अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकराली अर्थात् भयानक दाँत वाले, काले तालु वाले, कम दाँत वाले या अधिक दाँत वाले हो तो ये छह प्रकार के घोड़े स्वामी घातक होते हैं।¹ अथाश्वशाला लक्षणं — अश्वशालां प्रवक्ष्यामि चतुःषष्टिकरायता₆₄। शतार्द्धस्ता₅₀ मध्या स्यात् चत्वारिंशत्करेत्तरा₄₀ ॥ 18 ॥ पञ्चदशकरा₁₅ ज्येष्ठा त्रयोदशकरेत्तरा₁₃। कनिष्ठैकादशकरा₁₁ पृथुत्वं त्रिविधं मतम् ॥ 19 ॥ अब अश्वशाला बनाने के बारे में प्रमाण कहते हैं— 1. ज्येष्ठ अश्वशाला 64 गज (हाथ) की लम्बाई या आयत तथा 15 गज की चौड़ाई वाली होती है; 2. मध्यम अश्वशाला 50 गज की लम्बाई और 13 गज की चौड़ाई वाली होती है तथा 3. कनिष्ठ अश्वशाला 40 गज की लम्बाई और 11 गज की चौड़ाई वाली होती है। तत्रैव क्रूरार्थपात्रलक्षणमाह — सप्त₇ पञ्च₅ त्रि₃ हस्तं च विस्तरे त्रिविधं स्मृतम्। द्विहस्तमुच्छ्रितं₂ कुर्यात् क्रूरार्थं लक्षणान्वितम् ॥ 20 ॥ तस्य बाह्ये भवेद् भित्तिरेक₁हस्ता च वेष्टने । अब घोड़ों की ठाण में चरने के लिए बनाई जाने वाली कुण्डी के प्रमाणों को कहा जाता है— 7 गज लम्बी 2 गज चौड़ी ज्येष्ठ; 5 गज लम्बी 2 गज चौड़ी मध्यम, और 3 गज लम्बी तथा 2 गज चौड़ी कुण्डी कनिष्ठ कही गई है। ऐसी कुण्डियाँ क्रूरार्थ अर्थात् घोड़े के लिए चरने, भोजन करने की सामग्री रखने के लिए बनाई जाए। उस कुण्डी की दीवार का घेरा एक गज ऊँचाई वाला बनाएँ।
- विष्णुधर्मोत्तर में आए श्लोक उक्त श्लोकों से पर्याप्त साम्यता लिए हैं— हीनदन्तोऽधिदन्तश्च कराली कृष्णतालुकः। कृष्णजिह्वश्च यमजो जातमुष्कश्च यस्तथा॥ द्विशफश्च तथा शृङ्गी त्रिकर्णी व्याघ्रवर्णकः। खरवर्णो भस्मवर्णो जातवर्णश्च काकुदी॥ श्वित्री च काकसादी च खरसारस्तथैव च। वानराक्षः कृष्णसटः कृष्णमुष्कस्तथैव च॥ कृष्णप्रोथश्च मूकश्च यश्च तित्तिरसन्निभः। विषमश्वेतपादस्तु ध्रुवावर्त्तविवर्जितः॥ अशुभावर्त्तसंयुक्तो वर्जनीयस्तुरङ्गमः। जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद में भी ये ही लक्षण आए हैं। यथा— आवर्तो यस्य ककुदे काकुदी स उदाहृतः। करालाश्चाधरा दन्ता जायन्ते यस्य चोत्तरे॥ स कराली इति प्रोक्तो भर्तुः पुत्रादिभक्षकः॥ चतुर्भिः पञ्चभिर्वाथैव हीनदन्तः प्रकीर्तितः। सप्तभिर्भाभिर्नैर्जातस्तथाधिकदन्तकः। अङ्गुष्ठपर्वसङ्काशो छागशृङ्गोपमं तथा। जम्बूबदररूपं च तथा चामलकोपमम् ॥ आप्रास्थिसदृशं चापि हरितक्याः फलोपमम्। दग्धचर्मनिभं चापि वालसंस्थानमेव च॥ कीलं कर्णान्तरे यस्य देशान्ते चापि दृश्यते। धौरेयः सर्वपापानां वाह शृङ्गी स कीर्तितः ॥ एवं विधेन शृङ्गे शृङ्गी राष्ट्रे न वासयेत् ॥ इत्यादि... । (लक्षणप्रकाश पृष्ठ 483-484 पर उद्धृत)