अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंवास्तुपद विन्यास के भवन निर्माण क्षेत्र के विवस्वत और पृथ्वीधर के भाग के आधे क्षेत्र में पूर्व दिशा की ओर निकलते हुए प्राकार अर्थात् परकोटा बनाएँ। इसी तरह ब्रह्मभाग वाले पद स्थान के गर्भ से उत्तर की ओर परकोटा बनाकर उसके आगे जयद्वार की रचना करें। तत्प्राकारमध्यकर्णे गजशालावुभौ मतौ। तस्य बाह्ये गृहमन्यं राजपिण्डपाद्यादिकम् ॥ 16 ॥ उस परकोटे के मध्यवर्ती कोनों पर भी दोनों ओर हाथियों के ठाण या गजशालाएँ बनाएँ। फिर, उनके बाहर की ओर अन्य कोई गृह निर्माण किया जाए जिसमें राजा के पिण्ड अर्थात् खाद्य और पाद्य अर्थात् पीने की सामग्री के संग्रह की व्यवस्था होगी। आपवत्समरीच्यर्धे राजवेश्म गृहोत्तमम्। कपिशीर्षयुतश्चैव प्राकारो वास्तुबाह्यतः ॥ 17 ॥ वास्तुपद विन्यास के आपवत्स और मरीचि पद के क्षेत्र के आधे में उत्तम राजवेश्म या राजमहल बनाए जाएँ जिनके बाहर के परकोटे पर कपिशीर्ष अर्थात् सुन्दर कंगूरे बने हुए हों। पित्रग्नीशरोगकर्णेष्वट्टालकचतुष्टयम्। महाप्रतोल्या माहेन्द्रे गिरिसंस्था तथोत्तरे ॥ 18 ॥ इसी तरह वास्तुपद विन्यास के क्षेत्र के पितृ, अग्नि, रोग और ईश— इन चारों कोनों के पद भागों पर चार बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनाई जाएँ जिन्हें 'अट्टालक चतुष्टय' नाम दिया गया है तथा वास्तुपद विन्यास के उत्तर भाग में माहेन्द्र, गिरि के स्थान पर एक महा प्रतोली या बड़ी पोल बनाई जाए। भास्वतो यमदिग्भागे समस्ता च वलूरिका। राजवेश्मान्तर्भागे च वाद्यशाला तथोत्तरा ॥ 19 ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के दक्षिण दिशा के भाग में सभी प्रकार की वलूरिकाएँ, वनकुञ्ज, पर्णशाला, झुरमुट, निकुञ्ज, बीहड़ क्षेत्र आदि रखे जाएँ। महल की ओर के अन्तरङ्ग भाग में बाह्यशाला का निर्माण अवश्य होना चाहिए जहाँ राजमहल की रमणियाँ, महिलाएँ गाने-बजाने, सङ्गीत का आनन्द ले सकें और आमोद-प्रमोद में अपना रहन-सहन स्थिर कर सके। वितथे गिरिसंस्थाने रथरन्ध्राणि कारयेत्। गिरौ काष्ठाङ्गं चैव वितथे चाम्भसां गृहम् ॥ 20 ॥