भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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408 अलग-अलग मोहल्लों में (यथा- गुर्जरपुरा, तेलीपुरा आदि) ब्राह्मणों की, क्षत्रियों की, वैश्यों की और शूद्रों की बस्तियाँ साथ हो परन्तु इन मोहल्लों से बाहर अन्य स्थपति सङ्कुल अर्थात् कारीगरों के समूह व कारखाने होंगे। विप्र-क्षत्रिय-वैश्यानां प्राकारा वै निवासिनाम्। वणिक् कर्मकराणां च मध्यानां च सुखावहाः ॥ 43 ॥ नगर व्यवस्था में यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि विप्र, क्षत्रिय और वैश्यों की बस्तियाँ नगर के परकोटे की तरह बनी हो और वणिकों की तथा कारीगरों की बस्तियाँ इनके बीच में बनी हो तो सुखदायी होती है। विदिक्षु दिक्षु वै कार्या नगरस्वस्तये यथा। अष्ट₈ द्विरष्ट₁₆ द्वात्रिंश₃₂ दधमा मध्यमोत्तमाः ॥ 44 ॥ चतुर्वर्णांश्च प्रकृतीरैकैकेषु पुरेषु च। सर्वत्र वासयेच्चैव नागरांश्च सुखावहान् ॥ 45 ॥ इन सभी बस्तियों को सभी दिशाओं और विदिशाओं में निर्देशानुसार ही नगर के स्वस्ति अर्थात् भलाई के लिए बसाना आवश्यक है। नगर में चारों वर्णों के पुर अर्थात् मोहल्ले भी क्रमशः आठ-आठ की संख्या में हो तो अधम, सोलह-सोलह हो तो मध्यम और तीस-तीस हो तो उत्तम माने जाते हैं। इस प्रकार से वर्णानुसार बस्तियों का निवेशन नागरिकों के लिए सुखद होता है। पूर्वे ब्राह्मणलोकाश्च क्षत्रियाश्चैव दक्षिणे। निवेश्याश्चोत्तरे शूद्राः पश्चिमे तु जलाश्रयाः ॥ 46 ॥ ब्राह्मणों की बस्तियाँ पूर्व की ओर, क्षत्रियों की बस्ती दक्षिण, शूद्रों की बस्ती उत्तर की ओर हो तथा पश्चिम दिशा की ओर जलाशय बनाएँ। पूर्वयाम्योत्तरे शस्तं हट्टमार्गादिचत्वरम्। ईशाने शिल्पिनः सर्वे रजकाश्छिंपकाः परम् ॥ 47 ॥ पूर्व दिशा, दक्षिण दिशा और उत्तर दिशा की ओर हाट-बाजार व मार्ग, चत्वर- चौक आदि प्रशस्त माने गए हैं। ईशान कोण की दिशा में समस्त शिल्पियों की