अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
DevanagariHindipublished535 पृष्ठ
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472 ...पृच्छा अश्वशालाप्रमाण — ¹पञ्च₇हस्तोच्छ्रितां भित्तिरर्द्धपञ्च₅ ॥ करोऽथवा ॥ २१ ॥ सप्त₇हस्तोच्छ्रितं कार्यं द्वाभ्यां₂ पक्षस्तम्भकम्। तोरणं सप्त₇हस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत् ॥ २२ ॥ अण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्तोराणय स्तम्भकम्। तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता अङ्गुल्यो द्वादशायतः ॥ २३ ॥ तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्यादण्डच्छाद्यत्रयं तथा। कलशास्तत्र दातव्याः प्रतिछाद्यमथोपरि ॥ २४ ॥ पूर्वापरमुखा अशस्ता तेजो अर्थप्रतापक्षयः। तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः ॥ २५ ॥ दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः। नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः ॥ २६ ॥ अश्वशाला में भित्ति की ऊँचाई पाँच गज या साढ़े पाँच गज की हो तथा उसके दोनों पक्षों पर सात-सात गज ऊँचे दो स्तम्भ बनाए जाएँ। उन स्तम्भों की ऊँचाई के सात गज के अन्तिम भाग पर तोरण बनाने के लिए उत्तर स्तम्भक बनाए। जहाँ तक तोरण के स्तम्भ बने हुए हों वहाँ तक 3 गज ऊँची अण्डछाद्य अर्थात् अण्डाकार गुम्बज की छत बनाएँ। उसके ऊपर अन्तरपत्र 12 अङ्गुल की ऊँचाई के बनाएँ। फिर, उसके ऊपर अण्डाकार तीन गज ऊँची गुम्बजयुक्त छत बनाएँ और फिर उन छतों पर प्रत्येक पर कलश लगाएँ। इन अश्वशालाओं में पूर्व और पश्चिम दिशोन्मुखी शालाएँ अप्रशस्त मानी गई है। इन पूर्वमुखी-पश्चिममुखी शालाओं को तेज, अर्थ, प्रताप और तेज वृद्धि को क्षय करने वाली माना गया है और कहा गया है कि ऐसी शालाओं से तेज वैसे ही क्षय हो जाता है जैसे कृष्णपक्ष का चन्द्रमा दिन-दिन क्षय को प्राप्त होता हुआ अन्त में अमावस्या को प्राप्त करके पूरा क्षय हो जाता है। (घोड़ों को इस प्रकार से बान्धने से भी यही परिणाम होता है¹)। इसके विपरीत दक्षिणमुखी व उत्तरमुखी अश्वशाला प्रशस्त कही गई है। ये स्वामी के प्रताप और कीर्ति को
- 'पञ्चहस्तोच्छ्रिता भित्तिरर्थपञ्चस्वरोऽथवा ? ॥ सप्तहस्तोच्छ्रितं कार्यमुदाढ्या ? पक्षस्तम्भकम्। तोरणं सप्तहस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत्॥ दण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्ताराढ्यस्तम्भकम्। तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता अङ्गुल्यो द्वादशाऽन्यतः॥ तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्याद्दण्डच्छाद्यत्रयं तथा। कलशास्तत्र दातव्याः प्रतिक्षणमथोपरि॥ पूर्वापरमुखास्त्रस्तास्तेजोऽर्थप्रतापक्षयः ?। तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः॥ दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः। नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः॥' इति प्रकाशित पाठः।