भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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440 अपराजितपृच्छा स्तम्भों से विभूषित हों और उनका वृत्त भी पच्चीस गज के विस्तार वाला होगा। स्तम्भे स्तम्भे पताका च द्विजालोककलोद्भवम्। रक्तपुष्पसमाकीर्णं द्वारिकं चतुरङ्गुलम्॥ २६॥ उन प्रत्येक स्तम्भ पर पताकाएँ फहराती हुई हो जो (द्विजालोक कलोद्भवं) चार अङ्गुल मोटे लाल पुष्पमालाओं से समाकीर्ण अर्थात् सजे-धजे दो-दो जालोक अर्थात् झरोखों पर उठी हुई शोभायमान होती है। खड्गविद्याविज्ञयुद्धं छुरिकायुद्धमुत्तमम्। तथैव मल्लयुद्धं च गात्रभङ्गैरनेकधा॥ २७॥ निरीक्ष्यते यतः सर्वं खड्गाद्यायोधनं तथा। एवं युद्धोद्भवा राजप्रासादे च महोत्सवाः॥ २८॥ इस प्रकार के द्वारगृहों वाले राजप्रासादों में खड्ग विद्याविज्ञ युद्ध अर्थात् तलवारों से लड़ने के पैंतरेबाज योद्धाओं के अभ्यास, छुरी से लड़ाई के विविध दाँव-पेंच के अभ्यास तथा पहलवानी के कुश्ती के अनेक प्रकार के गात्रभङ्ग अर्थात् दाँव-पेंच, पटकनी देने के तौर-तरीकों के जानकार यहाँ आकर खड्गादि युद्धकला के करतब देखने को आते रहते हैं और ऐसे युद्ध सम्बन्धी महोत्सव भी राजमहल के आङ्गन में समय-समय पर होते रहें। नियन्त्रितोभयद्वारं माडं रश्माक्ष्यमुन्नतम्। भिट्टे चापरद्वाराणि कार्याणि चासुरोन्मुखम्॥ २९॥ इन दोनों दरवाजों पर उन्नत ढंग की रस्सियों से नियन्त्रित ऊँचा माड बनाना चाहिए (सम्भवतया यह कनात युक्त तम्बू या छौलदारी की मजबूत रस्सियों वाली व्यवस्था दरवाजों के ऊपर समय-समय पर आवश्यकतानुसार बनाई जाने वाली अस्थायी माड़ के बारे में सङ्केत है)। भिट्ट के अन्य द्वारों को भी वास्तुपद विन्यास के अनुसार असुर पद भाग पर बनाने चाहिए। बाह्यदेवपङ्क्तिमध्ये राजवेश्मान्तमार्गतः। मुख्यभल्लाटसौम्येषु गजशालपङ्क्तिद्वयम्॥ ३०॥ राजमहलों के अन्त में बाहरी देवपङ्क्ति के मध्य के मार्ग पर वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के मुख्य, भल्लाट और सौम्य पद भाग तक उत्तर की दिशा में गजशालाओं की दो पङ्क्तियों को बनाना चाहिए। याम्योत्तरमुखं कार्यं प्रशस्तं सर्वकामदम्। सौम्यन्ते हस्तिनीवेश्म तद्द्वारमपरोन्मुखम्॥ ३१॥