीन राजधानी पुरों, नगरों में त्रिपोलिया द्वार बनते रहे हैं। जयपुर, उदयपुर में भी तीन द्वारों वाले सिंहद्वार की परम्परा देखने में आती है।