भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७५                     १७७ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शस्यावतारधिकारो नाम पञ्चसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७५ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शस्यावतार अधिकार नामक पचहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥ महाराजनिवेशोनाम षट्सप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७६ ॥ विश्वकर्मोवाच — चतुःषष्टिपदैर्भक्ते राजवेश्मनि वास्तुनि। देववेश्य( ?म )राजवेश्म मैत्रपदे समाश्रितम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि राजभवन के वास्तु में चौंसठ पद विन्यास के वास्तुमण्डल के अनुसार जो भवन बनाए जाते हैं, वे देववेश्म अथवा राजवेश्म जो भी हों, मैत्रपद के समाश्रित होते हैं। उच्चरङ्गिका प्रमाणमाह — प्रदक्षिणान्ते मार्गांश्च निवेशयेत्तु वेश्मनः। गजस्कन्धसमोत्सेधा प्रथमा ह्युच्चरङ्गिका ॥ २ ॥ उन वेश्मों अर्थात् भवनों में प्रदक्षिणा के अन्त में मार्गों का निवेश होना चाहिए अर्थात् मार्गों को बनाएँ। उनमें जो पहली उच्चरङ्गिका बनाएँ, उसे हाथी के कन्धे जितनी ऊँचाई की बनाएँ। अन्य गृहादीनां — इन्द्रेन्द्रजयोर्मध्ये च राजमातुर्निवेशनम्। रुद्रे रुद्रदासे चैव वेश्मनः पेटमादिकम् ॥ ३ ॥ इसी प्रकार उसमें इन्द्र और इन्द्रजय पद विन्यास के भाग में राजमाता के लिए भवन बनाना चाहिए। रुद्र और रुद्रदास वाले पद विन्यास में पेटमादिक के भवन बनाने चाहिए अर्थात शृङ्गार-पेटियों और टोकरियों, थैलों का भण्डार गृह बनाना चाहिए। चौहानवंशी चाचिगदेव द्वारा जोधपुर के निकट सुण्डा या सुगन्धाद्रि पर्वत पर अपराजितेश के मन्दिर के लिए स्वर्ण कलश व ध्वजा बनवाने का वर्णन वहाँ से प्राप्त प्रशस्ति में मिलता है। जयसमुद्र के पास वीरपुरा में रहट सहित कुएँ वाली भूमि का दान हुआ। आहाड़ में भी रहट-हल-निवाण की भूमि का दान गजराज के चाणक षोथा धींग ने किया था।