अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें478 चक्रवर्ती राजा के लिए ग्यारह गज की ऊँचाई वाला त्रिपोलिया द्वार विहित है यह कनिष्ठ त्रिपोलिया है। अनन्तरं कथयिष्यामि सिंहद्वारं यथाक्रमम् ॥ 22 ॥ द्वारयुग्मं तु कर्त्तव्यं महासामन्तके सदा। द्वारमेकं तु कर्त्तव्यं तथा सामन्तकादिके ॥ 23 ॥ अब इसके बाद, अन्य सिंहद्वारों के बारे में क्रम से कहता हूँ। महासामन्त के भवन में सदैव दो पोल वाला द्वार तथा सामन्त आदि के केवल एक पोल का द्वार बनाना चाहिए। तोरण प्रयोजनलक्षणञ्च — अन्येषां स्वल्पराज्यानां ये स्मृताश्चान्यसञ्ज्ञका। तेषां च तोरणं दद्यात् सिंहद्वारविवर्जितम् ॥ 24 ॥ अन्य छोटे राजा, ठाकुरों आदि के लिए जो केवल अन्य संज्ञक माने जाते हैं, उनके भवन के आगे केवल तोरण ही बनाए, उनके लिए सिंहद्वार का निर्माण करना वर्जित है, उचित नहीं माना गया है। स्तम्भयुग्मोत्तराङ्गाद्यं सिंहकर्णैर्विभूषितम्। नपुंसकं विना कर्णैः स्वल्पराजेषु भाषितम् ॥ 25 ॥ इसलिए ऐसे, लघु राजाओं, ठाकुरों जागीरदारों आदि के भवनों के आगे सिंहकर्ण से युक्त विभूषित दो स्तम्भों पर उत्तरंग अर्थात् छाबना बनाकर नपुंसक जाति का, बिना कर्णों का तोरण बनाया जाए। स्तम्भयुग्मोर्ध्वतः कुर्यात्पत्रमालात्रयं तथा। विप्रेषु क्षत्रियोक्ताश्चं मालायुग्मं च वैश्यके ॥ 26 ॥ उक्त तोरण के दोनों स्तम्भों के ऊपर तीन पत्रमालाएँ बनाकर उनका सुन्दर अलङ्करण करें। इसके अतिरिक्त विप्रों, क्षत्रियों के लिए भी ऐसे ही अर्थात् तीन पत्रमाला युक्त तोरण बनाए। वैश्यों के भवन के तोरण में दो माला का तोरण अलङ्करण करें। एकमाला तु शूद्राणां स्तम्भोर्ध्वं वंशकोच्छ्रिताः। वंशोच्छ्रिता विना स्तम्भैः प्रकृतीनां च सर्वशः ॥ 27 ॥ इसी प्रकार शूद्रों के भवन में एकमाला के तोरण अलङ्करणार्थ बनाए जाए जिनमें स्तम्भ एक बाँस की ऊँचाई के प्रमाण वाले हों। इनके अतिरिक्त सभी