भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-८० 469 आँख से देखते हैं। इनका हिनहिनाने का शब्द बड़ी गर्जनाकार का होता है और ये इतने स्वामीभक्त होते हैं कि संग्राम में कोई कठिन परिस्थिति आ पड़े तो अपने स्वामी को बचाकर निकल जाते हैं। इन गुणों वाला जो अश्व समझदार और स्वामीभक्त होता है वह विप्र जाति का अश्व माना गया है। द्रुहोत्प्रविष्ट उदकेऽन्यशब्दे विद्रुतो भवेत्। स्वामिनं रोहयेच्छुद्धश्चान्यं तु परिपातयेत् ॥ 7 ॥ सङ्ग्रामे दुर्धरश्चाश्वो जैत्रहारी प्रबुध्यति। कामातुरश्च शूरश्च जात्या क्षत्रियसञ्ज्ञकः ॥ 8 ॥ जो अश्व पानी में उतरते समय अड़चन करे, विरोध करे, अचकचाए और किसी अन्य व्यक्ति का शब्द सुनके भड़क उठे, चमके तथा अपने स्वामी को पहचान करके उसके अश्वारोहण के समय तो शुद्ध मन से स्थिर रहे परन्तु स्वामी के सिवाय अन्य कोई आरोहण करने की चेष्टा करे तो वह उसे तुरन्त पटक देता हो, ऐसा अश्व संग्राम में बड़ा दुर्धर यानी खतरनाक हो जाता है परन्तु अपने अश्वार