अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७५ 427 लोकमङ्गलमूलमाह — लोको मूलं भूश्च वृक्षश्चाम्भो भूपालरक्षणम्। तेनाक्षयं भवेद्राष्ट्रं प्रजावांस्तु चिन्तामणिः ॥ 11 ॥ हे अपराजित! लोगों के मङ्गल का मूल है— भूमि, वृक्षं, जल, भूपाल और सबका रक्षण। अस्तु, यदि इनमें से किसी का भी क्षय होता है तो राष्ट्र और राष्ट्र की प्रजा के लिए बड़ी चिन्तामणि अर्थात् शोचनीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सारांश यह कि सूत्रधार का जलशोधन का शिल्पशास्त्रीय ज्ञान सबको चिन्तामुक्त कर सकता है। बहुपुण्यप्रभावेण प्रसन्नः साम्प्रतं शिवः। प्रजास्तु पीडिता येन तद्राष्ट्रं गच्छति क्षयम्॥ 12 ॥ यह सब कुछ बहुत पुण्य के प्रभाव से ही सम्भव होता है जिसके कारण शिव तत्काल प्रसन्नता ही समझें। अस्तु, शास्त्रज्ञान से जल की उपलब्धि सर्वोपरि शिव की प्रसन्नता ही समझें। जिस राजा के राज्य में प्रजा को पीड़ा पहुँचती है, उस राष्ट्र का क्षय हो जाता है।¹ अन्यायद्रव्यनिरता न्यायं त्यक्त्वा तु लोभतः। कुलमूलविनाशार्थं राजा हन्ति प्रजां समाम्॥ 13 ॥ जिस राजा के राज्याधिकारी अन्याय से धन कमाने में लगे हों, रिश्वत और भ्रष्टाचार से न्यायमार्ग छोड़कर लोभ में पड़ गए हो, ऐसा बेसुध और अयोग्य शासक राजा अपना, अपने कुल और अपनी तमाम प्रजा के भी नाश का कारण बनता है और स्वयं आत्म हन्ता होता है। वसुधायाः प्रजा मूलं ²धान्यो यस्तां विशेषतः। प्रतिपालयते भूपः सर्वकामफलप्रदः ॥ 14 ॥ इसलिए यह बात सदा अपने ध्यान में रखें कि इस पृथ्वी पर उसका मूल प्रजा ही है और उसमें भी धान्यों की अपनी विशेषता है। प्रजा के जीवनाधार के रूप में और जो राजा अपनी प्रजा का धन-धान्य से पालन करता है, जलाशयों की सुख-
- गोस्वामी तुलसीदास ने भी यही बात कही है- जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥ (रामचरितमानस बालकाण्ड, 70, 6)
- 'धन्यो' इति प्रकाशित पाठः। काश्यप मुनि का मत है कि देवताओं ने पृथ्व्योत्पन्न धान्य, धागे को माङ्गलिक सूत्र कहा है। इस पर होने वाला धान्य एवं शाक जीवनाड़ी अथवा जीवनदायिनी है, वे पृथ्वी पर जीवनतत्त्व का निर्माण करने वाली है— माङ्गल्यसूत्रं च तथा सस्यमाहुर्दिवौकसः। सस्यादिरेव मेदिन्याः जीवनाडी कलात्मिका॥ (काश्यप. 1, 17)