भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 535 में से

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पृष्ठ 519

पृथिव्याश्च यदा राजाभुङ्क्तेऽर्द्धं पर मेव च। तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं शतं हीनकरद्वयम् <sub>98</sub>॥ ३॥ जो राजा इससे आधे भूभाग का भोग करने वाला हो उसके लिए राजभवन सौ से दो गज हीन अर्थात् अठानवे गज के विस्तार वाला बनाए। तथा महीत्रिभागं च भुङ्क्ते यो वै नराधिपः। अष्टाशीतिकरं <sub>80</sub> वेश्म महीशानां त्रिधा <sub>3</sub> मतम्॥ ४॥ जो राजा एक तिहाई भूमि का भोक्ता हो, ऐसे राजा के लिए अस्सी गज के विस्तार वाला राजभवन बनाना चाहिए। इस तरह उक्त राजभवनों के तीन प्रकार माने गए हैं। लक्षग्रामाधिपो यस्तु स महामण्डलेश्वरः। तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं द्विहीनाशीतिहस्तकम् <sub>78</sub>॥ ५॥ जो राजा एक लाख ग्रामों को अधिपति हो, उसकी संज्ञा मण्डलेश्वर होती है। उसका राजभवन अस्सी में दो कम अर्थात् अठत्तर गज विस्तार का होना चाहिए। लक्षार्द्धं यदा भुङ्क्ते मण्डलीकोऽभिधानतः। अष्टषष्टिकरं <sub>68</sub> तस्य कर्त्तव्यं भवनोत्तमम्॥ ६॥ जो राजा आधे लाख ग्रामों का भोग करने वाला हो उसका 'मण्डलीक' नाम दिया गया है। उसका राजभवन अड़सठ गज का होना चाहिए॥ ६॥ अयुतद्वयग्रामाणां महा सामन्तसञ्ज्ञकः। तस्य वेश्माऽष्टपञ्चाशत् <sub>58</sub> करं कामफलप्रदम्॥ ७॥ राजा दो अयुत (20 हजार) ग्रामों का स्वामी हो, उसे 'महासामन्त' नाम दिया गया है। उसका राजभवन अट्ठावन गज विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी कामना को फलवती बनाता है। सामन्तसञ्ज्ञकः सोऽत्राऽयुतग्रामाधिपश्च यः। अष्टचत्वारिंशद्धस्तं <sub>48</sub> भवनं शोभनम्॥ ८॥ जो एक अयुत ( 10 हजार) ग्राम का अधिकारी हो उसे 'सामन्त' संज्ञा दी गई है। उसका राजभवन अड़तालीस गज के विस्तार वाला होना चाहिए, जो सब तरह से शोभा वाला होता है। ईशोऽयुतार्द्धग्रामाणां लघुसामन्तक सञ्ज्ञकः। अष्टत्रिंशत्करैर्युक्तं <sub>38</sub> भवनं तस्य कामदम्॥ ९॥

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