भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 459

वृद्धिदं पार्श्वदण्डं च श्रीपदं श्रीपुरं तथा। रिपुमर्दनं रिप्वन्तं त्राहं चैवाभयप्रदम् ॥ 14 ॥ पार्श्वदण्ड पुर वृद्धिकारक होता है और श्रीपुर नामक तो धनलक्ष्मी श्रीप्रद ही है। रिपुमर्दन पुर शत्रुओं का नाश करता है। त्राह नामक पुर भी अभय दिलाता है। दिव्यकं देवभवनमुत्तरं चोत्तमोत्तमम्। धर्मं धर्मकरं नित्यं कमलं शान्तिदायकम् ॥ 15 ॥ दिव्य पुर देव मन्दिरों-सा सुख और उत्तर नामक पुर सदा उत्तम से उत्तम सुख देता है। धर्म नामक पुर नित्य धार्मिक भाव बढ़ाता है और कमल नामक पुर शान्तिप्रद होता है। इन्द्रराज्योद्धवं शक्रं पौरुषं भीमविक्रमम्। महाजयं पुरं नाम सर्वदानन्दकारकम् ॥ 16 ॥ शक्र नामक पुर इन्द्र के स्वर्ग-सा सुखदायी और पौरुष नामक पुर बड़ा पराक्रम प्रदर्शित करवाता है। महाजय नामक पुर भी सर्वदा आनन्ददायक होता है। इत्थमाकृतयो गुणाः कथितास्तव मयाधुना। शुभानां सुप्रशस्तानां पुराणां विंशतिस्तथा ॥ 17 ॥ इति पुरगुणाधिकारः। इतनी इन पुरों की आकृतियों की गुण-गाथा मैंने अभी तुमसे कही, इस तरह पुरों की यह विंशति शुभ की और सुप्रशस्तियों की वृद्धि करने वाली होती है। इत्यमनन्तर अशुभ पुराकृतिमाह — अग्निदं वायवं चैव शकटं युग्मशाकटम्। वज्रं त्रिशूलमाख्यातं कर्णिकं चैव सप्तमम् ॥ 18 ॥ एताः सप्तपुरश्चैव महोदोषभयावहाः। तासां रूपं तथाकारं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 19 ॥ अब कुछ अशुभ आकृतियों के पुरों को भी बताता हूँ। इनमें 1. अग्निद, 2. वायव, 3. शकट, 4. युग्मशाकट, 5. वज्र, 6. त्रिशूल, और 7. कर्णिक— ये सातों पुर महादोष, भयकार है। इनके रूप तथा उनके आकार अब तुम्हें कहता हूँ।¹

  1. इसी प्रकार कहा गया है— विस्तीर्णं सभाभागञ्च संस्थितं परिकीर्तितम्। चतुरस्रं चतुष्कोणं समभागं विभागतः ॥ वृत्तमेतत् समाख्यातं वास्तुलक्षण कोविदैः। चतुर्भिर्विभजेत् कोणैस्तद्वास्तुवृत्तमुच्यते ॥ आयतं चतुरस्रं च मध्यकोष्ठे भवेत् फलम्। यदि वर्तुलपीताभं स्थानं भद्रासनं विदुः ॥ चक्रवक्रसमाकारे विजयं निम्नतोन्नतम्। निम्नता चापकृष्टा च शक्रचापस्य कीर्तिता ॥ त्रिकोणं शकटाकारं तद्वास्तुकृदिहोच्यते।