अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७४ 421 हरिहरस्वर्णगर्भः पट्टशाला वाराणासी। तदनुक्रमं वक्ष्यामि यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २० ॥ इसी तरह कात्यायनी, चण्डिका, मल्लस्वामी, भास्कर, हरिहर पितामह तथा चन्द्रादित्यपितामह, हरिहर स्वर्णगर्भ, पट्टशाला वाराणसी के बारे में भी मैं तदनुक्रम से कहूँगा जैसा कि परमेश्वर ने पूर्व में कहा है। चतुर्दशेशलिङ्गानि रुद्रांश्चैवकादशैव तु। सर्वे च द्वादशादित्या द्वादशाथ गणाधिपाः ॥ २१ ॥ चौदह ईश अर्थात् महादेव के लिङ्गों को तथा एकादश रुद्रों के लिङ्गों तथा सभी द्वादश आदित्यों और द्वादश गणाधिपों को भी स्थापित करना चाहिए। पञ्चलीला नवदुर्गा लोकपालांश्च पञ्चधा। त्रयोऽग्नयश्च दिक्पाला मातृणां च तथाष्टकम् ॥ २२ ॥ अब्धयश्चैव चत्वारो गङ्गा च सरिदुत्तमा। तन्मध्ये तु प्रकर्तव्या वाराणासी पद्मासने ॥ २३ ॥ इसी प्रकार पञ्चलीलाओं को, नवदुर्गा, पाँच तरह के लोकपालों, तीनों अग्नियों, अष्ट दिक्पालों तथा आठों मातृकाओं, चारों समुद्रों और गङ्गा आदि उत्तम सरिताओं को बनाकर उसके सबके मध्य में वाराणसी को पद्मासन पर विराजमान करना चाहिए।¹ यच्च वाराणासीवासे तत्पुण्यं नित्यदर्शनात्। नित्यमेव स्नानपूजा गङ्गास्नानादिकं फलम् ॥ २४ ॥ वाराणसी (काशी या बनारस) में आवास करने का जैसा पुण्य फल वहाँ नित्य दर्शनों से मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस तरह की देवमूर्तियों के कुण्ड की दीवाल पर स्थापित करके गंगा स्नानोपरान्त पूजन-अर्चन करने से मिलता है। तस्यार्चने भवेन्मोक्षो यथा गङ्गाजलामृतौ। पतन्ति नैव संसारे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥ २५ ॥ उनकी अर्चना से वैसे ही मुक्ति मिलती है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है जैसे कि गङ्गा जल रूपी अमृत से मिलती है। मृतकों और मनुष्य का पुनर्जन्म होकर इस संसार-सागर में जब तक सूर्य-चन्द्रमा-तारागण स्थित हैं, तब तक पतन नहीं होता।
- मण्डन ने देवार्चाओं के सन्दर्भ में यही मत दिया है- गङ्गाद्या रवयो हरेश दशकं रुद्रा दशैकाधिका दुर्गा भैरवमातृका गणपतिर्वह्नेस्त्रिकं चण्डिका। दुर्वासा मुनिनारदस्तु सकला द्वारावतीलीलिका लोकाः पञ्च पितामहादिविबुधाः स्युर्मध्यदेशे सदा॥ (राजवल्लभ. 4, 33)