भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 535 में से

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सुविधा का सूत्रधार के शास्त्रज्ञान से प्रबन्ध कराता है, वह सभी कामनाओं को पूरा करने का फल प्राप्त करता है। वसुधा तु ध्रुवं पुष्पं फल राष्ट्रेषु वै प्रजा। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रजा पाल्या महीभृता ॥ 15 ॥ क्योंकि, यह समझ लें कि यह वसुधा तो केवल पुष्प मात्र है, यह ध्रुव सत्य है परन्तु वही पुष्प राष्ट्र की प्रजा के रूप में फल बन जाता है, इसलिए राजा को चाहिए कि वह सारे प्रयत्न करके अपनी प्रजा के न्यायपूर्वक पालन-पोषण में वृद्धि करें। स्वस्थ देशलक्षणं - यत्र देशे प्रजाः स्वस्थाः सदा च धनिनो जनाः। तत्र देशे च कल्याणमिच्छासिद्धिर्भवेन्नृपः ॥ 16 ॥ जिस देश की प्रजा स्वस्थ या तन्दुरुस्त है, वहाँ के सभी उद्योग-धन्धे सुचारू रूप से चलते हैं और प्रजा अपने उद्यम व उद्योग से धनवान होती है। ऐसे ही स्वस्थ और धनवान प्रजा वाले देशों में सदा कल्याण बना रहता है और वहाँ के राजाओं को भी सभी इच्छाओं की सिद्धि मिलती रहती है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था हेमरत्नविभूषिताः। स देशो दुर्लभो वत्स स्वर्गादिभोगदायकः ॥ 17 ॥ हे वत्स ! मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जिस देश की प्रजा स्वस्थ है और इतनी धनवान है किसभी लोग सोने-चाँदी-रत्नों आदि के आभूषणों से सुशोभित हो, ऐसा देश इस धरती पर दुर्लभ है और वह स्वर्ग के समस्त भोगों का अधिकारी है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था उत्तमाधममध्यमाः। सर्वकार्येषु सोत्साहाः स देशो दुर्लभः सुरैः ॥ 18 ॥ जिस देश की प्रजा-उत्तम, मध्यम और अधमादि रूप से स्वस्थ-सानन्द हैं और सब कामों में सोत्साह लगी रहती है, वह देश तो देवताओं को लिए भी दुर्लभ है अर्थात् देवताओं से भी बढ़-चढ़कर सुखी है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था दिव्यवस्त्रविभूषिताः। दिव्यभोगा नष्टरिपुः स देशो देवदुर्लभः ॥ 19 ॥ जिस राज्य अथवा देश की प्रजा स्वस्थ है और दिव्य वस्त्रों को धारण करने वाली सम्पन्नता से युक्त है, जिसको दिव्य भोग प्राप्त हैं और जिसके समस्त शत्रु नष्ट हो चुके है- ऐसा देश देवों को भी दुर्लभ है।