भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 481

436 अपराजितपृच्छा वेदाक्षेन्द्रजयोर्मध्ये भ्रमणी पदमध्यगा। राजभुवनस्यार्धे तु भ्रमणी मार्गनिर्गता ॥ 4 ॥ उक्त इन्द्र और इन्द्रजय के चारों पद विन्यास के मध्य में पदों के मध्य से गुजरती हुई भ्रमणी बनानी चाहिए। उस राजभवन के आधे से बनने वाली भ्रमणी मार्ग के बाहर की ओर निकलती हुई बनानी चाहिए। तदूवीथ्यग्रसन्धौ च प्रतोलीः कारयेच्छुभाः। कार्याश्च भ्रमणीमध्ये गजशालास्तथोत्तमाः ॥ 5 ॥ उन वीथियों के अर्थात् मार्गों के अग्रभाग की सन्धि पर एक सुन्दर प्रतोली अर्थात् पोल बनाएँ। उन भ्रमणियों के मध्य वाले भाग में उत्तम गजशाला (हाथीखाना) का निर्माण करना चाहिए। पूर्वार्धे तु त्रिभिर्मांडैः पङ्क्तिरेका तु संस्थिता। अपरयाम्योत्तराणि ? शालाकिन उदाहृताः ॥ 6 ॥ उसके पूर्वार्ध भाग में तीन-तीन माड़ों की एक कतार बनानी चाहिए और दूसरी पश्चिम और उत्तर दिशा की ओर भी शाला ऐसी ही बनानी चाहिए। तद्वाह्यतोऽन्तर्मार्गश्च कर्तव्यं शुभलक्षणम्। महिषीगृहल्पहीनं राजमातृगृहं भवेत् ॥ 7 ॥ उनमें बाहर जाने और भीतर आने के अन्तःमार्ग भी भली प्रकार आरामदायक बनाए जाने चाहिए। यह भी ध्यान में रखें कि राजमहिषी अर्थात् राजरानी या पटरानी के महल से राजमाता का महल आकारादि में थोड़ा न्यून होना चाहिए। मैत्रान्ते पुरतो भागे द्वारगर्भस्तथान्तरे। गोपुराकृतिः कर्तव्यो दृढार्गलसमन्वितः ॥ 8 ॥ वास्तुपद विन्यास के अनुसार मैत्रान्त तक के पद भाग पर नगर के लिए आगे के भाग में द्वारगर्भ बनाना चाहिए जिसकी आकृति गोपुरम् के आकार की हो। उनमें भी कपाट बन्द होने के बाद सुदृढ़ अर्गला लगाकर सुरक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। तत्सूत्रेण कृतं द्वारं राजमातृगृहात्परम्। मैत्राग्निकर्णे कुर्याच्च सभामांडं सुशोभितम् ॥ 9 ॥ इसी द्वार की सीध के सूत्र में राजमाता के गृह का भी द्वार भी उसके परे होना चाहिए और वास्तुपद विन्यास के मैत्राग्रिपद कर्ण पर एक सुन्दर सुशोभित सभामांड अर्थात् सभामण्डप बनाएँ अर्थात् मैत्रपद के अग्निकोण वाले भाग पर सभामण्डप बनेगा।