अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र-७३ 415 अग्निदं च त्रिकोणाख्यं षट्कोणं चैव वायुवम्। शकटं शकटाकारं युग्मं द्विशकटाकृति ॥ २० ॥ अग्निद नामक पुर त्रिकोणाकृति का होता है। वायुव छह कोणों की आकृति वाला होता है। शकट पुर गाड़ी के आकार का होता है जबकि युग्मशाकट पुर दो गाड़ियों की जोड़ी के आकार वाला होता है। वज्रकं वज्रसङ्काशं त्रिशूलं त्रिशूलाकृति। कर्णिकारं विकर्ण तु चाकाराः कथितास्तव ॥ २१ ॥ वज्रक पुर वज्र जैसा कठोर दुःखदायक होता है और त्रिशूल पुर त्रिशूल की आकृति में बसाया हुआ होता है। कर्णिकपुर बिना कोणों का होता है— इतने इन सभी पुरों के आकारों को तुम्हें कह दिया है। तस्य फलोच्यते — अग्निदेऽग्निभयं घोरं वायुवं बहुक्लेशदम् । शकटं तु पुरं चैवं प्रजाक्लेशावहं स्मृतम् ॥ २२ ॥ अब उनके गुणों को सुनो— अग्निद पुर में सदा अग्निभय बना रहता है। वायुव पुर बहुत कष्ट देने वाला और शकट पुर में तो वहाँ की निवासी प्रजा क्लेश में बनी रहती है। पुरे द्विशकटाकारे तस्करादि भयं भवेत्। वज्राकृति पुरं यत्र वज्रपातस्तदोद्भवेत् ॥ २३ ॥ युग्म शकट पुर में भी चोरों-तस्करों का भय बना रहता है और वज्राकृति पुर में भी सदा वज्रपात होते रहते हैं। त्रिशूले च पुरे चैव सदा युद्धं समुद्भवेत्। कर्णिकारे च दुर्भिक्षं प्रजा तत्र न नन्दति ॥ २४ ॥ त्रिशूल पुर में सदा ही युद्ध की स्थिति बनी रहती है और कर्णिकाकार पुर में प्रायः दुर्भिक्ष-अकाल पड़ते रहते हैं और प्रजा दुःखी रहती है। दीर्घदण्डमिति ख्यातं पवनं पवनात्मकम् ॥ मुरजं मुरजाकारं बृहन्मध्यं प्रकीर्तितम् । अश्वत्थपर्णवत् कुम्भो धनुःकोणाकृतिर्धनुः ॥ शूर्प शूर्भनिभं ज्ञेयं गृहं गणितकोविदैः ॥ (वास्तुरत्नावली और राजमार्तण्ड में शिल्पशास्त्र के मत से उद्धृत) समराङ्गण में छिन्नकर्ण, विकर्ण, वज्र, सूचीख्य, वर्तुल, व्यजनाकार, धनुषाकार, द्विगुणायत, शकटद्विसमाकार, कुदिशस्थ, सर्पचक्र जैसे अप्रशस्त पुरों या अगर्हित पुरों का वर्णन मिलता है, जिनके नियोजन-निर्माण का निषेध किया गया है। (समराङ्गण, पुरनिवेश 53-54 व 67)
416 अपराजितपृच्छा इत्यादिसप्तदोषांश्च वर्जयेत् पुरदोषदान्। विंशतिः सुखदाः ख्याता दोषदाः सप्त एव च ॥ 25 ॥ इस प्रकार उक्त सात पुरों के दोष होते हैं। अस्तु, इन आकारों में पुरों का निवेशन वर्जित जानना चाहिए। यहाँ प्रजा हितावह पुरों की विंशति और सात दोषकारक पुरों का वर्णन किया गया। अथाकारानुसारेण पुरग्रामादीनां प्रमाणमाह — पुरार्धेन भवेद् ग्रामो ग्रामार्धेन तु खेटकम्। खेटकार्धेन भवेत् कूटं कूटार्धेन तु कर्वटम् ॥ 26 ॥ अब विविध नामों के आकार प्रमाण कहता हूँ। पुर के आधे भाग पर बसी हुई बस्ती को ग्राम और ग्राम के आधे को खेटक कहा जाता है। खेट के आधे को कूट और कूट का आधा कर्वट कहलाता है।¹ पुरे सप्तदश मार्गा ग्रामो वै नवमार्गतः । खेटके पञ्च मार्गाः स्युस्त्रिभिर्मार्गैश्च कूटकम् ॥ 27 ॥ पुर नामक बस्ती में 17 सड़कें होती हैं जबकि ग्राम में 9 सड़कें ही होती हैं। खेटक में 5 मार्ग होते हैं और कूट में केवल 3 ही मार्ग होते हैं। द्वौ मार्गौ कर्वटे ख्यातौ छन्दाः पञ्च प्रकीर्तिताः । पुर-ग्राम-खेटकं च कूटं च कर्वटाभिधम् ॥ 28 ॥ इसी प्रकार कर्वट में तो 2 मार्ग ही होते हैं। इस तरह इनके ये पाँच छन्द—पुर, ग्राम, खेटक, कूट और कर्वट नाम से बताए गए हैं।² इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पुरलक्षणाधिकारो नाम त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 73 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पुर लक्षण अधिकार नामक तिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 73 ॥
- अग्निपुराण में ग्राम बस्तियों का विस्तार 100 धनुषों के बराबर कहा गया है। नगर का विस्तार उससे दुगुना अथवा तिगुना माना गया है— धनुः शतं परीणाहो ग्रामस्य तु समन्ततः ॥ द्विगुणं त्रिगुणं वाऽपि नगरस्य च कल्पयेत् । (अग्नि. 227, 19-20)
- समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है— खेटं तदर्धविष्कम्भामाहुर्ग्रामं तदर्धतः । योजनने पुरात् खेटं खेटाद् ग्रामं प्रचक्षते। गव्यूतिपरिमाणेन ग्रामाद् ग्रामं प्रचक्षते ॥ द्विक्रोशाद् विषये सीमा तदर्धेन पुरस्य सा। खेटके पुरसीमार्थं ग्रामे खेटार्धतः स्मृता ॥ त्रिंशद्धनूंषि विष्कम्भः पुरे दिग्वर्त्मसु स्मृतः । विंशति खेटके मार्गो ग्रामे दश च दर्शितः ॥ (समराङ्गण. 10, 79-82)
सूत्र-७४ 417 वापीकूपतडादिनिर्णयो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥ विश्वकर्मोवाच — पुरस्य बाह्याभ्यन्तरे विविधाः स्युर्जलाशयाः । वापी-कूप-तडागानि कुण्डानि विविधानि च ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि नगर के बाहर और अन्दर की ओर भी विविध प्रकार के जलाशयों की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जैसा कहा है कि जल ही जीवन है अस्तु, वहाँ वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड आदि विविध प्रकार के जलस्रोत बनाएँ।¹ दश₁₀ कूपांश्चतु₄र्वाप्यश्चत्वारि₄ कुण्डकानि च। तडागाः षड्विधाश्चैव₆ कथयाम्यपराजित ॥ 2 ॥ हे अपराजित ! अब मैं तुम्हें दस प्रकार के कूप, चार प्रकार की वापियाँ, चार प्रकार के कुण्डों और छह प्रकार के तड़ागों के बारे में कहता हूँ। दशविध कूपमाह — श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः । चूडामणिश्च दिग्भद्रो जयो नन्दश्च शङ्करः ॥ 3 ॥ चतुर्हस्तादितो वृद्ध्यार्वद्धस्तस्त्रयोदशम् । श्रीमुखाद्याः शङ्करान्ता दश कूपाः प्रकीर्तिताः ॥ 4 ॥ (1.) श्रीमुख, (2.) विजय, (3.) प्रान्त, (4.) दुन्दुभि, (5.) मनोहर, (6.) चूडामणि, (7.) दिग्भद्र, (8.) जय, (9.) नन्द और (10.) शङ्कर— ये चार गज की चौड़ाई से लेकर क्रमशः एक-एक बढ़ते-बढ़ते तेरह गज की चौड़ाई के श्रीमुखादि से शङ्करान्त दस प्रकार के कूपों के लक्षण बताए गए हैं।² चतुर्हस्तः श्रीमुखः स्याद् विजयः पञ्चहस्तकः । षड्भिर्हस्तैर्भवेत् प्रान्तो दुन्दुभिः सप्तहस्तकः ॥ 5 ॥ मनोहरश्चाष्टहस्तश्चूडामणिर्नवकरः । दिग्भद्रो दशहस्तश्च ह्येकादशकरो जयः ॥ 6 ॥
- आदित्यपुराण में आए इसी प्रकार के वचनों को जलाशयतत्त्व में उद्धृत किया गया हैं— सेतुबन्धरता ये च तीर्थशौचरताश्च ये। तडागकूपकर्त्तारो मुच्यन्ते ते तृषाभयात्॥ (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 170) विष्णुधर्मोत्तर में कहा गया है कि जो तडाग, कूप को बनवाता है, कन्यादान करता है, छत्र, उपानह देता है वह व्यक्ति स्वर्ग को जाता है— तडागकूपकर्त्तारस्तथा कन्या प्रदायिनः। छत्रोपानहदातारन्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ (तत्रैवोद्धृत)
- चक्रपाणि मिश्र ने भी कहा है— श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः। चूडामणिश्च भद्रो जयो नन्दश्च शङ्कर॥ आरभ्य यावच्चतुष्करं ते व्यासेक्रमादेकक साभिवृद्ध्या। (विश्ववल्लभ 2, 14-15)
418 अपराजितपृच्छा नन्दे च द्वादशकराः शङ्करे च त्रयोदश। एवमादिगुणोपेतो वृत्तकूपा दशोत्तमाः ॥ 7 ॥ इति दशकूपाः। इनमें से श्रीमुख कूप 4 गज का चौड़ा, विजय कूप 5 गज का चौड़ा, प्रान्त कूप 6 गज का, दुन्दुभि 7 गज का, मनोहर 8 गज का, चूड़ामणि 9 गज का, दिग्भद्र 10 गज, जय 11 गज का, नन्द 12 गज का और शङ्कर 13 गज का होता है। इस प्रकार से दस वृत्त कूपों के आदि से गुणों को बताया गया है।¹ कूपिका सफलमाह – शेषास्तु कूपिका वत्स त्रिहस्ताश्चादिमादधः। द्विहस्ता वै प्रशस्ताश्च कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥ 8 ॥ हे वत्स ! शेष तो छोटी कूपिकाएँ (कुइयाँ) कहलाती है जो 3 गज की चौड़ाई से भी कम की होती जाती हैं। इनमें 3 गज वाली, 2 गज वाली आदि कूपिकाओं में दो गज की चौड़ाई वाली कूपिकाएँ सभी काम में शुभ होती हैं। अस्तु, उन्हें कर्तव्य समझ कर बनाएँ² अथ चतुर्वाप्यः – नन्दा भद्रा जया चैव चतुर्थी विजया तथा। एकवक्त्रा त्रिकूटा च नन्दा नाम वरप्रदा ॥ 9 ॥ चार प्रकार की वापी या बावडियाँ होती हैं— (1.) नन्दा (2.) भद्रा (3.) जया (4.) विजया। इनमें से 'नन्दा' वापी एकमुखी होती है और तीन ओर से कूट अर्थात् बन्द होती है। इस तरह नन्दा नाम की वापी नामानुसार वरप्रदायक है।
- अल्प विस्तार से जहाँ मण्डलाकृति में भूमि को खोदा जाता है और जिस गर्त में पानी मिलता है, वह चाहे पक्का बन्धा हुआ हो या निर्बन्ध हो, 'कूप' कहा जाता है— भूमौ खातोऽल्पविस्तारो गम्भीरो मण्डलाकृतिः। बद्धोऽबद्धः स कूपः स्यात्तदम्भः कौपमुच्यते ॥ (भावप्रकाश) इसी प्रकार राजवल्लभ. में आया है— कूपाः श्रीमुखवैजयोऽपि तदनु प्रान्तस्तथा दुन्दुभिस्तस्मादेव मनोहरश्च परतः प्रोक्तस्तु चूडामणिः। दिग्भद्रो जयनन्दशङ्करमतो वेदादिहस्तैर्मिता विश्रान्तैः क्रमवर्द्धितैश्च कथिता वेदादधः कूपिका॥ (राजवल्लभ : चक्रपाणिमिश्र, 4, 27) विश्वकर्मीय दीपार्णव में कहा गया है— चतुर्हस्ताद्द्विकैका यावत् हस्त त्रयोदश। श्रीमुखो विजय चैव प्रान्तो दुन्दुभि श्रीमनोहरः ॥ चूडामणि दिग्भद्रो जया नन्दस्तु शङ्करः। श्रीमुखो चतुर्हस्ताद्य शङ्करस्य त्रयोदश॥ एव नामा द्विगुणोपेत वृत्तकूपादशोगमा। सङ्ख्याहस्तद्वयं कुर्यात् कूपिका नामतद्भवेत् ॥ (दीपार्णव उत्तर. 18, 2-4)
- गर्त, कूपिका, कुल्या, आलवाल आदि बिना मान के होते हैं—भवन्ति गर्तानि च कूपिकाश्च कुल्यालवालादि विनैव मानम्॥ (विश्ववल्लभ 2, 15)
सूत्र-७४ 419 द्विवक्त्रा च षट्कूटा भद्रा नाम सुशोभिता। त्रिवक्त्रा नवकूटा च जया वै देवदुर्लभा ॥ 10 ॥ दूसरी 'भद्रा' नामक वापी के दो ओर मुख होते हैं अर्थात् उसमें दो ओर से आवागमन होता है, उनके छह ओर से रोक होती है— इस प्रकार भद्रा सुशोभित है।¹ तीन ओर के आवागमन या मार्ग के मुखों वाली तीसरी 'जया' नामक वापी के नौ ओर रोक होती है। यह बड़ी ही उत्तम होती है। देवताओं को भी ऐसी वापी दुर्लभ मानी जाती है। चतुर्वक्त्रा सूर्यकूटा विजया सर्वतोमुखी। वाप्यश्च कथिता वत्स कुण्डानि शृणु सम्प्रति ॥ 11 ॥ इति चतुर्वाप्यः। 'विजया' वापी के चारों और मुख होते हैं अर्थात् आवागमन योग्य सीढ़ियाँ होती हैं जिसके बारह रोक होती है²— ऐसे हे वत्स! मैंने बावड़ियों के बारे में कहा। अब तुम कुण्डों के बारे में सुनो। चतुर्विधकुण्डानि — भद्रकं सुभद्रकं च नन्दाख्यं परिघं तथा। कुण्डानि देवताग्रेषु कार्याणि शान्तिमिच्छता ॥ 12 ॥ (1.) भद्रक, (2.) सुभद्रक, (3.) नन्दाख्य व (4.) परिघ— ये चार प्रकार के कुण्ड होते हैं, शान्ति के इच्छुकों को इनको देवमन्दिरों के आगे बनाना चाहिए।¹ चतुरस्रं भद्रकं स्यात् सुभद्रं भद्रसंयुतम्। नन्दाख्यं प्रतिभद्रेषु परिघं मध्यभिट्टकम् ॥ 13 ॥ भद्रक कुण्ड चौकोर होता है और सुभद्र कुण्ड के चारों ओर दीवारें या भद्र होते हैं। नन्दाख्य कुण्ड के भी प्रतिभद्र होती है और परिघ कुण्ड के मध्य में भिट्ट
- राजवल्लभ में कहा गया है— भद्राख्यकुण्डं चतुरस्रकं च सुभद्रकं भद्रयुतं द्वितीयम्। नन्दाख्यकं स्यात् प्रतिभद्रयुक्तं मध्ये सभिट्टं परिघं चतुर्थम्॥ (राजवल्लभ. 4, 31) दीपार्णव में कहा गया है— कुण्डानां लक्षणं चैव चतुर्विध मुदाहृतः ॥ चतुरश्र भद्रकं नाम सुभद्र भद्रसंयुत। नन्दा क्षौ प्रतिभद्रेषु परिघो मध्यभिट्टोद्भवं ॥ प्रवेशा निर्गमा चैव कर्तव्यास्तेरनेकधाः । (दीपार्णव 18, 7-9)
- राजवल्लभ में कहा गया है—वापी च नन्दैकमुखी त्रिकूटा षट्कूटिका युग्ममुखा च भद्रा। जया त्रिवक्त्रा नवकूटयुक्तास्त्वर्कैस्तु कूटैर्विजया मता सा॥ (वही 4, 28) अपराजित के अनुसार ही दीपार्णव में वापियों के लक्षण व भेद इस प्रकार स्पष्ट किए गए हैं— एक वक्त्रां त्रिकूटाश्चं नन्दा नाम वरप्रदा। द्विवक्त्रा षटकूटाश्च भद्रा नाम सुशोभना॥ त्रिवक्त्रा नवकूटाश्च जयास्तु देवदुर्लभा। चर्तुवक्त्रा द्वादशकूटा विजया सर्वतो मुख ॥ चतुर्वापि भवेत्प्राज्ञ नन्दाद्या शुभलक्षणम् ॥ (दीपार्णव 18, 5-7)
420 अपराजितपृच्छा की रचना होती है। चतुर्द्वाराणि सर्वाणि सगवाक्षाणि मध्यतः। गवाक्षमस्तकान्येवं प्रवेशो वाम-दक्षिणे ॥ 14 ॥ इन कुण्डों के चारों और चार द्वार बने होते हैं और उन द्वार पर गोखड़े बने होते हैं। मध्य की ओर तथा उन गवाक्षों-गोखड़ों के मस्तक की ओर से बायें-दायें प्रवेश मार्ग बने होते हैं। प्रवेशा निर्गमास्तत्र विधातव्या ह्यनेकधा। कर्णे चतुष्किकाः कार्यास्तवङ्गपट्टशालिकाः ॥ 15 ॥ मध्ये भिट्टं तु कर्त्तव्यं माडं च तद्धि श्रीधरम्। इसी प्रकार वहाँ, कुण्ड में प्रवेश और निर्गम अनेक प्रकार के बनाने चाहिए। इनके कोनों पर चौकियाँ भी बनानी चाहिए। ये चौकियाँ तवङ्ग एवं पट्टशालिका से युक्त छतरियों के रूप में बनाएँ जिसमें श्रीधर नामक माड की प्रतिष्ठा करें।¹ तत्रैवार्च्चा निर्देशमाह — तन्मध्ये जलशायी स्याद् वाराहो वा तथोच्यते ॥ 16 ॥ भद्रे चैकादश रुद्राः प्रशस्ता द्वारके तथा। दुर्वासा नारदश्चैव विविधा गणनायकाः ॥ 17 ॥ कुण्ड के मध्य में जलशायी वाराह बनाया जाना चाहिए (अथवा जल तक पहुँचने वाली सीढ़ियाँ हों)। कुण्डों के दीवारों (भद्र) पर और द्वारों पर एकादश रुद्र मूर्तियाँ और महर्षि दुर्वासा, देवर्षि नारद व विविध गण नायक देवताओं की मूर्तियाँ प्रशस्त मानी गई हैं। क्षेत्रपालो भैरवश्च तथा चोमामहेश्वरः। कृष्णशङ्करः कर्तव्या दण्डपाणिर्विशेषतः ॥ 18 ॥ इन मूर्तियों की शृङ्खला में क्षेत्रपाल, भैरव, उमा-महेश्वर, कृष्णशङ्कर और विशेष करके दण्डपाणि यमराज-धर्मराज की भी स्थापना करनी चाहिए। कात्यायनी चण्डिका च भल्लस्वामी च भास्करः। हरिहरपितामहश्चन्द्रादित्यपितामहः ॥ 19 ॥
- राजवल्लभ. में उक्त प्रमाण के साथ ही चारों कोनों में पट्टशाला के निर्माण का निर्देश भी दिया गया है— कराष्टतो हस्तशतं प्रमाणं द्वारैश्चतुर्भिः सहितानि कुर्युः। मध्ये गवाक्षाश्च दिशो विभागे कोणे चतुष्कास्त्वपि पट्टशालाः ॥ (राजवल्लभ. 4, 32)
सूत्र-७४ 421 हरिहरस्वर्णगर्भः पट्टशाला वाराणासी। तदनुक्रमं वक्ष्यामि यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २० ॥ इसी तरह कात्यायनी, चण्डिका, मल्लस्वामी, भास्कर, हरिहर पितामह तथा चन्द्रादित्यपितामह, हरिहर स्वर्णगर्भ, पट्टशाला वाराणसी के बारे में भी मैं तदनुक्रम से कहूँगा जैसा कि परमेश्वर ने पूर्व में कहा है। चतुर्दशेशलिङ्गानि रुद्रांश्चैवकादशैव तु। सर्वे च द्वादशादित्या द्वादशाथ गणाधिपाः ॥ २१ ॥ चौदह ईश अर्थात् महादेव के लिङ्गों को तथा एकादश रुद्रों के लिङ्गों तथा सभी द्वादश आदित्यों और द्वादश गणाधिपों को भी स्थापित करना चाहिए। पञ्चलीला नवदुर्गा लोकपालांश्च पञ्चधा। त्रयोऽग्नयश्च दिक्पाला मातृणां च तथाष्टकम् ॥ २२ ॥ अब्धयश्चैव चत्वारो गङ्गा च सरिदुत्तमा। तन्मध्ये तु प्रकर्तव्या वाराणासी पद्मासने ॥ २३ ॥ इसी प्रकार पञ्चलीलाओं को, नवदुर्गा, पाँच तरह के लोकपालों, तीनों अग्नियों, अष्ट दिक्पालों तथा आठों मातृकाओं, चारों समुद्रों और गङ्गा आदि उत्तम सरिताओं को बनाकर उसके सबके मध्य में वाराणसी को पद्मासन पर विराजमान करना चाहिए।¹ यच्च वाराणासीवासे तत्पुण्यं नित्यदर्शनात्। नित्यमेव स्नानपूजा गङ्गास्नानादिकं फलम् ॥ २४ ॥ वाराणसी (काशी या बनारस) में आवास करने का जैसा पुण्य फल वहाँ नित्य दर्शनों से मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस तरह की देवमूर्तियों के कुण्ड की दीवाल पर स्थापित करके गंगा स्नानोपरान्त पूजन-अर्चन करने से मिलता है। तस्यार्चने भवेन्मोक्षो यथा गङ्गाजलामृतौ। पतन्ति नैव संसारे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥ २५ ॥ उनकी अर्चना से वैसे ही मुक्ति मिलती है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है जैसे कि गङ्गा जल रूपी अमृत से मिलती है। मृतकों और मनुष्य का पुनर्जन्म होकर इस संसार-सागर में जब तक सूर्य-चन्द्रमा-तारागण स्थित हैं, तब तक पतन नहीं होता।
- मण्डन ने देवार्चाओं के सन्दर्भ में यही मत दिया है- गङ्गाद्या रवयो हरेश दशकं रुद्रा दशैकाधिका दुर्गा भैरवमातृका गणपतिर्वह्नेस्त्रिकं चण्डिका। दुर्वासा मुनिनारदस्तु सकला द्वारावतीलीलिका लोकाः पञ्च पितामहादिविबुधाः स्युर्मध्यदेशे सदा॥ (राजवल्लभ. 4, 33)
422 इत्यमनन्तर तीर्थवर्णनं — कृते च नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं तथा। द्वापरे च कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा प्रशस्यते ॥ २६ ॥ अब तीर्थों के बारे में कहता हूँ। सतयुग में नैमिषारण्य की महिमा रही है, त्रेतायुग में पुष्करराज की; द्वापर में कुरुक्षेत्र की महिमा रही और कलियुग में गङ्गा को प्रशस्त तीर्थ माना जाता है। गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते। स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥ २७ ॥ अस्तु, गङ्गाद्वार (गङ्गोत्री), कुशावर्त (द्वारिका), बिल्व, नीलपर्वत (पुरी), कनखल में स्नान करने पर पुनर्जन्म नहीं होता है। गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यतेसर्वपापेभ्यः स्वस्थानेऽपि वसन्नरः ॥ २८ ॥ यहाँ तक कि आदमी कहीं भी स्नान करते हुए भी गङ्गा का नामोच्चारण करता रहे तो गङ्गा से सैकड़ों योजन दूर होने पर भी अपने स्थान पर स्नान करता हुआ समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। या गतिर्योगमुक्तानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। सा गतिः सर्वभूतानामन्तर्वेदिनिवासिनाम् ॥ २९ ॥ जो सद्गति योग से मुक्ति प्राप्त करने वालों को तथा ऊर्ध्वरेतस् मुनियों की होती है, वैसी ही सद्गति अन्तर्वेदी निवासी समस्त प्राणियों की भी होती है। फलं तस्य दशगुणं प्राप्नोति चैव नित्यशः। नरोत्तमः स चाप्नोति नित्यं वाराणसीफलम् ॥ ३० ॥ इस प्रकार से बनाए गए कुण्डों में स्नानोपरान्त पूजा-अर्चना से नित्य उससे दश गुना फल मिलता है उतना ही जितना कोई नरोत्तम नित्य वाराणसी में रहकर गङ्गास्नान का फल प्राप्त करता है। तस्य तुलादिकपुण्यं स्थाने वाराणसी भवेत्। धर्मार्थकाममोक्षांश्च यथेच्छं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥ इति चतुःकुण्डवाराणसी। ऐसे व्यक्ति को वाराणसी में होने वाले पुण्य के तुल्य पुण्य उन्हीं कुण्ड स्थानों में स्नान करने से भी मिल जाता है और मनुष्य यथेच्छ धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष
प्राप्त कर लेता है।¹ अथ सरोवरमाह — सरो महासरश्चैव भद्रकं च तृतीयकम्। चतुर्थं यन्मया प्रोक्तं सुभद्राख्यं तदुच्यते ॥ ३२ ॥ परिघं युग्मपरिघं तडागं षड्विधं स्मृतम्। अब सरोवरों के विषय में कहता हूँ—(1.) सर, (2.) महासर, (3.) भद्रक, (4.) सुभद्राख्य, (5.) परिघ और (6.) युग्मपरिघ— इस तरह तड़ाग छह प्रकार के होते हैं। बकैकस्थलं परिघं युग्मपरिघं तद् द्वितः ॥ ३३ ॥ इसमें से वहाँ एक स्थल पर बकादि पक्षियों के बैठने का स्थल और परिघ यदि दो एक साथ हों तो युग्मपरिघ कहलाते हैं।² अर्धचन्द्रः सरः प्रोक्तं वृत्ताकारं महासरः। भद्रकं चतुरश्रं स्यात् सुभद्रं भद्रसंयुतम् ॥ ३४ ॥ इनमें 'सर' अर्धचन्द्राकार तड़ाग होता है। 'महासर' गोलाकार अथवा वृतीय होता है। 'भद्रक' तड़ाग चौकोर और 'सुभद्र' तड़ाग भद्रयुक्त अर्थात् पाल-दीवार युक्त होता है।
- दीपार्णव में कुण्डों पर माड, देवार्चाओं के सन्दर्भ में यही मत पाठभेद से दिया गया है— मध्यभिट्ट कर्तव्या मण्डपे श्रीधरोत्तमम्। तन्मध्ये तु जलशायी वाराह वाथ उच्यते॥ रुद्रएकादशकार्या द्वारिकायां संयुता। दुर्वासा नारदं चैव विघ्नस्य गणनायकम्॥ क्षेत्रपाल भैरवञ्च उमा महेश्वरं तथा। कृष्णशङ्कर कर्तव्यं दण्डपाणि महेश्वर॥ कात्यायनि चण्डिका च सौम्यादित्य मेव च। हरिहरपितामह चन्द्रार्कश्वपितामह ॥ हरिहरहिरण्यगर्भ पट्टशाला वाराणसि। तस्यानुक्रमं वक्ष्ये यदुक्तं परमेष्ठितम्॥ चतुर्दश लिङ्गानी रुद्रैकादशस्तथा। द्वादशार्क गणनाधिप्यं केशवाश्च द्वादश॥ पञ्चलीला नवदुर्गा लोकपालस्यपञ्चक। तथाग्रिदशदिग्पालो मातृका च तथाष्टकम्॥ द्विविध पतिपातता चैव गङ्गा च सरितोत्तमे। तन्मध्ये च कर्तव्या वाराणसी पद्मशाने॥ बहित्रिभागे कुण्डस्य चतुर्दश व्यवस्थितम्। ब्रह्माविष्णु शिवादीनां विविध सद्यसुन्दरम्॥ वाराणसि ता यत्पुण्यं नित्यं पुण्ये दर्शनात्। नित्य स्नानादिकं पूजा गङ्गास्नानादिकं फलम्॥ तस्यार्चने भवेत् सौरव्यं गङ्गाते मरणं तथा। तपतेविव संसारे यावच्चन्द्रार्क तारकम्॥ कृते च नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं तथा। द्वापरे कुरुक्षेत्रे कलो गङ्गा प्रशस्यते॥ गङ्गाद्वारे कुशावर्त बिल्वके नीलपर्वते। स्नानं कनखले तीर्थे न लमेश पुनर्भव॥ याग तीर्थाग मुक्ताना मुनीनामुर्ध्वरेतसा। सागरति सर्व भूताना मन्त्रवेध निवासिनम्॥ तस्मादशगुण्यं पुण्यं नित्य प्रासाति नित्यस। तस्य तुल्य दिक् पुण्यं कुण्डे वात्र वाराणसि। धर्मार्थकाममोक्षाणां इच्छं प्राप्नोति मानवः ॥ (दीपार्णव 18, 10–25)
- राजवल्लभवास्तुशास्त्र में भी यही वर्णन आया है। वहाँ सुभद्र में पक्षियों के बैठने के स्थान का वर्णन भी किया गया है— सरोऽर्धचन्द्रं च महासरश्च वृत्तं चतुष्कोणकमैव भद्रम्। भद्रैः सुभद्रं परिधैकयुग्मं बकाश्रैकगतेन परिघः ॥ (राजवल्लभ ४. २७)
पालिप्रमाणमाह — दण्डसहस्रकं ज्येष्ठं मध्यमं च तदर्धकम्। मध्यमार्धं कनिष्ठं च त्रिविधं पालिदैर्घ्यतः ॥ ३५ ॥ इनमें भी हजार दण्ड की लम्बाई वाला तड़ाग ज्येष्ठ, पाँच सौ दण्ड वाला मध्यम और ढाई सौ दण्ड प्रमाण वाला तड़ाग पाल की लम्बाई के अनुसार कनिष्ठ माना जाता है— ये तीन भेद हैं। पञ्चाशद्धस्तकैर्ज्येष्ठं मध्यमं च तदर्धकम्। कनिष्ठं द्वादशकरः पालिमानं च विस्तरे ॥ ३६ ॥ तड़ाग के पाल-मान के अनुसार 50 गज की दीर्घता वाली पाल ज्येष्ठ, 25 गज वाली मध्यम और 12 गज वाली कनिष्ठ पाल होती है। वापीकूपतडागानि नैकश उदगाश्रयाः । जलाश्रयं च सम्पाद्य कुर्यात् पुण्यं महोत्सवम् ॥ ३७ ॥ वापी, कूप, तड़ाग इत्यादि अनेकों जलाशय होते हैं। अस्तु, ऐसे कोई भी जलस्रोत का निर्माण कराकर पुण्य महोत्सव मनाना चाहिए। यस्य गोपदमात्रं तु ह्युदकं धारयेन्मही। वर्षषष्टिसहस्राणि शिवलोकं स गच्छति ॥ ३८ ॥ यह एक ध्रुव सत्य है कि जो कोई पुण्यार्थी इस धरती पर गाय के खुर प्रमाण का भी जलाशय बनवाता है, वह व्यक्ति साठ हजार वर्षों तक शिवलोक का निवासी होने का पुण्यफल प्राप्त करता है।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वापीकूपतडादिनिर्णयाधिकारो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वापी कूप तडागादि निर्णय अधिकार नामक चौहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 74 ॥
- भविष्योत्तरपुराण में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर के प्रति जलाश्रयों की महिमा इसी प्रकार कही गई है। जीवन में जलस्रोतों का निर्माण करवाना पुण्यकारक है। तडाग, देवालय, बावड़ी और सघन छायादार वृक्षों के आरोपण से चतुर्थ फल या मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार पुत्र अपने निजी गुणों द्वारा माता का शील स्वभाव प्रकट करता है, उसी प्रकार जल के आस्वादन द्वारा उसके कर्ता का शुभ ज्ञात होता है। अतः शुभ कर्म द्वारा उपार्जित धन तडाग आदि जलाशयों के निर्माण पर खर्च करना उचित ही है— तडाग देवभवनं वापीवृक्षोघनच्छदः ॥ चतुर्थकं फलं प्राप्तं कारितेऽस्मिंश्चतुष्टये। यथा मातुः समाचष्टे पुत्रः शीलं स्वकैर्गुणैः॥ तथा स्वादेन च जलं कर्तुः सर्वं शुभाशुभम्। अतः शुभागतं द्रव्यं तडागादिषु लापयेत् ॥ (भविष्य. उत्तर 127. 71-73)
सू० ... शस्यावतारो नाम पञ्चसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 75 ॥ अथ युगलक्षणं। अपराजित उवाच - कृते पुण्यमयं सर्वं जगदेतत् चराचरम्। पुण्यात्मनः प्रजा राजा सुवृष्ट्या शोभना क्षितिः ॥ 1 ॥ पुण्यं त्रिभागं त्रेतायां द्विभागं द्वापरे तथा। एकभागं कलियुगे मेघाः स्वल्पजलप्रदाः ॥ 2 ॥ सम्प्राप्ते वै कलियुगे पुण्ये च प्रलयं गते। सर्वार्थनाशतो लोका व्याधिदुःखप्रपीडिताः ॥ 3 ॥ अपराजित बोले कि सतयुग में सारा जगत् चराचर पुण्यमय था तथा राजा और प्रजाजन भी पुण्यात्मा थे। अस्तु, सर्वत्र सुवृष्टि होती रहने से पृथ्वी भी बड़ी शोभायमान थी। इसके बाद, त्रेतायुग में पुण्य तीन भाग; द्वापर युग में पुण्य दो भाग तथा कलियुग में केवल एक भाग ही पुण्य रह गया जिससे मेघ उत्तरोत्तर कम वर्षा करते गए और जब वे कलियुग तक आया तब तो पुण्य तो प्रलय ही हो गया और सर्वार्थों का समस्त लोक में विनाश हो गया और लोग व्याधि, दुःख से पीड़ा भोगने लगे। त्वं पिता जगतां नाथ प्रभो विश्वस्य पालक। प्राप्ते कलियुगो घोरः कथं लोकस्तरिष्यति ॥ 4 ॥ हे प्रभु! आप जगत् के परमपिता हैं, कृपया हे प्रभु! विश्व के पालक!! यह बताएँ कि इस घोर कलियुग के प्राप्त होने पर लोग किस तरह उससे तैरकर पार होंगे? विश्वकर्मोवाच - अधर्मस्थं शिवो हन्ति सृष्टिस्थितिप्रणाशकृत्। अधर्मस्य शिवः कालो नित्यं संहारहेतुकः ॥ 5 ॥ विश्वकर्मा बोले कि शिव अधर्म में लगे हुए लोगों का संहार कर-करके सृष्टि की ऐसी स्थिति का नाश कर देंगे क्योंकि अधर्म के लिए तो शिव स्वयं काल- स्वरूप हैं और नित्य उस अधर्म का संहार करने के हेतु लगे हुए हैं। कलियुगे कृतयुगं शिवपादाब्जसेवनात्। अन्नं नराणामाधारो वाहनानां तु पोषणम् ॥ 6 ॥ भगवान् शिव के चरण कमलों की सेवा करने से कलियुग में भी सतयुग जैसी प्राप्ति हो जाती है क्योंकि इस कलियुग में भी अन्न ही मनुष्य मात्र का जीवन आधार है और सभी के पोषण का वाहक है।
426 अपराजितपृच्छा अथात्र प्रशंसामाह — अन्नं तत्र दयाहेतु भोगलिङ्गं महीतले। निग्रहानुग्रहे शक्तः स भवेत् पृथिवीपतिः ॥ 7 ॥ अस्तु, इस महीतल पर जो भी व्यक्ति अन्न का संग्रह करने और उस राशन का अनुग्रहपूर्वक जनता में दया करके भोग कराने में समर्थ होगा, वही यहाँ का पृथ्वीपति अर्थात् राजा के समान माननीय होगा। गृहे वा नगरे ग्रामे आधिपत्यं च दुर्लभम्। किं पुना राज्यलब्धौ तु चाधिपत्यं महीतले ॥ 8 ॥ अरे, इस बात को समझो कि जब व्यक्ति को अपने घर में, नगर में या ग्राम में भी आधिपत्य मिलना दुर्लभ है, तो फिर इस भूमि पर महीतल पर राज्य-शासन पाना और आधिपत्य कर पाना कितना महत्त्वपूर्ण है ! राज्यार्थं धार्यते शस्यं शस्यार्थं तु जलाशयः। भूमिर्भागपरीक्षार्थं सूत्रधारं परीक्षयेत् ॥ 9 ॥ अस्तु, ऐसा राज्याधिकार पाने के लिए सदा अन्न संग्रह करके उस पर अधिकार रखना चाहिए और इस अन्नोत्पादन कार्य को बढ़ाने के लिए जगह-जगह जलाश्रयों की व्यवस्था करनी चाहिए। इन जलाशयों के लिए उपयुक्त भूमि भाग की परीक्षा हेतु सदा सूत्रधार शिल्पी, गजधर या शिल्पशास्त्रों के ज्ञान की सेवा लेना चाहिए कि वह सूत्रधार शास्त्र ज्ञान सम्पन्न हैं भी या नहीं?1 प्रजाहीनो ध्रुवं वत्स राजा दुःखस्य भाजनम्। शेषं भुङ्क्ते महादुःखे विषये स्वेऽपराजित ॥ 10 ॥ इस तरह यह पाया गया कि प्रजा का आधार अन्न है और राजा, जलाशय और अन्न— इन तीनों का आधार सूत्रधार का शिल्पज्ञान है जिससे वह भूमिजल को उपलब्ध कराता है। इसके अभाव में राज्य प्रजाहीन हो जाता है। हे वत्स! यह राजा के लिए भी बड़े दुःख की बात होगी और वहाँ रहने वाले जो शेष जन समुदाय होंगे, वे भी महान् दुःख भोगेंगे।
- काश्यपीयकृषिसूक्ति में आया है कि भूमि की शुभाशुभता की परीक्षा के लिए ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिए जो कि गुणों, लक्षणों के आधार पर उसका वर्गीकरण करने की पर्याप्त दक्षता रखते हों। भूमिविद् चाहे ब्राह्मण हो, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो, उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे भूमिगत जलानुसन्धान की विधियों के ज्ञाता हो और कृषिशास्त्र विशारद भी होने चाहिए— भूपरीक्षाक्रविदो गुणाढ्या नृपचोदिताः ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वापि विशः शूद्रास्तु वा पुनः। दकार्गल प्रमाणज्ञाः कृषिशास्त्रविशारदाः ॥ (काश्यप. 2, 46-47)
सूत्र-७५ 427 लोकमङ्गलमूलमाह — लोको मूलं भूश्च वृक्षश्चाम्भो भूपालरक्षणम्। तेनाक्षयं भवेद्राष्ट्रं प्रजावांस्तु चिन्तामणिः ॥ 11 ॥ हे अपराजित! लोगों के मङ्गल का मूल है— भूमि, वृक्षं, जल, भूपाल और सबका रक्षण। अस्तु, यदि इनमें से किसी का भी क्षय होता है तो राष्ट्र और राष्ट्र की प्रजा के लिए बड़ी चिन्तामणि अर्थात् शोचनीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सारांश यह कि सूत्रधार का जलशोधन का शिल्पशास्त्रीय ज्ञान सबको चिन्तामुक्त कर सकता है। बहुपुण्यप्रभावेण प्रसन्नः साम्प्रतं शिवः। प्रजास्तु पीडिता येन तद्राष्ट्रं गच्छति क्षयम्॥ 12 ॥ यह सब कुछ बहुत पुण्य के प्रभाव से ही सम्भव होता है जिसके कारण शिव तत्काल प्रसन्नता ही समझें। अस्तु, शास्त्रज्ञान से जल की उपलब्धि सर्वोपरि शिव की प्रसन्नता ही समझें। जिस राजा के राज्य में प्रजा को पीड़ा पहुँचती है, उस राष्ट्र का क्षय हो जाता है।¹ अन्यायद्रव्यनिरता न्यायं त्यक्त्वा तु लोभतः। कुलमूलविनाशार्थं राजा हन्ति प्रजां समाम्॥ 13 ॥ जिस राजा के राज्याधिकारी अन्याय से धन कमाने में लगे हों, रिश्वत और भ्रष्टाचार से न्यायमार्ग छोड़कर लोभ में पड़ गए हो, ऐसा बेसुध और अयोग्य शासक राजा अपना, अपने कुल और अपनी तमाम प्रजा के भी नाश का कारण बनता है और स्वयं आत्म हन्ता होता है। वसुधायाः प्रजा मूलं ²धान्यो यस्तां विशेषतः। प्रतिपालयते भूपः सर्वकामफलप्रदः ॥ 14 ॥ इसलिए यह बात सदा अपने ध्यान में रखें कि इस पृथ्वी पर उसका मूल प्रजा ही है और उसमें भी धान्यों की अपनी विशेषता है। प्रजा के जीवनाधार के रूप में और जो राजा अपनी प्रजा का धन-धान्य से पालन करता है, जलाशयों की सुख-
- गोस्वामी तुलसीदास ने भी यही बात कही है- जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥ (रामचरितमानस बालकाण्ड, 70, 6)
- 'धन्यो' इति प्रकाशित पाठः। काश्यप मुनि का मत है कि देवताओं ने पृथ्व्योत्पन्न धान्य, धागे को माङ्गलिक सूत्र कहा है। इस पर होने वाला धान्य एवं शाक जीवनाड़ी अथवा जीवनदायिनी है, वे पृथ्वी पर जीवनतत्त्व का निर्माण करने वाली है— माङ्गल्यसूत्रं च तथा सस्यमाहुर्दिवौकसः। सस्यादिरेव मेदिन्याः जीवनाडी कलात्मिका॥ (काश्यप. 1, 17)
सुविधा का सूत्रधार के शास्त्रज्ञान से प्रबन्ध कराता है, वह सभी कामनाओं को पूरा करने का फल प्राप्त करता है। वसुधा तु ध्रुवं पुष्पं फल राष्ट्रेषु वै प्रजा। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रजा पाल्या महीभृता ॥ 15 ॥ क्योंकि, यह समझ लें कि यह वसुधा तो केवल पुष्प मात्र है, यह ध्रुव सत्य है परन्तु वही पुष्प राष्ट्र की प्रजा के रूप में फल बन जाता है, इसलिए राजा को चाहिए कि वह सारे प्रयत्न करके अपनी प्रजा के न्यायपूर्वक पालन-पोषण में वृद्धि करें। स्वस्थ देशलक्षणं - यत्र देशे प्रजाः स्वस्थाः सदा च धनिनो जनाः। तत्र देशे च कल्याणमिच्छासिद्धिर्भवेन्नृपः ॥ 16 ॥ जिस देश की प्रजा स्वस्थ या तन्दुरुस्त है, वहाँ के सभी उद्योग-धन्धे सुचारू रूप से चलते हैं और प्रजा अपने उद्यम व उद्योग से धनवान होती है। ऐसे ही स्वस्थ और धनवान प्रजा वाले देशों में सदा कल्याण बना रहता है और वहाँ के राजाओं को भी सभी इच्छाओं की सिद्धि मिलती रहती है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था हेमरत्नविभूषिताः। स देशो दुर्लभो वत्स स्वर्गादिभोगदायकः ॥ 17 ॥ हे वत्स ! मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जिस देश की प्रजा स्वस्थ है और इतनी धनवान है किसभी लोग सोने-चाँदी-रत्नों आदि के आभूषणों से सुशोभित हो, ऐसा देश इस धरती पर दुर्लभ है और वह स्वर्ग के समस्त भोगों का अधिकारी है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था उत्तमाधममध्यमाः। सर्वकार्येषु सोत्साहाः स देशो दुर्लभः सुरैः ॥ 18 ॥ जिस देश की प्रजा-उत्तम, मध्यम और अधमादि रूप से स्वस्थ-सानन्द हैं और सब कामों में सोत्साह लगी रहती है, वह देश तो देवताओं को लिए भी दुर्लभ है अर्थात् देवताओं से भी बढ़-चढ़कर सुखी है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था दिव्यवस्त्रविभूषिताः। दिव्यभोगा नष्टरिपुः स देशो देवदुर्लभः ॥ 19 ॥ जिस राज्य अथवा देश की प्रजा स्वस्थ है और दिव्य वस्त्रों को धारण करने वाली सम्पन्नता से युक्त है, जिसको दिव्य भोग प्राप्त हैं और जिसके समस्त शत्रु नष्ट हो चुके है- ऐसा देश देवों को भी दुर्लभ है।
सूत्र-७५ 429 यत्र देशे प्रजाः स्वस्था दिव्यलेपनलेपिताः । सर्वभोगप्रभोग्यश्च स देशो देवदुर्लभः ॥ २० ॥ इसी तरह जिस देश की प्रजा स्वस्थ है और दिव्य लेपन से लेपित है अर्थात् अगरु-चन्दनाचित देह और सभी तरह के भोग भोगने में समर्थ, सम्पन्न हो— वह देश देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, देवता भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। सुभिक्षे तु सदा सौख्यं दुर्भिक्षे तत्कथं भवेत्। यस्य कीर्तिः सुराष्ट्रैश्च नित्यमिच्छन्ति तं नृपम् ॥ २१॥ यह स्मरणीय है कि सुभिक्ष में सदा सुख रहता है और दुर्भिक्ष में वह कैसे हो सकता है ? उसमें तो दुःख ही होता रहेगा। अस्तु, जो राजा अपनी, अपनी प्रजा की और अपने राष्ट्र की सुराष्ट्र के रूप में कीर्ति की नित्य इच्छा रखता है वही वास्तव में नृप कहलाने का अधिकारी है। लोकाः सुभद्रैर्युक्ताश्च गजैश्चाश्वोष्ट्रवाहनैः । ¹( नाना द्रव्यभोक्ताश्च नित्यनन्दप्रमोदितम् ) ॥ २२ ॥ ऐसे राजा के राज्य में रहने वालों में समृद्धि होती है और वे हाथी, घोड़े, ऊँट आदि वाहनों को रखने में सक्षम होते हैं। वे नाना द्रव्यों के भोक्ता और नित्य ही आनन्दित, प्रमुदित रहते हैं। सुभिक्षे² तु प्रजाः स्वस्था राजा तत्र प्रमोदते । प्रजास्वास्थ्ये नृपाः स्वस्था आसमुद्रवसुन्धरम् ॥ २३ ॥ सुकाल होने पर प्रजा स्वस्थ रहती है और प्रजा के स्वस्थ रहने से राजा भी प्रमुदित रहता है। प्रजा के स्वास्थ्य से नृप भी स्वस्थ रहते हैं और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी भी प्रमुदित रहती है। दुर्भिक्षे क्षीयते धर्मो धन-धान्यक्षयो भवेत्। प्रजाराजक्षयश्चैव दुर्भिक्षा द्रक्षति प्रभुः ॥ २४ ॥ इसके विपरीत, जिस राष्ट्र में दुर्भिक्ष, अकाल पड़ जाता है, वहाँ के निवासियों के धर्म, आचार, विचार, धन-धान्य आदि सब क्षय को प्राप्त होते हुए नष्टभूत हो जाते हैं, दुर्भिक्ष से प्रजा व राजा और राजा की प्रभुता भी क्षय को प्राप्त हो जाती है। प्रजां पोषयते राजा राजानं पोषयेत् प्रजा । अन्योन्यपोषणान्नित्यं राष्ट्रं नन्दति तच्चिरम् ॥ २५ ॥
- प्रकाशित पाठे नोपलभ्यते।
- 'दुर्भिक्षे' इति प्रकाशित पाठः । (इस पाठ को स्वीकृत करने पर विपरीतार्थ होगा और व्यंग्योक्ति होगी) ।
430 अपराजितपृच्छा यह एक शाश्वत नियम समझें कि जो राजा अपनी प्रजा का पोषण करते हैं, प्रजा की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं, उन राजाओं का प्रजा भी पोषण करती हैं और उन राजाओं का नित्य बल बढ़ाने में तत्पर रहती है। इस तरह से दोनों एक दूसरे का पोषण करते हुए चिरकाल तक अपने राष्ट्र को आनन्दित और सुखी रखते हैं।¹ प्रजाहानौ ध्रुवं वत्स राजा स्याद् दुःखभाजनम्। सर्वाङ्गं क्षीयते राष्ट्रं जीवन्तोऽपि मृता नृपाः ॥ २६ ॥ हे वत्स! यह भी ध्रुव सत्य समझ लो कि प्रजा को हानि पहुँचाने वाला राजा भी दुःख का भाजन हो जाता है और ऐसे राजा के सभी विभागों व क्षेत्रों में अव्यवस्था हो जाने से क्षय होने लगता है। इसके चलते ऐसे राजा जीवित होते हुए भी मरे के समान हो जाते हैं। स्वामी तु निर्दयः कालो दुर्भिक्षं चैव रौरवम्। अल्पोदकाश्च मेघाश्च अल्पशस्या च मेदिनी ॥ २७ ॥ जिस राज्य, देश, राष्ट्र का स्वामी निर्दयी होता है, वहाँ सदा काल पड़ता रहता है और यह दुर्भिक्ष भी रौरव नरक के समान दुःखदायी हो जाता हैं, वहाँ वर्षा के मेघों में पानी भी कम होता है जिससे धरती भी खेती की धन-धान्य की उपज की कमी वाली हो जाती है। अपराजित उवाच — यदा मेघा न वर्षन्ति काले वा फल्गुवर्षणम्। अनावृष्टौ स्वल्पवृष्टौ कथं लोका भवन्ति ते ॥ २८ ॥ कथं प्रवर्तते राष्ट्रं सुखिनश्च नृपाः कथम्। कथं च धान्यनिष्पत्तिर्धनादिसुखिनो जनाः ॥ २९ ॥ यह सुनकर अपराजित बोले कि यदि समयोचित वर्षा न हो निस्सार वर्षा हो, अवृष्टि और अनावृष्टि हो अथवा स्वल्प वृष्टि हो तब वहाँ के लोग कैसे रहते हैं? वहाँ सुख कैसे हो? लोग सुखी कैसे हों और राजा भी सुखी कैसे हो? वहाँ धन- धान्य की निष्पत्ति कैसे हो— ताकि वहाँ के लोग धनादि से सुखी हो सके।
- विश्वकर्मीयचित्रलक्षण में आया है कि अधर्मपूर्वक शासन सञ्चालित होने वाले देश में अकाल मौतें होती हैं। जहाँ पर राजा धर्मपूर्वक शासन करता है, उसके राज्य में कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है— तव शासनकालेऽस्मिन् देशेऽकालमृतिर्यतः ॥ ततोऽधर्मेण राज्यं तं शाससीदं नृप निश्चितम्। विस्मयो य इतः पूर्वं न जातोऽसौ प्रवर्तते ॥ (चित्रलक्षणम् : नग्नजित्, सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा संस्कृत सीरिज, वाराणसी, 2007 ई. प्रथम परिच्छेद 20-21)
सूत्र-७५ 431 शस्यहानौ कुतो लोकाः कुतो राष्ट्रं सराजकम्। कुतः प्रवर्तते सृष्टिर्विश्वेश कथयस्व मे ॥ ३०॥ हे विश्वेश ! अब यह सब मुझे कहने की कृपा करें कि शस्य की हानि होने पर भी लोक और राष्ट्र कैसे सराजक अर्थात् प्रसन्न रह सके ?¹ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महागुह्यं त्वत्पृष्टमपराजित। वक्ष्यामि दुस्तरे काले तारणं समुदाहृतम् ॥ ३१॥ अपराजित के प्रश्न पर विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स सुनो ! तुम्हारा पूछा गया यह प्रश्न महान गुह्य (गोपनीय या अति कठिन) है तथापि दुर्भिक्ष जैसे दुस्तर काल में भी तारण का उपाय ठीक-ठीक तरह से कहता हूँ।² दुर्भिक्षनिवारणोपाय — यच्छस्यानि प्ररोहन्ति स्वल्पवृष्टौ च पुत्रक। दुर्भिक्षं न भवेत्तत्र यदुपायेऽपराजित ॥ ३२॥ हे पुत्र अपराजित ! स्वल्प वृष्टि अथवा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यदि ऐसे शस्य,
- अपराजित का यह प्रश्न मरुभूमि-जाङ्गल प्रदेश की ओर सङ्केत है जहाँ 12-12 वर्ष तक वर्षा नहीं होती आई है। इस प्रदेश की यह विषमता भी है कि लगातार तीसरे वर्ष लघु अकाल और बारह-बारह वर्ष पर महादुर्भिक्ष होता आया है। इस क्षेत्र में जल का सदा ही अभाव रहा है। भुवनदेव ने निश्चय ही अकालजन्य त्रासदियों को देखा है। मौर्य साम्राज्य ने भी बारह वर्ष तक अकाल का सामना किया था। इस ग्रंथ के रचनाकाल के आसपास ही देशभर में जलाशयों की विशेष आवश्यकता समझी गई थी। जगडूचरितम् में इस काल के अकाल का वर्णन है। मालवा, मेवाड़ और गुजरात में 12-13वीं सदी में अनेक जलाशय और बाँध बने और गाँव-गाँव बाँधों को बाँधने की प्रवृत्ति का विकास भी हुआ। मेवाड़ में शासक विस्तृत बाँधों का निर्माण करके अपने नाम के आगे भी समुद्र के पर्याय के रूप में 'रांण' (राणा) या 'महाराणा' जैसे उपाधियाँ धारण करने वाले हुए।
- चाणक्य का मत है कि दुर्भिक्ष जैसी आपातिक घटनाओं का सामना करने के लिए राजा सर्वप्रथम प्रजा के लिए बीज व खाद्य सामग्री (भक्त) का प्रबन्ध करता। इसके अतिरिक्त वह दुर्ग, सेतु के निर्माणादि से प्रजा को जीविकोपार्जन के साधन प्रदान करता। यदि ऐसा भी सम्भव नहीं होता तो अकाल राहत के रूप में प्रजा को खाद्य सामग्री देता (भक्त-संविभागम्) या कुछ समय के लिए अकाल पीड़ितों को किसी अन्य प्रदेश में भेज सकता है (देशनिक्षेपं वा) अथवा वह अपने किसी मित्र राज्य से सहायता ले सकता है या वह जनसंख्या के व्यवसायहीन लोगों को विदेश भेजकर (निरुपयोग जनानां तत्काले देशान्तर प्रेषणेन अल्पत्व करणम्), जनसंख्या को घटा (कर्षण) कर सकता है या बहुत बड़ी संख्या में अपनी प्रजा को किसी दूसरे समृद्ध देश में भेजने का प्रबन्ध कर सकता है या फिर वह समुद्र के तटवर्ती प्रदेश या किसी ऐसे देश की मदद ले सकता है जहाँ जलाशय हो ताकि वहाँ लोगों को मत्स्यादि आखेट कर उदरपूर्ति का आश्रय मिल सके। (अर्थशास्त्र अधि. 4, 3 तथा राधाकुमुद मुखर्जी : चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल, पृष्ठ 100-101)
432 अपराजितपृच्छा धान्यादि की बुवाई करें जो कि अल्पवृष्टि में भी अङ्कुरित होकर बढ़ सके तो इस उपाय से वहाँ दुर्भिक्ष कभी भी नहीं पड़ सकता है। उत्पद्यते यतः शस्यं नराणां जलसङ्ग्रहात्। जलाशये बन्धिते च क्षिप्रं शस्यं प्ररोहति ॥ ३३ ॥ इसके साथ ही जिन प्रदेशों के लोग खेती के लिए जहाँ कहीं भी जल संग्रह करने में सजग और तत्पर रहेंगे वहाँ भी धान्यों के उपजने में सुविधा होगी क्योंकि जलाशयों के बाँधने से धान्य जल्दी-जल्दी अङ्कुरित होकर वृद्धि को प्राप्त होते हैं। केचिन्महानदीतीरे केचिच्च सरिदाश्रये। केचित्कूपोदके वत्स अष्टाष्टौ शस्यसम्भवाः ॥ ३४ ॥ हे वत्स! सजग रहकर यदि श्रमपूर्वक कतिपय महानदियों या अन्य नदियों के किनारों पर और कुओं के जल से खेती की जाए तो आठ-आठ, कुल सोलहों प्रकार के धान्यों¹ की खेती करना सम्भव हो सकता है। नगरे च पुरे ग्रामे खेटे कूटे च कर्वटे। वापी-कूप-तडागानां नदीनां बन्धनादिकम् ॥ ३५ ॥ अतएव इस बात को गाँठ बाँध लो कि नगरों में, पुरों में, खेट, कूट और कर्वट में जहाँ भी अवसर मिले वहाँ वापी, कूप, तड़ागों की और नदियों पर बाँध बनाने और जल संरक्षण के लिए सदा तत्परता दिखाएँ।² अरहट्टप्रवाहाणां सारणीनां तथैव च। सञ्चये सर्वशस्यानि जलं वै भूमिसंस्थितम् ॥ ३६ ॥
- पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में विविध धान्यों के नाम आए हैं— श्याम-माष-मसूरश्च धान्य-कोद्रव- सर्षपाः। मुष्टको राजमाषश्च तुमुरो जुमरस्तथा॥ यव-गोधूम-मुद्गाश्च तिलक-ङ्गु-कुलुत्थकाः। गवेधुकाश्च नीवारा आतकश्च कलायकाः॥ माण्डुको वज्रकोरङ्क कीचको वडकतथा। तिलकाश्चणकाद्याश्च धान्यानि कथितानि वै॥ (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 792) इसी प्रकार विष्णुपुराण में आया है कि व्रीहि (धान), यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), अणव (छोटे धान्य), तिल, प्रियङ्गु (काँगणी), उदार (ज्वार), कोरदूष (कोदो), सतीनक (उनालू ग्वार या छोटी मटर), माष (उड़द), मुद्ग (मूँग), मसूर, निष्पाव (बड़ी मटर), कुलुत्थ (कुलथ), आढक्य (अरहर), चणक (चना) और सन (सण)— ये सत्रह प्रकार की ग्राम्य ओषधिवर्ग में हैं जिनमें से सन को छोड़कर सब खाद्याहार है। (विष्णु. 1, 6, 20-
- विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी आया है—उदकेन विना वृत्तिर्नास्ति लोकद्वये सदा। तस्माज्जलाशयाः कार्याः पुरुषेण विपश्चिता॥ अग्निष्टोमसभः कूपः सोऽश्वमेधसमो मरौ। कूपः प्रवृत्तपानीयः सर्वं हरति दुष्कृतम्॥ कूपकृत्स्वर्गमासाद्य सर्वान्भोगानुपानुते। तत्रापि भोगनैपुण्यं स्थानाभ्यासात्प्रकीर्तितम्॥ (विष्णुधर्मोत्तर. 3, 296, 5-7)
सूत्र-७५ 433 इसी प्रकार वहाँ रहट, प्रवाहमार्ग- नाली-धोरे, कुल्या-नहर आदि की व्यवस्था होनी चाहिए¹ ताकि भूमिस्थ जल का सञ्चय हो और वह समस्त प्रकार के धान्यों की निष्पत्ति के निमित्त सिंचाई के कार्य आ सके। पातालोद्भवा मेघाश्च घटिका ²मोघधारिणः । सेतुबन्धभवा नद्याः शस्योभयतटोद्भवाः ॥ 37 ॥ समझ लो कि भूमिगत जल को (दकार्गल³ विद्या से) प्राप्त करके एक तरह से हम पातालों में उत्पन्न हुए बादलों से जल प्राप्त करते हैं। वह जल रहट के विज्ञान से अर्थात् रहट की माल के घड़ों में ही बादलों को धारण करके लाने के समान है। इसी तरह नदियों पर भी स्थान-स्थान पर सेतु बाँधकर दोनों तटों की भूमि में भी खेती की जा सकती है।
- मौर्यकाल में नदीपाल नामक अधिकारी की नियुक्ति का विधान किया गया है। चाणक्य ने सीताध्यक्ष के लिए नदी, झील, जलाशय व कूहों के जलद्वारों के नियमन द्वारा पानी के उचित वितरण की व्यवस्था का निर्देश किया है— उद्घाटं उद्घाट्यते निस्सार्यते जल अननति उद्घाटो अरघट्टकादियन्त्रम् ॥ (अर्थशास्त्र अधि. 3, 9) काश्यपीयकृषिसूक्ति में आया है कि जलाशयों, जलस्रोतों के अभाव में पेयजल का प्रबन्ध नहीं होगा, जल के अभाव में न तो सांध्यकर्म होगा न ही स्नान हो सकता है फिर भला पौधों की वृद्धि कैसे हो सकती है ? इसी कारण मुनियों ने कहा है कि पानी के अभाव में सुख नहीं होता, यह निश्चित है अतः प्रजारक्षा का सङ्कल्प करने वाले शासक को चाहिए कि वह सर्व प्रयत्न पूर्वक जलस्रोतों का भी विकास करें। पुनः कहा गया है कि शासक को चाहिए कि वह ग्राम, देश के वनखण्ड में गम्भीर, वृहदाकार जलाशयों का निर्माण करवाएँ। जलाशयों से नहरों को भी निकाला जाए जो बहुत मजबूत बनी हो और हमेशा उनमें पानी का प्रवाह बना रहे। बड़ी नहरों से जुड़ी अनेक शाखाओं या वितरिकाओं का विस्तार भी किया जाना चाहिए जो अन्तःसम्बद्ध हो। इनका और जलाशयों का निर्माण बहुत मजबूत करवाना चाहिए— जलाशयविहीने तु सुखं नैवोपजायते। न सान्ध्यकर्म न स्नानं वृक्षाणामपि वर्द्धनम् ॥ न स्यादित्येव मुनिभिः सौख्यं त्विति विनिश्चितम्। अतः सर्वप्रयत्नेन भूपालो रक्षणव्रती ॥ ग्रामेष्वपि च देशेषु वनमध्ये तु वा पुनः। स्थापयित्वा तु गम्भीरं जलाशयममन्दितः ॥ कुल्यां दृढतरां नित्यं सुलभोदकनिः स्रवाम्। नानाशाखासमाक्रांतां महाकुल्यायुतां तथा ॥ जलाशयेन सहितां स्थापयेत् बहुशोटढाम्। (काश्यपीय. 3, 107-110 तुलनीय कृषिपाराशर 196-97)
- मेघ धारिणः स्यात्।
- दकार्गल विद्या एक प्रकार से भूमिगत पानी के ज्ञान की कुञ्जी मानी जाती है। वराहमिहिर के मतानुसार सारस्वत मुनि ने इस विद्या का सूत्रपात किया। बाद में मनु, बलदेव, काश्यप आदि ने इसे लिखा। वराह ने इसे बृहत्संहिता में आर्यादि विविध छन्दों में निरूपित किया— धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलोपलब्धिः। पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥ एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं नभोस्तो वसुधाविशेषात्। नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परीक्ष्यं क्षितितुल्यमेव ॥ (बृहत्संहिता 54, 1-2) इसके बाद सुरपाल ने वृक्षायुर्वेद में उद्धृत किया और 1577 ई. में चक्रपाणि मिश्र ने इसको पुनः नए अनुभवों के साथ भी लिखा। (विशेष द्रष्टव्य— डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' सम्पादित वृक्षायुर्वेद और विश्ववल्लभ-वृक्षायुर्वेद)
434 अपराजितपृच्छा अजलाश्र्व जलाकीर्णा अवृष्ट्याैकार्णवीकृता । धर्मस्त्राता च दुर्भिक्षे धर्मराजो महोत्सवः ॥ ३८ ॥ उक्त सभी उपायों से जहाँ की भूमि में जल का अभाव देखा गया हो, वहाँ की भूमि जलाकीर्ण अर्थात् जल से लबालब तालाबों वाली हो जाएगी और अवृष्टि होने पर भी चारों ओर सागरों से भरी-पूरी सी होगी क्योंकि दुर्भिक्ष में यही ज्ञान धर्मत्राता बनकर आता है। अस्तु, इस धर्मराज के महोत्सव अर्थात् जल संग्रह के श्रमदान- अनुष्ठान को महोत्सव की तरह मनाकर जल सञ्चय से सुखी होना चाहिए। सम्प्राप्तो धर्मराजत्वं वरुणस्त्रिदशैः सह। तं देशं स्वर्गमाख्याति चेन्द्रतुल्यस्य भूपतेः ॥ ३९ ॥ इस प्रकार के श्रमदान या धर्म की साधना से धर्मराजत्व की सम्प्राप्ति होती है और वरुण देवता के साथ अन्य देवताओं की कृपा से वह देश स्वर्ग कहलाने लगता है और वहाँ ऐसे जल सञ्चय और संरक्षण करने के उद्योग में लगे रहने वाला राजा भी इन्द्र के समान आदरणीय और सुखी रहता है। रसो रसायनं ज्ञानं धनधान्यादिसम्भवः । सर्वं प्राप्तं फलं तेन येन वै सञ्चितं जलम् ॥ ४० ॥ सभी प्रकार के रसों और रसायनों का ज्ञान भी धन-धान्य सम्भव होने पर ही होता है। अस्तु, जिसने जल सञ्चयन का विज्ञान प्राप्त कर लिया, उसने सभी फलों को प्राप्त कर लिया— ऐसा समझें। स्वर्णपुष्पफलैर्युक्तो नित्यं स त्वपराजित । नृपेण सूत्रधारेण महीशस्यादिभूषिता ॥ ४१ ॥ हे अपराजित ! यह समझ लो कि ऐसे उद्योगों के कर्ता और समझदार राजा ने सूत्रधार के ज्ञान की सहायता से इस भूमि को धन-धान्य से भूषित करके मानों स्वर्ण-पुष्प-फलों की खेती-बाड़ी का अनुष्ठान कर लिया है।¹
- जिस देश की माटी सोना उगले और जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ गीत-गुञ्जार करे— ऐसा खुशहाल देश हो, इसी प्रकार के जल सञ्चय और जल संग्रहण के अनुष्ठान से छोटे-छोटे चेकडेम, एनीकट के प्रयोग जैसे कार्य आज अति आवश्यक है। अपराजित शिल्पशासन ने लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व ऐसे उपाय बताए हैं। इन निर्देशों का मेवाड़ के राजाओं ने सर्वाधिक पालन किया। इस ग्रन्थ के रचनाकाल के आसपास ही, 1265 ई. में घाघसा (चित्तौड़गढ़) गाँव में वापी का निर्माण हुआ था। यहाँ से कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा संवत् 1322 की प्रशस्ति मिली है जिसमें अपराजित के वंशज जैत्रसिंह द्वारा गुजरात के तुरुष्कों व शाकम्भरी के शासकों को पराजित करने का वर्णन है। इसकी रचना आचार्य रत्नप्रभ ने की जो आचार्य भुवनदेव सिंहसूरी का शिष्य था। इस प्रशस्ति के ठीक तीन साल पहले