भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७३ 415 अग्निदं च त्रिकोणाख्यं षट्कोणं चैव वायुवम्। शकटं शकटाकारं युग्मं द्विशकटाकृति ॥ २० ॥ अग्निद नामक पुर त्रिकोणाकृति का होता है। वायुव छह कोणों की आकृति वाला होता है। शकट पुर गाड़ी के आकार का होता है जबकि युग्मशाकट पुर दो गाड़ियों की जोड़ी के आकार वाला होता है। वज्रकं वज्रसङ्काशं त्रिशूलं त्रिशूलाकृति। कर्णिकारं विकर्ण तु चाकाराः कथितास्तव ॥ २१ ॥ वज्रक पुर वज्र जैसा कठोर दुःखदायक होता है और त्रिशूल पुर त्रिशूल की आकृति में बसाया हुआ होता है। कर्णिकपुर बिना कोणों का होता है— इतने इन सभी पुरों के आकारों को तुम्हें कह दिया है। तस्य फलोच्यते — अग्निदेऽग्निभयं घोरं वायुवं बहुक्लेशदम् । शकटं तु पुरं चैवं प्रजाक्लेशावहं स्मृतम् ॥ २२ ॥ अब उनके गुणों को सुनो— अग्निद पुर में सदा अग्निभय बना रहता है। वायुव पुर बहुत कष्ट देने वाला और शकट पुर में तो वहाँ की निवासी प्रजा क्लेश में बनी रहती है। पुरे द्विशकटाकारे तस्करादि भयं भवेत्। वज्राकृति पुरं यत्र वज्रपातस्तदोद्भवेत् ॥ २३ ॥ युग्म शकट पुर में भी चोरों-तस्करों का भय बना रहता है और वज्राकृति पुर में भी सदा वज्रपात होते रहते हैं। त्रिशूले च पुरे चैव सदा युद्धं समुद्भवेत्। कर्णिकारे च दुर्भिक्षं प्रजा तत्र न नन्दति ॥ २४ ॥ त्रिशूल पुर में सदा ही युद्ध की स्थिति बनी रहती है और कर्णिकाकार पुर में प्रायः दुर्भिक्ष-अकाल पड़ते रहते हैं और प्रजा दुःखी रहती है। दीर्घदण्डमिति ख्यातं पवनं पवनात्मकम् ॥ मुरजं मुरजाकारं बृहन्मध्यं प्रकीर्तितम् । अश्वत्थपर्णवत् कुम्भो धनुःकोणाकृतिर्धनुः ॥ शूर्प शूर्भनिभं ज्ञेयं गृहं गणितकोविदैः ॥ (वास्तुरत्नावली और राजमार्तण्ड में शिल्पशास्त्र के मत से उद्धृत) समराङ्गण में छिन्नकर्ण, विकर्ण, वज्र, सूचीख्य, वर्तुल, व्यजनाकार, धनुषाकार, द्विगुणायत, शकटद्विसमाकार, कुदिशस्थ, सर्पचक्र जैसे अप्रशस्त पुरों या अगर्हित पुरों का वर्णन मिलता है, जिनके नियोजन-निर्माण का निषेध किया गया है। (समराङ्गण, पुरनिवेश 53-54 व 67)