अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें434 अपराजितपृच्छा अजलाश्र्व जलाकीर्णा अवृष्ट्याैकार्णवीकृता । धर्मस्त्राता च दुर्भिक्षे धर्मराजो महोत्सवः ॥ ३८ ॥ उक्त सभी उपायों से जहाँ की भूमि में जल का अभाव देखा गया हो, वहाँ की भूमि जलाकीर्ण अर्थात् जल से लबालब तालाबों वाली हो जाएगी और अवृष्टि होने पर भी चारों ओर सागरों से भरी-पूरी सी होगी क्योंकि दुर्भिक्ष में यही ज्ञान धर्मत्राता बनकर आता है। अस्तु, इस धर्मराज के महोत्सव अर्थात् जल संग्रह के श्रमदान- अनुष्ठान को महोत्सव की तरह मनाकर जल सञ्चय से सुखी होना चाहिए। सम्प्राप्तो धर्मराजत्वं वरुणस्त्रिदशैः सह। तं देशं स्वर्गमाख्याति चेन्द्रतुल्यस्य भूपतेः ॥ ३९ ॥ इस प्रकार के श्रमदान या धर्म की साधना से धर्मराजत्व की सम्प्राप्ति होती है और वरुण देवता के साथ अन्य देवताओं की कृपा से वह देश स्वर्ग कहलाने लगता है और वहाँ ऐसे जल सञ्चय और संरक्षण करने के उद्योग में लगे रहने वाला राजा भी इन्द्र के समान आदरणीय और सुखी रहता है। रसो रसायनं ज्ञानं धनधान्यादिसम्भवः । सर्वं प्राप्तं फलं तेन येन वै सञ्चितं जलम् ॥ ४० ॥ सभी प्रकार के रसों और रसायनों का ज्ञान भी धन-धान्य सम्भव होने पर ही होता है। अस्तु, जिसने जल सञ्चयन का विज्ञान प्राप्त कर लिया, उसने सभी फलों को प्राप्त कर लिया— ऐसा समझें। स्वर्णपुष्पफलैर्युक्तो नित्यं स त्वपराजित । नृपेण सूत्रधारेण महीशस्यादिभूषिता ॥ ४१ ॥ हे अपराजित ! यह समझ लो कि ऐसे उद्योगों के कर्ता और समझदार राजा ने सूत्रधार के ज्ञान की सहायता से इस भूमि को धन-धान्य से भूषित करके मानों स्वर्ण-पुष्प-फलों की खेती-बाड़ी का अनुष्ठान कर लिया है।¹
- जिस देश की माटी सोना उगले और जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ गीत-गुञ्जार करे— ऐसा खुशहाल देश हो, इसी प्रकार के जल सञ्चय और जल संग्रहण के अनुष्ठान से छोटे-छोटे चेकडेम, एनीकट के प्रयोग जैसे कार्य आज अति आवश्यक है। अपराजित शिल्पशासन ने लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व ऐसे उपाय बताए हैं। इन निर्देशों का मेवाड़ के राजाओं ने सर्वाधिक पालन किया। इस ग्रन्थ के रचनाकाल के आसपास ही, 1265 ई. में घाघसा (चित्तौड़गढ़) गाँव में वापी का निर्माण हुआ था। यहाँ से कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा संवत् 1322 की प्रशस्ति मिली है जिसमें अपराजित के वंशज जैत्रसिंह द्वारा गुजरात के तुरुष्कों व शाकम्भरी के शासकों को पराजित करने का वर्णन है। इसकी रचना आचार्य रत्नप्रभ ने की जो आचार्य भुवनदेव सिंहसूरी का शिष्य था। इस प्रशस्ति के ठीक तीन साल पहले