अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-८१ 479 प्राकृतजनों अर्थात् सर्वसामान्य ग्रामीणों और नगरवासियों के घरों के द्वार बिना स्तम्भों वाले ही एक बाँस की ऊँचाई के बनाने चाहिए। इत्यमनन्तर आसनविधानमाह — तोरणं कथितं वत्स आसनं शृणु साम्प्रतम्। आसनं कथयिष्यामि दिव्यमानेन सुव्रत ॥ २८ ॥ अब तक तोरणों के बारे में कहा गया। अब हे वत्स ! तुम आसनों के विषय में सुनो। मैं आसनों का दिव्यमान कहता हूँ। युक्तं च षष्टि₆₀ पञ्चाश₅₀ च्चत्वारिंश₄₀ द्विरङ्गुलैः। महाराजेषूचितं वै इत्थं सिंहासनं त्रिधा₃ ॥ २९ ॥ इनमें पूर्वोक्त सुव्रत नाम के उत्तम आसन साठ, पचास और चालीस अङ्गुल मान के होते हैं जो महाराज चक्रवर्तियों के लिए ही उचित है। इस तरह आसन ज्येष्ठ (60 अङ्गुल), मध्यम (50) और कनिष्ठ (40 अङ्गुल) मान से तीन प्रकार के कहे गए हैं। भद्रासनं महाराष्ट्रे विलासैः पद्मासञ्ज्ञकम्। विस्तारिका तु सामन्तैः चातुरी मन्त्रिमण्डले ॥ ३० ॥ ऐसे राजगद्दी वाले सिंहासन महाराष्ट्र अर्थात् बड़े महाराजाओं के लिए भद्रासन; विलास के लिए पद्मासन (कमलपीठ) का प्रयोग करें। मन्त्रिमण्डल के लिए चातुरी (चौकी, कुर्सी) और सामन्तों के लिए विस्तारिका (तिपाई) नामके आसन बनाएँ। अन्येषां स्वल्पराज्यानां दातव्यं तु मसूरकम्। गदिका पट्टगद्दी च सर्वस्मिञ्जनसङ्कुले ॥ ३१ ॥ आसनं सिंहसञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्। अन्य छोटे राजाओं के लिए तो केवल मसूरक ही देना चाहिए अर्थात् उनके लिए केवल तकिया या मोढ़ा-मसन्द ही उचित है। अन्य सभी जन सङ्कुल के लिए तो आसन के रूप में गदरे अथवा पट्टगद्दी, जाजम-बिछात का प्रयोग करना चाहिए। सिंहसंज्ञक जो आसन होते हैं, वे शयन के प्रयोजन से बड़े सुखदायी हैं।¹ यानं सुखासनं चैव यानं रथ उच्यते ॥ ३२ ॥ यानं महागजपृष्ठं यानं विद्याद्विसारयोः।
- सम्भवतः ये आधुनिक सोफासेट की तरह कोमल, गद्दीदार और आरामदायक बनते होंगे और राजा-महाराजा, बड़े लोगों में तब भी प्रयोग में आते ही होंगे। आज भी उसी परम्परा में ड्राइंगरूमों की शोभा बढ़ा रहे हैं।