अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 484, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७६ 439
वास्तुपद विन्यास के दक्षिण की ओर वितथ, गिरि पद भाग पर रथों (यानों के रखने के) रथखाना आदि बनाने चाहिए। गिरि के भाग में काष्ठगृह (काठ, ईंधन गोदाम, टाल, बाड़ा) बनाएँ, उसके पास के ही वितथ पदभाग में जल भण्डारण (पानी के हौज और सभी प्रकार के जल संग्रह के उपाय) की समुचित व्यवस्था का क्षेत्र बनाएँ अर्थात् जल विभाग के भवनों का निर्माण हो। सुग्रीवनन्दिसन्धौ च युद्धद्वारं पराङ्मुखम्। असुरशेषसन्धौ च द्वारमम्भोगृहैर्युतम् ॥ 21 ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के सुग्रीव व नन्दी के पद भाग के सन्धि-स्थल में पश्चिम दिशोन्मुख युद्धद्वार का निर्माण करना चाहिए। इसी तरह असुर व शोष पद भाग के सन्धि-स्थल में पश्चिम दिशा की ओर पानेरा रूपी जल गृहों युक्त द्वार का निर्माण करना चाहिए। सुग्रीवपुष्पदन्तयोर्वरुणासुरयोस्तथा। अश्वशाला द्वादशैव कर्तव्याश्च शुभोत्तमाः ॥ 22 ॥ इसी तरह सुग्रीव व पुष्पदन्त के सन्धि-स्थल पद पर तथा वरुण और असुर के सन्धि-स्थल पद पर बारहों प्रकार की अश्वशालाएँ अर्थात् घुड़साल बड़े ही सुन्दर ढंग की, व्यवस्थित बनानी चाहिए। अर्धे तवङ्गनिष्कास ? सैन्यविस्तरविस्तृतम्। प्राकारासमुत्सेधानि त्रिमाडानि तदूर्ध्वतः ॥ 23 ॥ जिनके आधे में तवङ्गों का निष्कास होना चाहिए जो सेना के विस्तार के अनुरूप ही विस्तार वाली हो अर्थात् सेना अश्वारोही सैनिकों की समस्त अश्व पूर्ति करने में समर्थ हो। उनके बाहर पर्या स ऊँचा परकोटा भी बनाना चाहिए, परकोटे पर ऊपर के भाग में तीन माड भी बनाए जाए। कार्यं दौवारिके भिट्टं गजस्कन्धसमोच्छ्रितम्। द्वाराग्रे तु भवेन्माडं मल्लैरग्रे तु युध्यते ॥ 24 ॥ उस परकोटे की भिट्ट पर हाथी के कन्धे के बराबर ऊँचाई वाले द्वारपालों की विशाल मूर्तियाँ भी बनानी चाहिए। दरवाजे के विशाल माड गृह भी बनाने चाहिए जिसके आगे अखाड़े में मल्ल-पहलवान लोग तरह तरह के मल्लयुद्ध का अभ्यास कर सकें। पूर्वापरद्वारद्वयं द्वात्रिंशत्₃₂ स्तम्भभूषितम्। तद्वृत्तमाडं वृत्तं तु पञ्चविंशतिभिः₂₅ करैः ॥ 25 ॥ पूर्व दिशा में और पश्चिम दिशा में ऐसे दो बड़े द्वार हों जिनमें प्रत्येक द्वार बत्तीस