भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 535 में से

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सूत्र-८१ 475 जो डेढ़ हजार ग्रामों का स्वामी हो उसको 'लघुसामन्त' नाम दिया गया है। उसका राजभवन अड़तीस गज के विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी सब कामना को पूरी करता है। सहस्रमेकं ग्रामाणां भुङ्क्ते स चतुरंशिकः। अष्टाविंशकरं₂₈ कुर्यात् वेश्मशान्तिप्रदं सदा ॥ 10 ॥ जो राजा एक हजार ग्रामों का भोग लेता है वह 'चतुरंशिक' कहलाता है। उसका राजभवन केवल अट्ठाईस गज का शान्ति प्रदान करने वाला होता है। ग्रामाणां विंशतिं भुङ्क्ते यः पञ्चदशकं तथा। ग्रामांस्त्रीन्द्वौ तथा चैकं भुङ्क्ते पर्यायसंस्थितम् ॥ 11 ॥ इसी प्रकार जो बीस ग्रामों का या पन्द्रह ग्रामों का भोग करता है अथवा तीन, दो या एक ग्राम का भोग करता है, उनके जैसे भी पर्याय¹ बन जाए, वैसा राजवेश्म उनके लिए बनाना चाहिए। शतमेकं तु ग्रामाणां स्वल्पराष्ट्रं तु सञ्जितम्। अष्टादशकरं₁₈ वेश्म कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ॥ 12 ॥ एक सौ ग्रामों के समूह के भोगकर्ता को 'स्वल्पराष्ट्र' संज्ञा दी गई है। ऐसे राजा के लिए अठारह गज विस्तार वाला भवन बनाना चाहिए, यह उसके लिए सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। विशेष : राजवल्लभवास्तुशास्त्रम् (5, 2 व अन्य) में भवनों का प्रमाण इस प्रकार आया है—

क्रमनृपसंज्ञाविशेषता/कोटिगृहप्रमाण (व्यास)
1.चक्रवर्ती(सर्वाधिपति)108 हाथ
2.नृनाथचक्रवर्ती के समान भूमि या तृतीयांश हो88 हाथ
3.महामण्डलिक1 से 2 लाख ग्रामों का अधिपति78 हाथ
4.नृपमण्डलिक50 हजार ग्रामाधिपति68 हाथ
5.सामन्तमुख्य20 हजार ग्रामाधिपति58 हाथ
6.सामन्त10 हजार ग्रामाधिपति48 हाथ
  1. मयमतं में इस प्रकार की विप्रवर्गीय कोटियों का निर्धारण हुआ है और तद्नुसार ही ग्राम विन्यास का निर्देश दिया गया है। मेवाड़ में भौमिया, गोल, चौथिया ठाकुर आदि कोटियाँ भी निर्धारित की गई हैं।
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