अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 467, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें422 इत्यमनन्तर तीर्थवर्णनं — कृते च नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं तथा। द्वापरे च कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा प्रशस्यते ॥ २६ ॥ अब तीर्थों के बारे में कहता हूँ। सतयुग में नैमिषारण्य की महिमा रही है, त्रेतायुग में पुष्करराज की; द्वापर में कुरुक्षेत्र की महिमा रही और कलियुग में गङ्गा को प्रशस्त तीर्थ माना जाता है। गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते। स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥ २७ ॥ अस्तु, गङ्गाद्वार (गङ्गोत्री), कुशावर्त (द्वारिका), बिल्व, नीलपर्वत (पुरी), कनखल में स्नान करने पर पुनर्जन्म नहीं होता है। गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यतेसर्वपापेभ्यः स्वस्थानेऽपि वसन्नरः ॥ २८ ॥ यहाँ तक कि आदमी कहीं भी स्नान करते हुए भी गङ्गा का नामोच्चारण करता रहे तो गङ्गा से सैकड़ों योजन दूर होने पर भी अपने स्थान पर स्नान करता हुआ समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। या गतिर्योगमुक्तानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। सा गतिः सर्वभूतानामन्तर्वेदिनिवासिनाम् ॥ २९ ॥ जो सद्गति योग से मुक्ति प्राप्त करने वालों को तथा ऊर्ध्वरेतस् मुनियों की होती है, वैसी ही सद्गति अन्तर्वेदी निवासी समस्त प्राणियों की भी होती है। फलं तस्य दशगुणं प्राप्नोति चैव नित्यशः। नरोत्तमः स चाप्नोति नित्यं वाराणसीफलम् ॥ ३० ॥ इस प्रकार से बनाए गए कुण्डों में स्नानोपरान्त पूजा-अर्चना से नित्य उससे दश गुना फल मिलता है उतना ही जितना कोई नरोत्तम नित्य वाराणसी में रहकर गङ्गास्नान का फल प्राप्त करता है। तस्य तुलादिकपुण्यं स्थाने वाराणसी भवेत्। धर्मार्थकाममोक्षांश्च यथेच्छं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥ इति चतुःकुण्डवाराणसी। ऐसे व्यक्ति को वाराणसी में होने वाले पुण्य के तुल्य पुण्य उन्हीं कुण्ड स्थानों में स्नान करने से भी मिल जाता है और मनुष्य यथेच्छ धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष