भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७२ 409 बनाने-बेचने वालों की बस्तियाँ व वायव्य कोण में बुनकर-जुलाहों-सालवियों की बस्तियाँ बसानी चाहिए। पुरसुरक्षार्थे प्राकारोपरि यन्त्रनिवेशनं — पुरमध्ये च सर्वत्र प्राकारस्य तथोपरि। स्थापयेत्सूत्रयन्त्रं च विविधं कर्मरौद्रकम् ॥ 49 ॥ यन्त्राणि चित्ररूपाणि विश्वकर्मेरितानि च। अब नगर की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कहता हूँ। नगर के मध्य में तथा परकोटे के ऊपर भी सर्वत्र तरह-तरह के भयानक, रुद्र कर्म करने में समर्थ सूत्र यन्त्र अर्थात् गोफण अथवा यन्त्रों के सूत्र में रखना अर्थात् परकोटे आदि पर क्रमबद्ध रखना चाहिए। तरह-तरह के विचित्र रूप के यन्त्र विश्वकर्मा ने बनाए हैं।¹ नाना यन्त्रनामानि — तेषां नामानुक्रमं च कथये तव साम्प्रतम् ॥ 50 ॥ प्रथमं भैरवं यन्त्रं द्वितीय चैव भास्करम्। गौरीयन्त्रं चतुर्थस्यात्तृतीयं महिषासुरम् ॥ 51 ॥ वाराहं पञ्चमं चैव महायन्त्रं च षष्ठकम्। अब मैं उन यन्त्रों के नामों को अनुक्रम से कहता हूँ। जो परकोटे पर नगर सुरक्षा में बड़े महत्व के हैं इनमें प्रथम है भैरव यन्त्र, द्वितीय भास्कर यन्त्र, तृतीय महिषासुर यन्त्र, चतुर्थ गौरी यन्त्र, पञ्चम वाराह यन्त्र और षष्ठ महा यन्त्र है।²

  1. मत्स्यपुराण में कहा गया है— यन्त्रायुधादृाट्टालचयोपपन्नं समग्रधान्यौषधिसम्प्रयुक्तम्। वणिग्जनैश्चावृतमावसेत दुर्गे सुषुप्तं नृपतिः सदैव॥ (मत्स्य. 217, 87) तुलनीय— दुर्गे च यन्त्राः कर्तव्या नाना प्रहरणाान्विताः। सहस्रघातिनो राम तैस्तु रक्षा विधीयते॥ (विष्णुधर्मोत्तर 2, 26, 27) राजवल्लभ. में कहा गया है— यन्त्राः पुराणामथ रक्षणाय संग्रामवक्त्र्यम्बुसमीरणाख्याः। विनिर्मितास्ते जयदा नृपाणां भवन्ति पूज्याः सुरया च मांसैः॥ (राजवल्लभ. 4, 21) पूर्वकाल में विश्वकर्मा के बनाए यन्त्रों का वर्णन वास्तुमण्डनम् में आया है। प्राचीनकाल में जबकि देवताओं और असुरों के बीच सङ्ग्राम हुआ, देवताओं के विजय के लिए शङ्कर ने जिन यन्त्रों का प्रयोग किया, वे विश्वकर्मा ने बनाए थे। रक्तबिन्दु ने जब पाषाण यन्त्रों से देवसेना को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया तब देवताओं ने उक्त शिवोक्त विश्वकर्मणीय यन्त्रों का प्रयोगकर दैत्यों पर विजय को प्राप्त किया था। ये यन्त्र चौरासी प्रकार के हैं। इनमें से वायव्य और जलयन्त्रों के नौ-नौ भेद हैं। अग्नियन्त्र के छह भेद है जबकि संग्राम यन्त्र के साठ भेद, इस प्रकार कुल चौरासी प्रकार के यन्त्र कहे गए हैं— देवासुरेणे दैत्यैः प्रबलैर्निर्जिताः सुराः। ततो यन्त्राः गिरीशेनगदिता विश्वकर्मणेः॥ भिन्नास्ते यन्त्रं पाषाणै रक्तबिन्दु विवर्जिताः। छातुनरहिता दैत्यास्तदा देवैर्विनिर्जिता॥ चतुरशीति यन्त्रेषु नव वायोजर्लस्य च। अग्नियन्त्रस्य षड्भेदाः षष्टि सङ्ग्रामयन्त्रजाः॥ (वास्तुमण्डनम् 3, 37-39)
  2. आकाशभैरवकल्प में दुर्ग की दीवारों को नाभिमात्र गहरा छिद्र कर पङ्क्तिवार क्रमशः इसकी शिलाओं पर