अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें468 विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! अब तक तो मैंने हाथियों के बारे में कहा था। अब तुम अश्वाख्यान भी सुनो। ये अश्व आदि तेजोमय रूप है और समुद्र से उत्पन्न हुए हैं। अथाश्वोत्पत्तिदेशाः – तुरकाद्भवा विख्याताः प्रान्ता दक्षराष्ट्रोद्भवाः। महावन्तन्तोद्भवा¹ वेण्वा वेगवती तटे ॥ २ ॥ चञ्चलाश्चाण्डदेशे च डाहाले प्रतिचारकाः। एते चाष्टविधा₈ अश्वाश्चातुर्वर्ण्यं च कथ्यते ॥ ३ ॥ सामान्यतया तुरक देश में उत्पन्न अश्व विख्यात है। दक्षराष्ट्रोद्भव, महावनों के अन्त में उत्पन्न होने वाले, वेणु, वेगवती नदी के तट पर उत्पन्न होने वाले, चञ्चला, चण्ड देश में उत्पन्न होने वाले, डाहल में प्रतिचार करने वाले— ये आठ प्रकार के अश्व होते हैं। इनमें भी पृथक-पृथक चार वर्ण होते हैं।² अथाश्वाश्चातुर्वर्ण्यमाह – विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा अश्वाश्चत्वार उत्तमाः। इनमें (१.) ब्राह्मण, (२.) क्षत्रिय, (३.) वैश्य और (४.) शूद्र– ये चार प्रकार के उत्तम अश्व होते हैं। बहूदके प्रविष्टश्च पिबेत्तोयं शिरोद ये ॥ ४ ॥ स्थिरक्रमाद् गच्छति चाऽऽसने शुद्धमना स्थिरः। स्वामिनो रोहणे चेतः पश्येद्धृदयचक्षुषा ॥ ५ ॥ शब्दैश्च गर्जनाकारैः सङ्ग्रामे स्वामितारणः। एभिर्गुणैः समायुक्तः सोऽश्वो वै विप्रजातिकः ॥ ६ ॥ जो गहरे पानी में प्रवेश करके सिर तक डुबकी लगा कर पानी पीते हैं, जो स्थिरतापूर्वक क्रम से चलते हैं, स्वामी के आसन ग्रहण करते समय भी स्थिर चित्त से खड़े रहते हैं, स्वामी की सवारी को मन-ही-मन अनुभव करते हैं यानी मन की १. 'महावनान्तरुद्वेगा ?' इति प्रकाशित पाठः। २. हमारे यहाँ पर अश्वशास्त्र की विस्तृत परम्परा देखने में आती है। नकुल का अश्वशास्त्र, पराशरसंहिता, वररुचि कृत अश्वविद्या, किल्हण का सारसमुच्चय, गणकृत अश्वायुर्वेद, जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद, भोजकृत शालीहोत्रम् आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध है। नकुलकृत अश्वचिकित्सा में चार प्रकार अश्वों का वर्णन है। देश भेद से उत्पन्न अश्वों का वर्णन इस प्रकार आया है— चतुर्धा वाजिनो भूमौ जायन्ते देशसंश्रयात्। ताजिकाः