भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 535 में से

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पृष्ठ 465

420 अपराजितपृच्छा की रचना होती है। चतुर्द्वाराणि सर्वाणि सगवाक्षाणि मध्यतः। गवाक्षमस्तकान्येवं प्रवेशो वाम-दक्षिणे ॥ 14 ॥ इन कुण्डों के चारों और चार द्वार बने होते हैं और उन द्वार पर गोखड़े बने होते हैं। मध्य की ओर तथा उन गवाक्षों-गोखड़ों के मस्तक की ओर से बायें-दायें प्रवेश मार्ग बने होते हैं। प्रवेशा निर्गमास्तत्र विधातव्या ह्यनेकधा। कर्णे चतुष्किकाः कार्यास्तवङ्गपट्टशालिकाः ॥ 15 ॥ मध्ये भिट्टं तु कर्त्तव्यं माडं च तद्धि श्रीधरम्। इसी प्रकार वहाँ, कुण्ड में प्रवेश और निर्गम अनेक प्रकार के बनाने चाहिए। इनके कोनों पर चौकियाँ भी बनानी चाहिए। ये चौकियाँ तवङ्ग एवं पट्टशालिका से युक्त छतरियों के रूप में बनाएँ जिसमें श्रीधर नामक माड की प्रतिष्ठा करें।¹ तत्रैवार्च्चा निर्देशमाह — तन्मध्ये जलशायी स्याद् वाराहो वा तथोच्यते ॥ 16 ॥ भद्रे चैकादश रुद्राः प्रशस्ता द्वारके तथा। दुर्वासा नारदश्चैव विविधा गणनायकाः ॥ 17 ॥ कुण्ड के मध्य में जलशायी वाराह बनाया जाना चाहिए (अथवा जल तक पहुँचने वाली सीढ़ियाँ हों)। कुण्डों के दीवारों (भद्र) पर और द्वारों पर एकादश रुद्र मूर्तियाँ और महर्षि दुर्वासा, देवर्षि नारद व विविध गण नायक देवताओं की मूर्तियाँ प्रशस्त मानी गई हैं। क्षेत्रपालो भैरवश्च तथा चोमामहेश्वरः। कृष्णशङ्करः कर्तव्या दण्डपाणिर्विशेषतः ॥ 18 ॥ इन मूर्तियों की शृङ्खला में क्षेत्रपाल, भैरव, उमा-महेश्वर, कृष्णशङ्कर और विशेष करके दण्डपाणि यमराज-धर्मराज की भी स्थापना करनी चाहिए। कात्यायनी चण्डिका च भल्लस्वामी च भास्करः। हरिहरपितामहश्चन्द्रादित्यपितामहः ॥ 19 ॥

  1. राजवल्लभ. में उक्त प्रमाण के साथ ही चारों कोनों में पट्टशाला के निर्माण का निर्देश भी दिया गया है— कराष्टतो हस्तशतं प्रमाणं द्वारैश्चतुर्भिः सहितानि कुर्युः। मध्ये गवाक्षाश्च दिशो विभागे कोणे चतुष्कास्त्वपि पट्टशालाः ॥ (राजवल्लभ. 4, 32)